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राजनीति को अपराध से मुक्त करने का जटिल सवाल

राजनीति के शुद्धिकरण की बहस के दौर में एक दूसरा ऐतिहासिक फैसला भी है। वह है अपराधियों के मत देने के अधिकार को लेकर। सर्वोच्च न्यायालय ने मुख्य चुनाव आयुक्त बनाम जन चौकीदार (2013) में यह फैसला दिया कि वोट देना कानूनी अधिकार है। वोट देने का यह विशेषाधिकार छीना जा सकता है। उस स्थिति में मतदाता सूची में नाम रहने के बावजूद मतदान करने वाला योग्य नहीं माना जाएगा। नाम काटा नहीं जाता है, लेकिन पुलिस की कानूनी हिरासत में रहते हुए मतदाता होने की योग्यता एवं मतदान का विशेषाधिकार छिन जाता है।
लिली थॉमस फैसला बेहद अहम मोड़ पर और राजनीति के आपराधीकरण की बड़ी समस्या की पृष्ठभूमि के संदर्भ में आया है। आंकड़ों से पता चलता है कि भारत के 4835 सांसदों एवं विधायकों में 1448 के खिलाफ वैसे आपराधिक मामले चल रहे हैं जिनमें हत्या, बलात्कार और अपहरण जैसे गंभीर आरोप शामिल हैं। सभी राजनीतिक पार्टियों की वजह से सर्वोच्च न्यायालय का यह फैसला लोकतंत्र के शुद्धीकरण की प्रक्रिया के रूप में आया है। फैसले के अनुसार जो लोग 2 साल से अधिक समय से दोषी घोषित हैं वे 10 जुलाई 2013 के बाद आगे सर्वोच्च न्यायालय के कानून के तहत अयोग्य हो जाएंगे। लेकिन यह फैसला उन मौजूदा सांसदों एवं विधायकों को बचा लेता है, जिन्हें दोषी करार हुए 2 साल से अधिक समय गुजर चुका है।इसके पहले सरकारी अधिकारियों के बारे में उनकी शैक्षिक एवं आपराधिक पृष्ठभूमि सहित अन्य बातों को जानने के नागरिकों के सूचना के अधिकार को लेकर एक विवाद उठा था। भारत संघ बनाम लोकतांत्रिक सुधारों के लिए बने एसोसिय़ेशन और एएनआर (एआईआर 2002 एससी 2121) के मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा था कि नागरिकों के सूचना का अधिकार बोलने एवं अभिव्यक्ति की आजादी के संवैधानिक अधिकार से निकला है। लोक प्रतिनिधत्व अधिनियम को संशोधित किया गया। उसमें धारा 33 (ए) को शामिल किया गया, जिसके तहत हर उम्मीदवार के लिए दो या उससे ज्यादा वर्षों तक के लिए जेल के दंड वाले किसी अपराध में आरोपित होने की स्थिति की जानकारी देना जरुरी था। ऐसा माना गया कि यह धारा अपराधियों को सांसद एवं विधायक बनने से रोकने के लिए पर्याप्त होगी, क्योंकि लोग ऐसे लोगों को वोट देकर सत्ता में नहीं भेजेंगे। लेकिन ऐसा लगता है कि यह लक्ष्य पूरा नहीं हो पाया।

कानून के आधार पर कहें तो जो विचारणीय सवाल उठते हैं, वे निम्निलिखित हैं-

जब कानून में आपराधिक मामलों में अपील करने के संवैधानिक अधिकार का प्रावधान है तो क्या उम्मीदवारों को झूठे एवं दुर्भावनापूर्ण मामलों का शिकार होने की स्थिति में भी, चाहे वह राजनीतिक रूप या किसी और वजह से से प्रेरित हो, उनके संवैधानिक अधिकार से वंचित करना उचित होगा?

जब नागरिकों के सूचना का अधिकार सुरक्षित है और किसी उम्मीदवार की आपराधिक पृष्ठभूमि मुहैया की जाती है तो क्या इसे वोटरों की पसंद पर नहीं छोड़ दिया जाना चाहिए?जब संविधान ने खुद संसद को यह शक्ति दी है कि वह अनुच्छेद 191 एवं 102 के तहत किसी को अयोग्य ठहरा सकती है तो क्या संसद को कानून के तहत हुई इस तरह की अयोग्यताओं को टालने या उसे स्थगित करने का अधिकार नहीं होना चाहिए?
आज की उस राजनीति के दौर में जब सरकार का बहुमत तेज धार पर चलने जैसा हो, जहां एक एक सदस्य बहुत कीमती हो और एक सदस्य की अयोग्यता भी सरकार के कामकाज पर बेहद बुरा असर डाल देने वाली हो इस तरह के फैसले का संसद के संचालन पर क्या प्रभाव पड़ेगा?

जब सर्वोच्च न्यायालय की संवैधानिक पीठ ने के. प्रभाकरण बनाम पी जय राजन (2005 1 एस. सी.सी. 754) मामले में लोक प्रतिनिधि अधिनियम की धारा 8 (4) को सही ठहराया है?

सर्वोच्च न्यायालय ने प्रभाकरण मामले में फैसला दिया:
1951 अधिनियम की धारा 8 (4):

उपधारा (1) में चाहे जो हो, उपधारा (2), या उप धारा (3), दोनों में से किसी भी धारा के तहत अयोग्य ठहराया जाना, उस व्यक्ति के मामले में जो सजा मिलने की तिथि के दिन संसद का सदस्य है या विधान सभा का सदस्य है 3 महीने बीत जाने तक प्रभावी नहीं होगा

प्रभाकरण के फैसले में निर्मित प्रश्न संख्या 3 :

आरपीए की धारा 8 की उपधारा (4) का उद्देश्य क्या है ? क्या संसद के सदस्य को उप धारा (4) के तहत अयोग्यता से मिली सुरक्षा उम्मीदवार के संसद या विधान सभा का सदस्य नहीं रहने के बावजूद नामांकन के दिन या चुनाव के दिन मिलती रहेगी?

सर्वोच्च न्यायालय ने फैसला दिया एक बार चुनाव हो गए और संसद का गठन हो गया तो ऐसा हो सकता है कि संसद के किसी सदस्य को दोषी करार दे दिया जाए और उसे सजा हो जाए। ऐसी स्थिति का दूसरे आधार पर निदान किए जाने की जरुरत है। यहां सिर्फ किसी व्यक्ति के चुनाव लडऩे या संसद का सदस्य बने रहने के अधिकार का सवाल नहीं है, बल्कि लोकतांत्रिक ढंग से चुनी गई संसद के अस्तित्व और उसकी निरंतरता का भी सवाल है। दोषी करार दिए जाने के बाद जेल भेजने का फैसला आते ही अगर संसद के किसी सदस्य को संसद में बैठने एवं कार्यवाहियों में भाग लेने से प्रतिबंधित कर दिया गया तो दो तरह के परिणाम सामने आएंगे-
पहला, संसद की सदस्यता की क्षमता कम हो जाएगी, साथ ही उस राजनीतिक पार्टी की क्षमता भी कम होगी जिससे वह सदस्य जुड़ा है। हो सकता है कि सत्ता में बैठी सरकार तेज धार जैसे बहुमत पर टिकी हो, जब हर एक सदस्य महत्वपूर्ण हो और एक की सदस्यता जाने पर ही सरकार के कामकाज पर बुरा प्रभाव पडऩे का खतरा हो। दूसरी स्थिति यह हो सकती है कि उपचुनाव कराना पड़े लेकिन जो बेकार साबित हो जाए। अदालत द्वारा दोषी सदस्य को मुक्त किए जाने की स्थिति से जटिलताएं भी पैदा हो सकती हैं। ऐसा लगता है कि ऐसे ही कारणों को देखते हुए संसद ने मौजूदा सदस्यों को अलग श्रेणी में वर्गीकृत किया हो। इसीलिए धारा 8 की उप धारा (4) में प्रावधान है कि अयोग्य होने की तिथि पर अगर कोई व्यक्ति संसद का सदस्य है तो ऐसी अयोग्यता अयोग्य घोषित किए जाने के तीन महीने तक लागू नहीं होगी। तीन महीने की यह अवधि देने का उद्देश्य है कि दोषी करार दिया गया सदस्य अपील या संशोधन की याचिका दायर कर सके।

अंतत: यह व्याख्या का मसला हो जाता है। लिली थॉमस के मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने फैसला दिया कि चूंकि अनुच्छेद 101 और 190 में यह प्रावधान है कि अयोग्य ठहराए जाने के बाद सीट खाली हो जाएगी, संसद धारा 8 (4) में इस अयोग्यता को टालने का प्रावधान नहीं डाल सकती है । संभव है इसकी व्याख्या यह होती कि अनुच्छेद 101 और 190 का तात्पर्य यह है कि अयोग्य करार देने के बाद सीट खाली हो जाएगी (जहां अयोग्यता को तीन महीने के लिए टाल दिया जाता है या तब तक के लिए जब तक कि स्थगन नहीं मिल जाता या अपील करने की अनुमति नहीं मिल जाती)

मैं संविधान एवं लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 के आलोक में फैसले का विश्लेषण करते हुए सिर्फ कुछ आशंकाएं जाहिर कर रही हूं। अगर यह फैसला लागू कर दिया जाता है तो फिर यह निश्चित रूप से देश की राजनीति एवं लोकतंत्र का चेहरा बदल कर रख देगा। इसमें कोई संदेह नहीं। कोई राजनीतिक पार्टी या कोई और अन्य इस फैसले को किसी समुचित क्षेत्राधिकार में चुनौती देंगे या नहीं, यह एक सवालिया निशान है।
राजनीति के शुद्धिकरण की बहस के दौर में एक दूसरा ऐतिहासिक फैसला भी है। वह है अपराधियों के मत देने के अधिकार को लेकर। सर्वोच्च न्यायालय ने मुख्य चुनाव आयुक्त बनाम जन चौकीदार (2013) में यह फैसला दिया कि वोट देना कानूनी अधिकार है। वोट देने का यह विशेषाधिकार छीना जा सकता है। उस स्थिति में मतदाता सूची में नाम रहने के बावजूद मतदान करने वाला योग्य नहीं माना जाएगा। नाम काटा नहीं जाता है, लेकिन पुलिस की कानूनी हिरासत में रहते हुए मतदाता होने की योग्यता एवं मतदान का विशेषाधिकार छिन जाता है। जिस व्यक्ति को 1951 की धारा 62(5) के प्रावधान होने के कारण वोट देने का हक नहीं है वह मतदाता नहीं है। और इसीलिए विधान सभाओं एवं संसद का चुनाव लडऩे की योग्यता उसमें नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कानून अधिकार देता है और कानून अधिकार ले लेता है। वोट देना कानूनी हक है, एक विशेषाधिकार है जो छीन लिया जाता है। कानून अस्थायी रूप से ऐसे लोगों के चुनाव के स्थगन के आसपास जाने के भी अधिकार छीन लेता है। मेरी चिंता उन लोगों को लेकर है, जिन पर मुकदमे अभी चल रहे हैं। दोषी करार दिए जाने के बगैर भी विचाराधीन कैदियों को किसी बड़े लोकतांत्रिक अधिकार से वंचित किया जाना लोकतंत्र में शाप जैसा है। एक चिंता और है – दोषी करार दिए जाने पर कोई अपराधी जेल में रह कर समाज को उसकी कीमत चुकाता है। उसे दोबारा दंड क्यों मिले?

इसमें कोई शक नहीं कि इन फैसलों को लागू करने पर राजनीति की दिशा में आमूलचूल बदलाव आएगा। संभव है राजनीति का अपराधीकरण इतिहास के पन्नों में सिमट जाए।

लेखिका सर्वोच्च न्यायालय में वरिष्ठ वकील हैं

 

पिंकी आनंद

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