ब्रेकिंग न्यूज़ 

सर्वोच्च् न्यायलय का निर्णय स्वागत योग्य

सजायाफ्ता लोगों की कुर्सी छीन लेने और संसद तथा विधान सभा से उनकी सदस्यता समाप्त करने संबंधी उच्चतम न्यायलय का निर्णय बहुत महत्वपूर्ण है उस पर देशव्यापी चर्चा होनी चाहिए उसका स्वागत किया जाना चाहिए। किंतु यह समझना की उससे देश की राजनीतिक और निवार्चन व्यवस्था में सभी आवश्यक सुधार हो जाएंगे, उचित नहीं होगा। ऐसा भी संभव नहीं लगता कि निवार्चन में अपराधीकरण, धन-बल और बाहुबल, तथा माफिया का वर्चस्व समाप्त हो जाएगा। किंतु इसमें कोई संदेह नहीं कि यह एक सराहनीय कदम है।

इस निर्णय के आने से पहले जो स्थिति थी, इसके अनुसार यदि कोई व्यक्ति किसी जघन्य अपराध के लिए किसी भी अदालत के द्वारा अपराधी घोषित हो जाए और सजा आ जाए, तो वह चुनाव नहीं लड़ सकता था। यानि चुनाव लडऩे के लिए अयोग्य हो जाता था। दूसरी ओर अगर कोई व्यक्ति चुनाव जीत कर, संसद या विधानसभा का सदस्य बन गया और उसके बाद वह वैसे ही अपराध का दोषी घोषित हो जाता है और उतनी ही लंबी सजा पा जाता है, तो उसके मामले में यह सजा 3 महीने तक लागू नहीं होगी।अगर इन तीन महीनों में वह अपील दायर कर देता है, तो जब तक उस अपील का निर्णय ना हो, तब तक वो सांसद, विधायक या मंत्री तक भी बना रह सकता था। न्यायिक व्यवस्था की जो वर्तमान स्थिति है, उसमें प्राय: होता यह था कि सदन का विघटन होता रहता था, दसियों वर्ष बीत जाते थे, अपीलें तय नहीं होती थी। किन्हीं भी जघन्य अपराधों के दोषी व्यक्ति की सासंद, विधायक और मंत्री बने रहने की संभावना रहती थी।

इस प्रकार एक भयंकर विरोधाभास की स्थिति थी। इसमें आम नागरिक तो चुनाव लडऩे के लिए अयोग्य हो जाता था, लेकिन एक विधायक या सांसद उसी स्थिति में अयोग्य नहीं होता था। उच्चतम न्यायालय के निर्णय ने, जन प्रतिनिधित्व अधिनियम 1951, की धारा 8 (4) के अंतर्गत जन्मी इस विडंबना को समाप्त कर दिया और इस धारा को अवैध घोषित कर दिया। न्यायलय ने कहा इस धारा को बनाने में संसद ने अपने विधायी अधिकारों का अतिक्रमण किया।

(लेखक लोकसभा के पूर्व महासचिव एवं संविधान विशेषज्ञ हैं)

 सुभाष कश्यप

предназначение кистей для макияжаВладимир мунтян пастор биография

Leave a Reply

Your email address will not be published.