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स्वतंत्र इच्छा शक्ति की परिकल्पना के बगैर है ज्योतिष ज्ञान अधूरा

तर्कपूर्ण आध्यात्मिक दृष्टिकोण से जीवन को देखने और समझने वाले आचार्य करनाल सिंह भारतीय पुलिस सेवा के वरिष्ठ अधिकारी वर्तमान में भारत सरकार के प्रवर्तन निदेशालय में विशेष निदेशक हैं। एमटेक(आईआईटी, कानपुर), एलएलबी और एमबीए करने के बावजूद जब ज्ञान पिपासा नहीं बुझी तो आचार्य करनाल सिंह ने वेद-पुराणों का अध्ययन शुरू कर दिया। अध्यात्म के प्रति जिज्ञासा उन्हें ज्योतिष की ओर ले आई। भारतीय विद्या भवन से ज्योतिष गुरू के.एन. राव के सान्निध्य में उन्होंने ज्योतिष का गहन अध्ययन किया और ज्योतिषाचार्य हो कर वह लंबे समय तक वह जिज्ञासुओं में इस ज्ञान को बांटते रहे। आज भी वह ज्ञान चर्चा में बहुत रूचि लेते हैं।

एक प्रसिद्ध वैज्ञानिक लाप्लॉस का विचार था-”अगर मुझे प्रकृति के सारे नियम पता चल जाएं, तो मैं भविष्य मंञ होने वाली हर घटना को पहले से ही बता सकता हूं।’’ लाप्लॉस, न्यूटोनियन मैकेनिक्स को मानने वाले वैज्ञानिक थे। न्यूटन तथा उस समय के वैज्ञानिकों का विचार था कि यह संसार एक घड़ी की तरह है, जिसका संचालन प्रकृति की शक्तियां, एक पूर्व निर्धारित तरीके से करती हैं। दुनिया के सबसे बड़े विद्वान माने जाने वाले वैज्ञानिक आईंस्टीन का भी यही विचार था।

उन्नीसवीं शताब्दी के अन्त में हैंसबर्ग ने अनश्चितवाद (अनसर्टेनिटी प्रिंसीपल) का प्रतिपादन किया। इसके अनुसार, यदि प्रकृति के सारे नियमों को जान भी लें तो भी हम भविष्य में होने वाली घटनाओं के बारे में निश्चित तौर पर नहीं कह सकते, बल्कि केवल संभावनाएं व्यक्त कर सकते हैं। आइन्सटीन व हैसनबर्ग के बीच जमकर वाद-विवाद भी हुआ, और आइन्सटीन ने यहां तक कह डाला कि ”गॉड डज नॉट प्ले डाइस।’’ यानी ईश्वर जुआ नहीं खेलता। परन्तु आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि आइन्सटीन को नोबल प्राइज फोटो इलेक्ट्रीक इफेक्ट की विवेचना पर मिला। जिसका आधार ‘हैसनबर्ग का अनिश्चतता वाद’ था। आज का वैज्ञानिक विचार है कि भविष्य में होने वाली घटनाओं की सम्भावनाएं बताई जा सकती हैं। परन्तु निश्चितरूप में कुछ नहीं कहा जा सकता।

यांत्रिकी विचारधारा के वैज्ञानिकों (न्यूटन, लॉप्लास इत्यादि) की तरह ही बहुत से ज्यातिषी भी कहते हैं, ”सब कुछ जन्म के समय ही निर्धारित हो जाता है। जन्म के समय के नक्षत्रों, तारों व राशियों की स्थिति देख कर भविष्य में होने वाली घटनाओं को निश्चिततौर पर बताया जा सकता है।’’

अगर इन की बातों को माना जाए तो भाग्य (प्रारब्ध) ही सब कुछ है, कर्म या इच्छा शक्ति का कोई स्थान नहीं। क्या यह विचार वैदिक विचारधारा के विरूद्ध नहीं?
ज्योतिष, एक वेदांग है। इसका तात्पर्य हुआ कि ज्योतिष का आधार वैदिक धर्म के आधारभूत सूत्र हैं। कर्म व स्वतन्त्र इच्छा शक्ति, वैदिक साहित्य का मूलभूत आधार हैं। कर्म व भाग्य का समन्वय ही ज्योतिष का आधार है।

मनुष्य को कर्म करने की स्वतन्त्रता है। और उस कर्म का फल, क्षण भर बाद भी मिल सकता है, तथा उसके हजारों साल बाद भी। इसको कुछ उदाहरणों द्वारा समझा जा सकता है।

क-अगर कोई व्यक्ति कई मंजिल ऊंची छत से कूद जाए तो उसका फल चोट या मृत्यु के रूप में तुरन्त मिल जाएगा।
ख-जब किसान खेत में गेहूं बोता है, तो उसका फल उसे 4-6 मास पर्यन्त मिलता है।
ग-जब माली, आम का पेड़ लगाता है, तो उसका फल 5-6 साल में जाकर मिलता है।

अत:, कर्म व उससे मिलने वाले फल के बीच का समयान्तराल एक क्षण भी हो सकता है और हजारों वर्ष भी। इसका तात्पर्य यह हुआ कि फल हमें इस जन्म या अगले जन्म या उसके बाद के जन्मों में भी मिल सकता है। जन्मों-जन्मों का कर्मफल संचित होता जाता है, जिसे हम संचित कर्म कहते हैं। उसी संचित कर्म के एक भाग (जिसका फल इस जन्म में मिलना निश्चित हुआ है) को प्रारब्ध कहते हैं। प्रारब्ध के संकेत ईश्वर अनेक तरीकों से मनुष्य को देता है। इनमें से कुछ अधोलिखित है:
अनुवांशिकी गुण
माता-पिता से मिले जीन्स, जन्म के समय ही, मनुष्य क्या बन सकता है कि संभावनाओं को व्यक्त करते हैं।

व्यक्ति की शारीरिक संरचना कैसी होगी? क्या गुण और रूझान होंगे? ये सब जीन्स के अध्ययन से पता चल सकता है। वृक्ष के बीज में वृक्ष होने की सब संभावनाएं होती हैं। ये संभावनाएं कितनी संभव हो सकेंगी, यह वातावरण पर निर्भर करेगा। अगर वातावरण ठीक न मिले तो हो सकता है, बीज वृक्ष ही न बने।

हस्त रेखाएं:
प्रकृति हस्त रेखाओं के द्वारा भी जीवन में होने वाली संभावनाओं को व्यक्त करती है।
सामुद्रिक ज्ञान
घ-आकाश में तारों, ग्रहों की स्थिति, जन्म के समय की इन खगोलीय पिंडों की स्थिति को जन्मपत्री द्वारा निरूपित किया जाता है।

इस प्रकार, जन्मपत्री में निर्देशित ज्ञान हमें इस जन्म की संभावनाओं/प्रारब्ध की सूचना देता है। परन्तु मनुष्य एक परिप्रेक्ष्य में समाज में रहता है। वातावरण उसको, अपनी संभावनाओं को व्यक्त करने का अवसर देता है। इस जन्म में किए गए कर्मों के फल को क्रियमाण कर्म कहते हैं। कुछ क्रियमाण कर्मों के फल इसी जन्म में मिलते हैं, बाकी क्रियमाण कर्म, संचित कर्मों में जुड़ जाते हैं।

इस प्रकार वैदिक धर्म (जो कर्म पर आधारित है) के विशलेषण से पता चलता है कि जन्म पत्री में निर्दिष्ट घटनाएं, क्रियमाण कर्मों के कारण वरिवर्तित हो सकती हैं। अत: ज्योतिष हमें भविष्य में होने वाली घटनाओं की संभावनाओं की तरफ निर्देश करता है। अगर हमें संभावनाओं का पता चल जाए तो हम उचित प्रयत्न करके आने वाली समस्याओं से अच्छी तरह से जूझ सकते हैं तथा अच्छी परिस्थितियों का उचित उपयोग कर सकते हैं।

इस विशलेषण से यह स्पष्ट हो जाता है कि वैदिक ज्योतिष का आधार, वैज्ञानिक अनिश्चततावाद से पूर्णतया सामंजस्य रखता है तथा कर्म व स्वतन्त्र इच्छा शक्ति की परिकल्पना के बिना ज्योतिष ज्ञान अधूरा है।

 

 

करनाल सिंह

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