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अपराधियों को चुनाव लडऩे से रोकना है

हलकी फुल्की प्रतिक्रिया से जी जुड़ाने वाले कम नहीं हैं। कभी-कभार कहा जाता है कि चुनाव के बहाने तिजोरियों में कैद रकम बाहर आती है। लोगों में बंटती है। हैदराबाद के सलाहुद्दीन ओवैसी प्रचार सभाओं में याद दिलाते थे-पिछले चुनाव में अमुक पार्टी ने आपको इतनी राशि बांटी। आपने हमें जिताया। उससे पिछले चुनाव में इतनी रकम बंटी। हमें जिताया। आप हमें जिताएं। आपको मिलने वाली रकम बढ़ती जाएगी। ओवैसी जीते जी एक भी चुनाव नहीं हारे।

चुनाव में धनबल पर रोक का एक प्रयास इंदिरा गांधी ने भी किया था। उन्होंने 1968 में राजनीतिक दलों को उद्योग और व्यापार से मिलने वाले चंदे पर रोक लगा दी थी। उनकी नीयत का खुलासा कर दें। डॉ. राम मनोहर लोहिया के गैर कांग्रेसवाद ने जोर पकड़ा। 1967 के विधानसभा चुनाव के बाद कुछ राज्यों में कांग्रेस या तो सत्ता में नहीं आई या बगावत के कारण कांग्रेस की सत्ता चटख गई। स्वतंत्र पार्टी में रजवाड़ों और कारखानदारों का जमावड़ा था। स्वतंत्र पार्टी को ताकतवर होने से रोकने के लिए चुनावी चंदे पर रोक लगी। अस्सी के दशक में कंपनी अधिनियम में छूट देते हुए कुछ शर्तों के साथ चंंदा देने की अनुमति खोली गई। इसके बावजूद आज भी राजनीतिक दलों को चुनावी चंदा दूसरे रास्तों से मिलता है। मुख्य सूचना आयुक्त ने हिसाब-किताब में खुलापन लाने की बात कहकर बर्र के छत्ते को हाथ लगा दिया। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी एकमात्र राजनीतिक दल है, जिसने अपनी तरफ से विवरण सार्वजनिक किया।

चुनाव पारदर्शी होने से राजनीति की आड़ में होने वाले व्यापार और अपराधीकरण दोनों पर अंकुश लगेगा। इस खतरे से राजनीतिक दल वाकिफ हैं। बोफर्स और चारा घोटाला किसी व्यक्ति के साथ चिपके, लेकिन यह तो नहीं भूल सकते कि मुकेश अम्बानी से प्रमोद महाजन और अहमद पटेल तक जाने किस किस की निक टता है। पहले अपराधी चुनाव जिताते थे। अब खुद संसद में बैठने लगे। पहले सौदागर चंदा देते थे। अब मंत्री और सरकारें बनाने लगे। राजनीतिक और चुनावी चंदे का हिसाब होने लगा तब अगले और पिछले सौदों पर आंच आने का खतरा है। कौन माई का लाल है, जो विजय माल्या के किंगफिशर की मुफ्त सवारी को भूला हो? भूल जाता तो अब तक कार्रवाई पूरी हो चुकी होती। इसलिए अग्नि परीक्षा के समय दाएं बांऐ झांकने की नौबत आती है। मुख्य निर्वाचन आयुक्त एस वाय कुरैशी ने प्री पेड न्यूज की आड़ में चलने वाले धंधे को रोकने की पहल की। अदालती और राजनीतिक युद्घ कला के महारथी चौकन्ने हुए। कुरैशी के सेवानिवृत्त होने तक जांच पूरी नहीं हुई। अड़ंगे आए। केन्द्र सरकार ने शपथ पत्र देकर कहा कि चुनाव घोषित होने के बाद निर्वाचन आयोग को किसी जन प्रतिनिधि का चुनाव रद्द करने का अधिकार नहीं है। संवाद माध्यमों को इस गलतफहमी में नहीं रहना चाहिए कि उनके डर से पीछे हटे। ग्लोबल फिनांशल इंटिग्रिटी की जांच के निष्कर्ष का महत्व राजनीतिक जानते हैं। वाशिंगटन स्थित इस संस्था की पड़ताल से पता लगा कि भारत में 1948 से 2008 के बीच 462 बिलियन डालर की अवैध पूंजी गई जो भारत पर कुल ऋण से दोगुना है।

लालू जानते हैं कि आर्थिक और जातीय पांसे ठीक चले तो सत्ता पर पकड़ बनी रहती है। चुनाव आयोग पंगु है। राजनीतिक दलों की वरीयता सूची से चुनाव सुधार बाहर हैं। सरकार के लिए सत्ता में बने रहना ही प्रमुख लक्ष्य है। राजनीतिक नेतृत्व में अपनी और अपनी पार्टी की जीत सर्वोपरि है।

जैन हवाला और बोफर्स से लेकर आए दिन उघडऩे वाले भ्रष्टïचार और राजनीति में अपराधीकरण की तह में हमारे लोकतंत्र का मूल दोष है। बालकथाओं से उस राक्षस का जिक्र ही गुम हो गया हो जिसके प्राण तोते में हुआ करते थे। अब सीबीआई का तोता हो या किसी और जांच एजेंसी का, वह तो बोलता ही तब है जब ऊपर से हुंकार लगे। सत्ता पर पकड़ है तब आप अकूत धनराशि जमा कर सकते हैं। चुनाव में अंधाधुंध खर्च कर सकते हैं और मनचाहे गठजोड़ कर फायदा उठा सकते हैं। एक तरफ लालू हैं। मधु कोड़ा हैं जिनकी विधायक पत्नी के समर्थन से हेमंत सौरेन की सरकार बनी। सांसदों के घूस कांड में शिबू सौरेन-सूरज मंडल की जोड़ी ने बदनामी पाई थी। भाजपा और कांग्रेस दोनों के साथी रह लिए। शुचिता और सादगी की अनदेखी हुई। राजनीति में भ्रष्टाचार की नब्ज तो गांधी के अनुयायी 1947 में पकड़ चुके थे। गांधी के जाते ही सत्ता पर नैतिक दबाव कम हुआ। गांधी के कुछ अनुयायी राजनीति से दूर रहकर सर्वोदय में सक्रिय हुए। उन्होंने सर्व सेवा संघ के माध्यम से रचनात्मक और पारदर्शी समाज बनाने का सपना देखा। सात जुलाई 1951 को सर्व सेवा संघ ने प्रस्ताव पारित किया। प्रस्ताव में कहा गया-राज्यों के मंत्रिमंडलों का फर्ज है कि वे अपने कर्मचारियों के शुद्घिकरण की ओर विशेष ध्यान दें।

हम भी इस बात पर विशेष ध्यान देते चलें कि 1952 में पहला आम चुनाव हुआ। प्रधानमंत्री पंडित नेहरू पचास के दशक में विंध्य क्षेत्र में कांग्रेस पार्टी के पक्ष में प्रचार करने गए। मंच की सीढिय़ां चढ़ते समय पता लगा कि उम्मीदवार जेल में घूसखोरी की सजा काट रहा है। मंच पर जाकर पंडित जी ने एक वाक्य कहा-देश और प्रदेशों को साफ-सुथरे उम्मीदवार चाहिए। उम्मीदवार के बारे में जानने की उत्सुकता है? भारत की राजनीति में बरसों चर्चित रहे अर्जुन सिंह के पिता शिव बहादुर सिंह की बात कर रहे हैं, हम। गुलजारी लाल नंदा ने सदाचार समाज बनाया। जय प्रकाश नारायण ने 1974 में भ्रष्टïचार के विरुद्घ आंदोलन छेड़ा। वे चाहते थे कि चुनाव साफ-सुथरे हों। बाहु और धनबल का प्रयोग रोका जाए। इस आंदोलन का सर्वोदय राजनीति के शिखर पुरुष विनोबा भावे ने विरोध किया। उनकी शिष्या निर्मला देशपांडे प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की दूत बनीं।

हलकी फुल्की प्रतिक्रिया से जी जुड़ाने वाले कम नहीं हैं। कभी-कभार कहा जाता है कि चुनाव के बहाने तिजोरियों में कैद रकम बाहर आती है। लोगों में बंटती है। हैदराबाद के सलाहुद्दीन ओवैसी प्रचार सभाओं में याद दिलाते थे-पिछले चुनाव में अमुक पार्टी ने आपको इतनी राशि बांटी। आपने हमें जिताया। उससे पिछले चुनाव में इतनी रकम बंटी। हमें जिताया। आप हमें जिताएं। आपको मिलने वाली रकम बढ़ती जाएगी। ओवैसी जीते जी एक भी चुनाव नहीं हारे।

कुछ लोगों की धारणा है कि राजनीति का अपराधीकरण सबसे बड़ी समस्या है। वर्तमान लोकसभा के 543 में से 158 सदस्यों के विरुद्घ फौजदारी मामले चल रहे हैं। हत्या और अपहरण जैसे गंभीर मामलों में 74 लोकसभा सदस्य लिप्त हैं। सांसदों पर तरह तरह के पांच सौ से अधिक मामले दर्ज हैं। पलामू से विजयी कमलेश्वर बैठा ने तो मानो रिकार्ड तोडऩे की असंभव सी चुनौती पेश की है। बैठा के विरुद्घ अलग अलग पुलिस थानों में 53 मामले दर्ज हैं जिनमें डीएफओ संजय सिंह की हत्या का प्रकरण शामिल है। उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड की पुलिस ने उनपर सात लाख रुपए का इनाम घोषित किया था।

आपात्काल के दौरान जेल में रहकर बिहार के मुजफ्फरपुर लोकसभा क्षेत्र से जीतने के कारण जार्ज फर्नांडीस दुनिया भर में चर्चित हुए। फर्नांडीस की याददाश्त ने साथ छोड़ा और बाकी देश को कमलेश्वर की करामात पर लज्जा महसूस नहीं होती। कमलेश्वर 30 मई 2005 को गिरफ्तार किए गए थे। चुनाव में जीत हासिल करने के बाद भी वे जेल में थे। 2009 के चुनाव के दो वर्ष बाद मई 2011 में उन्हें सभी मामलों में जमानत मिली है। यह तो कहने की आवश्यकता नहीं है कि बाहर निकल कर बैठा ने स्वयं को निरपराध बताया। पप्पू यादव, शहाबुद्दीन सहित हर व्यक्ति का यही घिसा पिटा उत्तर होता है। अपवाद हैं तो लालू प्रसाद। बरसों तक अदालतों में घिसटते चारा कांड में उनका बाल बांका नहीं हुआ। अदालत ने गिरफ्तारी का हुक्म जारी किया। पुलिस ने जान बूझ कर देर से हिरासत में लिया। विलम्ब करने और उसके पक्ष में दलील देने वाले अधिकारी इस समय केन्द्रीय अन्वेक्षण ब्यूरो यानी सीबीआई के निदेशक हैं। जी हां-रंजीत सिन्हा महोदय। बंदीगृह के नाम पर सरकारी आवास में आराम फरमाने वाले लालू ने मुख्यमंत्री की कुर्सी पर अर्धांगिनी राबड़ी को बिठाया। जमानत पर बाहर आए। लोकसभा चुनाव जीतकर केन्द्र में मंत्री बने। प्रबंधन सिखाने लगे। पशु चारा में घोटाला करने वाले कुछ अपराधी जेल में हैं। कुछ दुनिया छोड़ गए। अब लालू के भाग्य का फैसला है? किसी ने पूछा-चिंता होगी? नहीं। निर्भय लालू ने उत्तर दिया-मैं पहले भी जेल जा चुका हूं।
नोबल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री अमत्र्य सेन ध्यान दिलाते हैं कि भारत में आधी जनसंख्या शौचालय सुविधा से वंचित है। लोग खुले में नित्य विधि निबटाते है। वर्ष 1969 में देश ने महात्मा गांधी की जन्म शताब्दी मनाते हुए संकल्प लिया था कि ऐसी व्यवस्था की जाएगी ताकि मानव को मानव का मल उठाने का गर्हित काम नहीं करना पड़े। यह वही देश है जिसमें दो प्रमुख राजनीतिक दल चुनावी वर्ष 2009 में कुल मिलाकर तीन करोड़ रुपए से अधिक खर्च करते हैं। दोनों दल केन्द्र में सत्ता का स्वाद चख चुके हैं। सुख भोगा है। भ्रष्टïाचार का कीचड़ उन पर उछला है। उसी देश में आज भी 3 हजार से अधिक लोग दूसरों की गंदगी ढोने के लिए अभिशप्त हैं। इस महान देश में ऐसे सिर्फ 15 व्यक्ति जीतकर लोकसभा मे पहुंच पाते हैं जिन्होंने अपनी आय दस लाख रुपए या इससे कम बताई है। यानी कुल उम्मीदवारों का आधा प्रतिशत भी नहीं। गरीबी रेखा से नीचे रहने वालों के इस देश के सौ से अधिक-कुल 106 जन प्रतिनिधि ऐसे हैं जिनकी आमदनी 5 करोड़ रुपए या इससे अधिक है।
इलेक्शन वाच ने हिसाब लगाया कि देश का हर तीसरा लोकसभा सदस्य करोड़पति है। देश की आय और प्रति व्यक्ति आय की तुलना में संसद सदस्य तेजी से समृद्घ हुए हैं। इस विषमता के कारणों को चुनाव में जारी ख्रर्च के फर्जीवाड़े की रोशनी में समझें। चुनाव प्रचार के दौरान पकड़-धकड़ में मात्र एक राज्य तमिलनाडु में विधानसभा चुनाव में जब्त 60 करोड़ रु की अनदेखी हो चुकी है। लोकसभा सदस्य गोपीनाथ मुंडे ने स्वीकार किया कि वर्ष 2009 के चुनाव में बीड से जीत के लिए उन्होंने आठ करोड़ रुपए खर्च किए। मुंडे के बयान के बाद निर्वाचन आयोग ने नोटिस जारी किया। आयकर विभाग ने पूछताछ शुरु की। देश के प्रधानमंत्री रहे अटल बिहारी वाजपेयी संसदीय समिति के समक्ष कहने से नहीं चूके कि निर्वाचित सदस्य सच बोलने की सौगंध लेते हैं और झूठ पर मुहर लगाकर अपना राजनीतिक जीवन आरंभ करते हैं। पहला झूठ फर्जी चुनाव खर्च होता है। वास्तविक से काफी कम खर्च बताया जाता है। अकेले 2009 के चुनाव में 6753 उम्मीदवारों ने शपथ पत्र देकर दावा किया कि निर्धारित राशि से 45 से 55 प्रतिशत ही खर्च किया।

इससे अधिक साफगोई से देश के पूर्व मुख्य निर्वाचन आयुक्त नवीन चावला बोल गए। उन्होंने मंजूर किया कि दो हजार से अधिक वरिष्ठï अधिकारियों को चुनाव पर्यवेक्षक बनाने के बावजूद उम्मीदवारों और राजनीतिक दलों के बेतहाशा धन बहाकर चुनाव जीतने के प्रयास पर रोक नहीं लगी। मुख्य निर्वाचन आयुक्त रहे जी एस कृष्णमूर्ति ने ठोस पहल की। 5 जुलाई 2004 को प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर चुनाव सुधार करने के लिए जरूरी वैधानिक प्रक्रिया तत्काल आरंभ करने की आवश्यकता बताई थी।

चुनाव सुधार
न्यायपालिका और विधायिका के बीच नोंकझोंक के अनेक किस्से सुनने को मिलते हैं। सरकारों को और जांच एजेंसियों को अदालत की फटकार सुननी पड़ती है। तमिलनाडु का किस्सा ताज़ा है और कुछ-कुछ अनोखा और मनोरंजक। वर्ष 2001 में राज्य सरकार ने राजनीतिक हस्तियों के विरुद्घ आय से अधिक संपत्ति रखने की जांच की। अकूत संपत्ति का स्वामी होने के कारण अदालत में मामला गया। जांच और मुकदमा जारी रखने में विलम्ब के कारण मामला रफा-दफा हो गया। 11 वर्ष बाद 2012 में सरकार ने समीक्षा की। नींद से उठकर ऊंघते हुए विधि एवं न्याय विभाग ने उच्च न्यायालय से अनुरोध किया कि विलम्ब निरस्त करते हुए आगे कार्रवाई करने की अनुमति दी जाए। माननीय न्यायाधीश अरुणा जगदीशन ने सरकार के अनुरोध को ठुकराते हुए जो कुछ कहा उसका आशय यही था कि इतने दिन सतर्कता विभाग, भ्रष्टïचार प्रतिबंधक विभाग तथा विधि विभाग सोने में कुंभकर्ण से होड़ ले रहे थे?

वर्ष 1996 से 2001 तक के एन नेहरू, एस रघुपति, पेरियास्वामी और को सि मणि मंत्रिमंडल के सदस्य थे। जयललिता ने सत्ता में आते ही चारों के विरुद्घ कार्रवाई की। तमिलनाडु में चुनाव में सत्ता बदलती रहती है और भ्रष्टाचार की जांच भी उससे सीधे सीधे प्रभावित होती है। निचली अदालत ने नेहरू, रघुपति और पेरियासामी को पहले ही मुक्त कर दिया था। सरकार की ढिलाई से मणि भी राहत पा गए। न्यायमूर्ति अरुणा ने 12 जुलाई

2013 को आवेदन निरस्त करने से पहले सवाल किया कि विलम्ब का एक भी तार्किक और ठोस कारण बता सकते हो?

बोफर्स तोप, चारा घोटाला, जैन हवाला जैसे अनेकों घोटालों की याद करें तो ज्ञानी पाठक तुरंत सोचेंगे-ऐसा तो होता रहता है। पाठकों की इस हताशा भरी खीझ में हमारी सहमति है। लेकिन याद तो यह भी करें कि तमिलनाडु में वर्ष 2011 में विधानसभा चुनाव हुए थे। चुनाव के दौरान निर्वाचन आयोग ने 60 करोड़ रुपए बरामद किए, जब्त किए जिनका चुनाव में वितरण रोका जा सका। देश और दुनिया को अब तक यह पता नहीं लगा कि इस रकम को किस ने कहां से किस उम्मीदवार के लिए भेजा था? जिन लोगों ने इस निधि को भेजने की गुस्ताखी की उनकी नीयत क्या थी? जांच कर इस बात को उजागर नहीं किया गया कि उनके विरुद्घ कोई कार्रवाई की गई या नहीं? चुनाव समाप्त हो जाने के बाद जब्तशुदा वाहन और रकम का हश्र जानने की दिलचस्पी समाप्त हो जाती है। चुनाव कानूनों का उल्लंघन करने के आरोप में गिरफ्तार किए गए लोग खुद तो चुनाव नहीं लड़ते। इसलिए उनकी रिहाई से किसी का कोई लेना-देना नहीं होता।

लेखक दैनिक भास्कर नागपुर संस्करण के संपादक हैं

 

 

प्रकाश दुबे

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