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कुर्सी से चिपके क्यों हो!

मामला केवल इतना है कि अदालत ने सजा सुनाई जाते ही नेता जी की संसद या विधानसभा से सदस्यता समाप्त करने की बात कही है। इसमें इतना हंगामा क्यों? जनता की सेवा ही तो करनी है, कुर्सी से क्यों चिपके हो?

कुछ साल पहले एक बार ऐसा मौका आया था जब एक दिन के अन्तराल में भाजपा के शीर्ष नेताओं-अटल बिहारी वाजपेयी और लाल कृष्ण आडवाणी को नवभारत टाइम्स के लिए मैंने लम्बा इंटरव्यू किया था। दोनों नेताओं के लिए समान सवालों की मैंने प्रश्नावली बनाई। उसमें एक सवाल था कि यदि आपको अपने जीवन के उस मोड़ पर जाने का मौका मिले जब आपने अपने कैरियर का चयन किया और आपको अब तक के अपने जीवन के अनुभव याद रहें तो क्या आप पुन: राजनेता बनना चाहेंगे या कोई अन्य कैरियर अपने जीवन के लिए चुनेंगे? वाजपेयी जी के जवाब का तो मुझे पहले से ही अनुमान था कि वह अपने बारे में ऐसा कुछ कहेंगे कि उन्हें पुन: मौका मिले तो वह लेखक या पत्रकार बनना चाहेंगे। लेकिन आडवाणी जी के जवाब का अनुमान नहीं था। मुझे उत्सुकता उनके जवाब की थी। आडवाणी जी से जब मैंने पूछा तो उन्होंने एकदम उत्तर देने की बजाय एक मिनट सोचा और फिर कहा कि ‘मुझे एक बार नहीं, बल्कि जितनी बार भी मौका मिलेगा मैं एक राजनेता ही बनना चाहूंगा।’ आडवाणी जी की बात सुन कर मेरे मुंह से निकला-‘क्यों? ‘

आडवाणी जी का जवाब बहुत ही सामान्य था-‘क्योकि केवल यही एक ऐसा कार्यक्षेत्र है जिसमें यदि कोई चाहे तो सामान्य जन की बहुत सेवा कर सकता है।’ आडवाणी जी का यह जवाब बहुत ही अर्थपूर्ण था। उनका मतलब था कि यदि ‘कोई राजनेता चाहे तो’ इस क्षेत्र में सामान्य जन की सेवा करने की असीम संभावनाएं हैं। आडवाणी जी का जवाब सुन कर मुझे उन स्वतन्त्रता सेनानियों की याद आई, जिन्होंने आजादी के बाद यह समझ लिया कि उनका उत्तरदायित्व अब पूर्ण हो गया और देश को चलाने और संवारने की जिम्मेदारी अब नई पीढ़ी की है। आजादी के बाद राजनेताओं के कुछ जीवन मूल्य हुआ करते थे। उनके कुछ सिद्धान्त होते थे। सार्वजनिक जीवन उनके लिए सेवाव्रत हुआ करता था। एक चर्चित घटना है कि कांग्रेस के एक उम्मीदवार के लिए पंडित नेहरू चुनाव प्रचार करने गए तो मंच पर चढ़ते हुए उन्हें जानकारी मिली कि जिस उम्मीदवार का प्रचार करने के लिए आए हैं, वह तो जेल में है। पंडितजी ने जनता से अपील की कि वे सदाचारी और ईमानदार उम्मीदवार को ही वोट दें।

लेकिन आज समय बदल गया है। राजनीति का स्तर इस कदर नीचे पहुंच गया है कि केवल येन, केन, प्रकारेण चुनाव जीतना और जितवाना ही सभी दलों और उनके प्रत्याशियों का उद्देश्य बन गया है। कुछ समय पहले तक राजनेता गुंडों के जरिए चुनाव जीता करते थे और बदलते समय के साथ ही राजनेताओं को चुनाव जितवाने वाले अपराधियों को समझ आ गई कि हम दूसरों को जिता कर उन्हें सत्ता सुख देते हैं, यह सत्ता सुख हम क्यों न ले लें। लिहाजा देश की विधानसभाओं और संसद में कुल 4835सदस्यों में से 1448 ऐसे हैं जो आपराधिक मुकदमों में फंसे हैं। लोकसभा के 543 सदस्यों में से 162 ऐसे ही नाम हैं।

हालत यह है कि संसद और विधानसभाओं में पहुंचते ही नेताओं के तेवर बदल जाते हैं। जनता के सामने एक एक वोट के लिए हाथ पसारने वाले नेता उन रास्तों की तलाश में लग जाते है कि इन हाथों से खजाने को कैसे खाली किया जाए।

राजनेताओं की छवि के गिरते स्तर को देखते हुए एक बार नहीं बल्कि अनेक बार कमेटियों का गठन हुआ, उन कमेटियों की सिफारिशें भी आईं। कमेटियों की सिफारिशों पर चर्चा भी हुई लेकिन किसी न किसी बहाने सभी राजनीतिक दलों ने मिल कर उन सिफारिशों को ठंडे बस्ते में डालने का काम किया। वाजपेयी सरकार के दौरान जनता को उम्मीद थी कि चुनाव सुधारों को लेकर कुछ तो होगा। लेकिन वही ढाक के तीन पात रहे। अब जब अदालत ने इस दिशा में आगे बढऩे की थोड़ी कोशिश की तो सरकार और राजनीतिक दलों को पसीना आ गया। रास्ते तलाश किए जा रहे हैं कि अदालत के इन फैसलों को लागू करने से रोक कर पिछली सिफारिशों की तरह इन्हें भी कैसे ठंडे बस्ते में पहुंचाया जाए। राजनीतिक दल इन फैसलों के खिलाफ अपील करने की सोच रहे हैं। इस बात की भी संभावना है कि कोई राजनीतिक दल जनहित के इन फैसलों के खिलाफ ही कोई जनहित याचिका दायर करवा दे। सरकार भी बड़ी बैंच में जाने पर विचार कर रही है।

मामला केवल इतना है कि अदालत ने सजा सुनाई जाते ही नेता जी की संसद या विधानसभा से सदस्यता समाप्त करने की बात कही है। इसमें इतना हंगामा क्यों? जनता की सेवा ही तो करनी है, कुर्सी से क्यों चिपके हो? पहले अपना चेहरा साफ तो कर लो। अपील करनी है। 90 दिन हैं। उस पर ध्यान दो। जनता की सेवा तो होती रहेगी। अब तक होता यह था कि सजा होने पर यदि अपील कर दी है तो बड़ी अदालत का फैसला आने तक नेताजी कुर्सी से चिपके रह सकते थे। अब यदि अदालत का यह फैसला आ गया है तो कुर्सी तो समझो गई। कुर्सी बचाने की तो सारी कवायद की जाती है। अदालत के फैसले से यदि नेताजी की कुर्सी पर कोई फर्क नहीं पड़ता तो फैसला कैसा भी हो, नेताजी को खुश होने में कोई एतराज नहीं होगा। सवाल तो कुर्सी का है।

होना तो यह चाहिए कि अदालत का फैसला आने पर नेताजी को खुद ही कुर्सी छोड़ देनी चाहिए। अदालत को ही यह क्यों कहना पड़े कि जब वोट देने का ही अधिकार नहीं बचा तो आप संसद या विधानसभा में बैठने का अधिकार कैसे रख सकते हैं। वैसे भी कुर्सी तो नेताजी के घर की बपौती है। जेल भी जाना पड़ता है तो उसकी रखवाली के लिए वह अपनी पत्नी को बैठा जाते हैं। कितना भी कोई विश्वस्त हो, कुर्सी के मामले में नेताजी किसी और पर विश्वास नहीं कर सकते। पत्नी पर कुछ विश्वास रहता है। दिल्ली में मदनलाल खुराना को अपने नेता लालकृष्ण आडवाणी के समर्थन में मुख्यमंत्री की कुर्सी छोडऩी पड़ी तो क्या वापस मिली। उमा भारती भी नैतिकता का झंडा उठा कर मध्यप्रदेश में मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़ कर आई थीं, वापस कुर्सी को देख भी नहीं पाईं। लेकिन सभी नेता इन जैसे नहीं होते। यदि कानून ने उन्हें खुद चुनाव लडऩे के अयोग्य बना दिया है तो वे अपनी पत्नी को चुनाव लड़वा कर अपना चुनाव क्षेत्र सुरक्षित बना सकते हैं। लालू यादव का उदाहरण तो नेताओं के लिए पूरी तरह से अनुकरणीय है। जेल गए तो राबड़ी देवी को मुख्यमंत्री की कुर्सी सौंप गए थे।

वह सब कुछ छोड़ सकते हैं, लेकिन कुर्सी का मोह नहीं छोड़ सकते। उनके पास हर मुश्किल का तोड़ है। अदालत यदि डाल-डाल है, तो नेताजी पात-पात हैं। सरकार और राजनीतिक दलों के तेवर देख कर लगता है कि इसका भी कोई न कोई तोड़ निकाल ही लेंगे, चाहे विश्व में सबसे बड़ा लोकतान्त्रिक देश होने का दावा करने वाले राष्ट्र का सिर ही शर्म से झुका रहे।

 

श्रीकान्त शर्मा

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