ब्रेकिंग न्यूज़ 

1448 सांसदों-विधायकों पर चल रहे हैं मुकदमे चुनाव सुधारों के फैसलों को लागू करना टेढ़ी खीर

आम आदमी की भाषा में कहा जाए तो किसी महत्वपूर्ण जगह में किसी आपराधिक आधार पर प्रवेश पत्र पाने की प्रक्रिया में शामिल होना ही मना है तो जब कोई व्यक्ति पहले ही उस महत्वपूर्ण जगह आ चुका है तो उसे सादर वर्षों-दशकों अन्दर रहने की इजाजत देते रहना और उन्हें हम पर शासन करते देते रहना कितना खतरनाक हो सकता है। फिर ये अपराधी हमारे लिए कानून बनाने का, उसे पालन करवाने या न करवाने का अधिकार प्राप्त कर लेते हैं। और यही सब कुछ आजादी के बाद से यहां हो रहा है।10 जुलाई 2013 का दिन भारतीय सर्वोच्च न्यायालय के इतिहास का स्वर्णिम दिन कहा जाएगा। जब अदालत ने जन प्रतिनिधित्व कानून की धारा 8 की उप धारा 4 को असंवैधानिक करार दिया। सर्वोच्च न्यायालय के अनुसार ”संसद ने इस प्रावधान को लागू करते हुए संविधान के निर्देशों का उल्लंघन करते हुए अपनी सीमाओं को लांघा है। अत: इस प्रावधान को असंवैधानिक करार दिया जाता है।” यह फैसला न्यायमूर्ति ए.के. पटनायक और न्यायमूर्ति एस.जे. मुखोपाध्याय की दो सदस्यीय खंडपीठ ने दिया।

खंडपीठ ने जिस प्रावधान का उल्लेख अपने फैसले में किया उसके अनुसार एक सजायाफ्ता सांसद या विधायक अपने पद पर बना रह सकता है यदि वह सजा पाने के वक्त से 90 दिन के अन्दर ऊंची अदालत में अपील दायर कर देता है। किसी सजायाफ्ता व्यक्ति को चुनाव लडऩा हो तो अदालत से मिली सजा उसके रास्ते की रूकावट बनती है। इसी क्रम में चुने हुए प्रतिनिधि के साथ भी ऐसा ही होना चाहिए। उसे भी क्यों अपील का सहारा दिया जाना चाहिए। अदालत ने कहा कि ”आज (10जुलाई 2013) से पहले चुने हुए प्रतिनिधियों पर यह फैसला लागू नहीं होगा। लेकिन आज (10जुलाई 2013) के बाद जो जनप्रतिनिधि सजा पाएंगे, उन पर यह प्रतिबंध लागू हो जाएगा और अपने पद से हट जाएंगे। राहत सिर्फ उन्हें मिलेगी जिनके मुकदमों में ऊंची अदालत से सजा स्थगन का आदेश मिलेगा, बल्कि फैसले के स्थगन का भी आदेश मिलेगा।” फैसले में यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि यदि अपील दायर करने पर निचली अदालत का फैसला उच्च अदालत में बदल जाता है या अभियुक्त की रिहाई हो जाती है तो उस हालत में क्या होगा?

देश भर में 4835 सांसद तथा विधायकों में से 1448 खुद अपनी स्वीकारोक्ति के तहत आपराधिक मामलों में अदालती मुकदमों में फंसे हुए हैं। 543 लोकसभा सांसदों में से 162 के खिलाफ आपराधिक मामले हैं।

सरकारी हलकों में लोग इस फैसले पर संभल कर प्रतिक्रिया व्यक्त कर रहे हैं। उनका कहना है कि इसका असर भारतीय राजनीति पर जरूर गहरा असर होगा।

चुनाव आयोग की परेशानी
इन फैसलों को कैसे कार्यान्वित किया जाए, इसे लेकर चुनाव आयोग भी कम परेशान नहीं है। वैसे तो इन फैसलों का उसने स्वागत किया है, पर इनको प्रेक्टिकल रूप देना उसके लिए भी टेढ़ी खीर है। वह अगस्त में राजनीतिक दलों से इस संबंध में चर्चा करने वाला है कि किसे निर्देशों का उल्लंघन करना कहा जाए और किसे नहीं। उत्तर प्रदेश में सभी विद्यार्थियों को लैपटॉप देना सही है या गलत? सिर्फ एक जरूरतमंद विद्यार्थी को लैपटॉप देना मदद है या कदाचार? कहीं साइकिल देना कदाचार है तो दूसरे प्रदेश में शायद मदद या जरूरत है। जो एक राज्य में करना सही हो सकता है, वही दूसरे राज्य में करना गलत हो सकता है। सरकार चुनाव-घोषणा पत्रों को रेगुलेट करने का विचार सही नहीं मानती। विधि मंत्रालय के एक अधिकारी का कहना है कि राजनीतिक दलों का चुनाव-घोषणा पत्र उनकी मंशा को प्रकट करता है। उस पर रोक लगाना उचित नहीं है। इसके अलावा 2006 की संविधान पीठ के फैसले को दर-किनार कर क्या दो न्यायमूर्तियों की खंड पीठ के फैसले को उचित ठहराया जा सकता है। अटार्नी जनरल से भी सलाह मांगी जा रही है। कुल मिला कर फैसले कितने ही ‘ग्रे एरियाज’ को एक्सप्लोर करने की जमीन छोड़ रहे है, जिसे अमल में लाना भी राजनीतिज्ञों के लिए टेढ़ी खीर साबित होगा।
देश में आम जनता इस फैसले से बहुत खुश है। लोग सोचते हैं कि देश का राजनैतिक गलियारा अब शायद साफ हो जाए। भ्रष्टाचार, कदाचार, महंगाई और अमीरी-गरीबी की भयंकर खाई से मुक्ति मिल जाए।यह फैसला उन जन-प्रतिनिधियों पर लागू है जिन्हें दो वर्ष कैद की सजा दी गई है। अब राजनीतिक दलों को ऐसे लोगों को चुनाव लड़वाना खतरे से खाली नहीं होगा जो किसी मामले में अभियुक्त हैं या अदालत में उन पर मामला चल रहा है और किसी भी दिन फैसला आ सकता है। उन पर हमेशा यह तलवार लटकती रहेगी कि जाने किस दिन वह अपनी कुर्सी से हाथ धो बैठें। तब उनके चुनाव पर लगा राजनीतिक दल का पैसा डूब जाए, जो वैध रूप से आठ लाख है और अवैध रूप से करोड़ों में है। तब पार्टी की अपनी बदनामी तो होगी ही और यदि सदन में पार्टी की हालत पतली है तो उसे और खराब होने में देर नहीं लगेगी। दागी लोगों को टिकट देना राजनीतिक लोगों के लिए खतरे से खाली नहीं होगा। राजनीतिक पार्टियां भी ऐसे लोगों को टिकट देने से पहले दस बार नहीं, बल्कि सौ बार सोचेंगी।
इसलिए इस फैसले से राजनीतिक पार्टियों में जबर्दस्त बेचैनी और हलचल दिखाई दे रही है। कारण कुछ भी हो, लेकिन कोई भी राजनीतिक पार्टी ऐसी नहीं है जो यह पूरे दम खम के साथ कह सके कि उनके किसी सदस्य के खिलाफ आपराधिक मुकदमा नहीं चल रहा है। इसीलिए वे कुछ भी बोलने में पूरी सावधानी बरत रही हैं। ”जन-प्रतिनिधि कानून की धारा आठ और उपधारा (1), (2), और (3) के तहत सजायाफ्ता जन-प्रतिनिधि सजा प्राप्ति के दिन से अपने पद से मुक्त समझा जाएगा और उस पर यह बंदिश उसकी सजा पूरी होने के बाद छह वर्षों तक लागू रहेगी।”सर्वोच्च न्यायालय का यह फैसला दो याचिकाओं पर सुनवाई के बाद आया है। इनमें से एक याचिका एक वकील लिलि थॉमस ने दायर की थी। दूसरी याचिका लोक प्रभारी ने अपने महासचिव एस.एन. शुक्ला की ओर से दायर की थी।

अदालत ने कहा है कि ”भारतीय संविधान के दो अनुच्छेदों 102(1)(ई) तथा 191 (1)(ई) को देखने से पता चलता है कि संसद का चुनाव लडऩे वाले और संसद तथा विधानसभा में बैठने वाले-दोनों प्रकार के लोगों के लिए समान कानून बना है। यह नहीं कि चुनाव लडऩे वालों के लिए एक कानून हो और चुन कर आने वालों के लिए दूसरा कानून हो। जन-प्रतिनिधित्व कानून की धारा 8 (4) चुने गए सांसदों और विधायकों के लिए अलग ही कानून बनाता है। अपवाद के तौर पर, जिसकी मनाही संविधान में स्पष्ट रूप से है। यह सच है कि संसद को अधिकार है कि वह कानून बनाए पर अपने दायरे में रह कर बनाए। वह संविधान का उल्लंघन न करे।”

”जब संविधान के अनुच्छेद 101(3)(9) तथा 190(3)(9) स्पष्ट रूप से कहते हैं कि संसद और विधानसभा में आने वालों के लिए एक कानून होगा, दो कानून नहीं होंगे। तो संसद ने सांसदों और विधायकों के लिए जो अलग-अलग कानून की व्यवस्था रखी है, वह असंवैधानिक है।”

वैसे भी आम आदमी की भाषा में कहा जाए तो किसी महत्वपूर्ण जगह में किसी आधार (आपराधिक आधार) पर प्रवेश पत्र पाने की प्रक्रिया में शामिल होना ही मना है तो जब कोई व्यक्ति पहले ही उस महत्वपूर्ण जगह आ चुका है तो उसे सादर वर्षों-दशकों अन्दर रहने की इजाजत देते रहना और उन्हें हम पर शासन करते देते रहना कितना खतरनाक हो सकता है। फिर ये अपराधी हमारे लिए कानून बनाने का, उसे पालन करवाने या न करवाने का अधिकार प्राप्त कर लेते हैं। और यही सब कुछ आजादी के बाद से यहां हो रहा है।

पहले चुनाव लडऩे वाले अपराधियों और गुंडों को पैसे देकर आम जनता को मजबूर करते थे कि वे उनके हक में अपना मत दें। धीरे-धीरे यह समय आ गया है कि इन अपराधियों को लगने लगा कि हमारी जरा सी गुंडागर्दी करने से ये लोग जीत जाते हैं और सत्ता का सुख भोगने लगते हैं और हम यदाकदा उनकी कृपा पाकर वहीं के वहीं रह जाते हैं तो क्यों नहीं हम ही अपनी कृपा से सत्तासीन हो जाएं। और हुआ भी वही। आज राजनीतिक पार्टियां ऐसे लोगों को टिकट देना सांसदों और विधायकों की गिनती बढ़ाने की सौ फीसदी गारंटी मानती हैं। पहले इस काम के लिए उत्तर प्रदेश और बिहार बदनाम थे, लेकिन आज यह काम पूरे देश में होता है। संसद और विधानसभाओं में आपराधिक प्रवृत्ति के लोगों की भरमार हो चुकी है। इसका खमियाजा आम जनता भुगत रही है।

अभी दस जुलाई 2013 को आए अदालत के फैसले से देश का राजनीतिक माहौल गरम था कि 11जुलाई 2013 को सर्वोच्च न्यायालय का एक और फैसला आ गया जिसमें माननीय अदालत ने कहा कि ”जो चुनाव में एक मत दे सकता है, वह ‘इलेक्टर’ है। वही चुनाव लड़ भी सकता है। एक व्यक्ति जेल में रहते हुए वोट नहीं दे सकता, वही व्यक्ति जेल में रह कर चुनाव कैसे लड़ सकता है? यानी जो खुद मतदाता की हैसियत नहीं रखता, वह दूसरों से अपने पक्ष में मत लेकर सांसद या विधायक बनने का अधिकार कैसे पा सकता है? पर यह कानून उन पर लागू नहीं होगा जो किसी अपराध की आशंका में बंद किए गए हैं। जिन्हें प्रिवेंटिव डिटेंशन में रखा गया है। जन-प्रतिनिधित्व कानून की धारा 4 और 5 के अन्तर्गत कहा गया है कि चुने जाने के लिए खुद मतदाता होना जरूरी है।”

यह फैसला पटना उच्च न्यायालय के उस फैसले पर अपनी सहमति की मुहर लगाता है जो गैर-सरकारी संस्था ‘जन-चौकीदार’ की ओर से दायर किया गया था। इसका फैसला 30 अप्रैल 2004 को आया था। फैसले में जेल में बंदी व्यक्ति के चुनाव लडऩे पर पाबंदी लगाई गई थी। जब फैसला आया तो उस वक्त लोकसभा चुनावों की प्रक्रिया शुरू हो चुकी थी। इसलिए मुख्य चुनाव आयुक्त को सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाना पड़ा था। सर्वोच्च न्यायालय ने उस वक्त इस फैसले पर रोक लगा दी थी। परन्तु नौ वर्ष बाद अब सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 326 के अन्तर्गत संसद ने जनप्रतिनिधि अधिनियम 1951 की धारा 62 के तहत मतदान की योग्यता का विवरण दिया है। मतदाता सूची में नाम दर्ज होने पर भी यदि कोई जेल में बंद है तो उसे मतदान का हक नहीं है। सर्वोच्च न्यायालय ने उच्च न्यायालय के फैसले के मुख्य अंशों को उद्धृत करते हुए कहा कि ”संविधान ने देश के नागरिक को मतदान का विशेषाधिकार दिया है, लेकिन विशेषाधिकार के साथ कुछ शर्तें भी जोड़ी हैं। बंदी होने पर मतदाता सूची में नाम दर्ज होने पर भी उसे मतदान का अधिकार नहीं है। इसके लिए जरूरी नहीं कि ऐसे व्यक्ति का नाम अस्थाई रूप से मतदाता सूची से हटाया जाए। जब मतदान का ही अधिकार नहीं है तो चुनाव लडऩे का अधिकार कैसा? ”

वैसे यह कुछ कम नहीं था कि इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने राजनीतिक दलों पर एक और कड़ा प्रहार करते हुए कहा कि उत्तर प्रदेश में जाति आधारित रैलियों पर रोक लगेगी। पीठ ने इसे संविधान की मंशा के खिलाफ बताते हुए कहा कि ”राजनीतिक पार्टियां व अन्य संगठन जातीय आधार पर रैलियां नहीं करेंगी।” पीठ ने प्रमुख राजनीतिक दलों-भारतीय जनता पार्टी, कांग्रेस पार्टी, समाजवादी पार्टी और बहुजनसमाज पार्टी को नोटिस जारी करते हुए जवाब तलब किया है। वरिष्ठ न्यायमूर्ति उमानाथ सिंह और न्यायमूर्ति महेन्द्र दयाल की खंड पीठ ने एक स्थानीय वकील मोतीलाल यादव द्वारा दायर एक जनहित याचिका पर यह आदेश दिया है।

याचिका में कहा गया है कि ”विभिन्न राजनीतिक दल चुनाव निकट आते ही जातीय आधार पर मतदाताओं को बांटने का काम करने लगते हैं। जातीय आधार पर रैली का आयोजन करना और चुनाव के बाद जाति विशेष के लोगों को अधिक लाभ देना संविधान तथा कानून-दोनों के खिलाफ है। इस तरह समाज को बांटने पर समाज में असंतुलन पैदा होता है और साफ-सुथरे चुनाव की आशा धूल में मिल जाती है। इससे राष्ट्रीय अखंडता पर भी असर पड़ता है। समाज में अलगाव व विघटन की स्थिति पैदा होती है। आपस में अविश्वास और असहिष्णुता बढ़ती है। चुनाव आयोग को ऐसी रैलियों पर कड़ा रूख अख्तियार करना चाहिए।” मांग की गई है कि ऐसी रैलियां करने वाले दलों का पंजीकरण रद्द किया जाना चाहिए। 29जून2013, 2मई 2013 और 17मई 2012 तथा अन्य तिथियों पर बहुजन समाज पार्टी ने ब्राहम्ण सम्मेलन कराए। भारतीय जनता पार्टी ने 13मई 2013 को, समाजवादी पार्टी ने 8मई 2013 व 11मई 2013 को तथा कांग्रेस ने 23 मई 2013 को ऐसी रैलियां कीं। छोटे-मोटे संगठन और राजनीतिक दल भी ऐसी रैलियां और प्रदर्शन करते रहते हैं। सदियों से चली आ रही विश्व में अपने आप में अकेली और विचित्र जातिगत, धर्मगत खाइयां वैसे ही भारत की तरक्की को रोकने में अपनी भूमिका निभा रही हैं। आजाद भारत के 65-66 वर्षों बाद भी संविधान द्वारा प्रदत्त समानता के अधिकार को उनके ही द्वारा ध्वस्त किया जाना जो देश चला रहे हैं, सचमुच एक शर्मनाक स्थिति हैं।

(लेखिका सर्वोच्च न्यायालय में अधिवक्ता और कई पुस्तकों की लेखिका हैं।)

कमलेश जैन

лобановский александрcargo air freight

Leave a Reply

Your email address will not be published.