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जेल में रहें भारतीय भाषाएं अंग्रेजी का गुलाम है आजाद भारत!

अपने देश में नागिरक को न्याय की रक्षा करते हुए फांसी प्राप्त करने का अधिकार है, लेकिन फांसी पर लटकने से पहले अपनी भाषा में यह जानने का अधिकार नहीं है, कि उसे फांसी किस लिये दी जा रही है। न्याय अंधा होता है, यह तो विश्व प्रसिद्ध है, लेकिन भारत में न्याय गूंगा भी है, क्योंकि वह इस देश की भाषा में नहीं बोलता। राम मनोहर लोहिया के शब्दों में कहना हो तो वह जादूगर की भाषा में बोलता है।

दिल्ली पुलिस ने श्याम रुद्र पाठक को आपराधिक प्रक्रिया संहिता की धारा 105 और 107 के अन्तर्गत गिरफ्तार कर लिया। पाठक पिछले 225 दिनों से सोनिया गान्धी के दिल्ली स्थित भारतीय घर के आगे धरना दे रहे थे। पाठक की मांग है कि उच्चतम न्यायालय समेत देश के सभी उच्च न्यायालयों में भारतीय भाषाओं में भी बहस करने की अनुमति दी जाएं। फिलहाल कुछ उच्च न्यायालयों को छोड़कर शेष सभी में अंग्रेजी में ही बोलने की अनुमति है और इस नियम का सख्ती से पालन किया जाता है।

श्याम रुद्र पाठक 1980 में दिल्ली आई.आई.टी के छात्र थे। प्रवेश परीक्षा में उन्होंने अव्वल दर्जा हासिल किया था। एम.टेक. की पढ़ाई ठीक ठाक चल रही थी कि अन्तिम वर्ष में अडंग़ा लग गया। पाठक ने अपने प्रकल्प की रपट हिन्दी में लिख कर जमा करवा दी। शायद तब चेतन भगत के उपन्यास पर ‘थ्री इडियट्स’ फिल्म नहीं बनी थी। संस्थान ने पाठक को डिग्री देने से इंकार कर दिया। मामला संसद तक पहुंचा। तब जाकर पाठक को डिग्री मिली। उन्होंने रपट को अंग्रेजी में लिखने से इंकार कर दिया, लेकिन इसके साथ ही अन्याय से लडऩे के लिए उन्होंने सांसारिक एषणाओं से भी मुक्ति प्राप्त कर ली। 1985 में उन्होंने मोर्चा जमा दिया कि आई.आई.टी प्रवेश परीक्षा भारतीय भाषाओं में भी होनी चाहिए। यह मोर्चा लम्बा चला। 1990 में जाकर भारत सरकार भारतीय भाषाओं के पक्ष में झुकी और पाठक की जीत हुई।

अब की बार पाठक जी का मोर्चा न्याय की भाषा बदलवाने के लिये है। अपने देश में बड़ी कचहरी की भाषा अंग्रेजी निश्चित की गई है। पाठक चाहते हैं कि यहां का न्याय भी भारतीय भाषाओं में बोले। संविधान बनाने वालों को भी इसका अंदेशा रहा होगा कि भविष्य में लोग न्याय को भारतीय भाषा में बोलने के लिए विवश कर सकते हैं। इसलिए उन्होंने पक्की व्यवस्था संविधान में ही कर दी कि उच्च न्यायालयों और उच्चतम न्यायालय की भाषा अंग्रेजी, केवल अंग्रेजी ही रहेगी। अपने देश में नागिरक को न्याय की रक्षा करते हुये फांसी प्राप्त करने का अधिकार है, लेकिन फांसी पर लटकने से पहले अपनी भाषा में यह जानने का अधिकार नहीं है, कि उसे फांसी किस लिये दी जा रही है। न्याय अंधा होता है, यह तो विश्व प्रसिद्ध है, लेकिन भारत में न्याय गूंगा भी है, क्योंकि वह इस देश की भाषा में नहीं बोलता। राम मनोहर लोहिया के शब्दों में कहना हो तो वह जादूगर की भाषा में बोलता है। जादूगर की भाषा दर्शकों के मन में आतंक तो पैदा कर सकती है, लेकिन समझ पैदा नहीं कर सकती। अंग्रेजों को इस देश के लोगों के मन में न्यायिक आतंक पैदा करने की जरूरत थी, लेकिन लोकमत से चुनी सरकार न्याय के नाम पर आतंक क्यों पैदा करना चाहती है, यह समझ से परे है।

जो समय में आया उसके अनुसार तो मुझे लगता है अंग्रेजी कचहरी में मुवक्किल को डराने के काम आती है। उससे कानून और न्याय का रौब बरकरार रहता है। मैंने अपने मुवक्किल से फीस के पांच सौ रुपये लिए थे, जो उन दिनों के हिसाब से भी और केस की धाराओं के हिसाब से भी ज्यादा थे। अब इस फीस का औचित्य सिद्ध करने के लिए मुझे कुछ न कुछ ऊटपटांग अंग्रेजी में बोलना ही था। न्याय और जनता के बीच से यदि अंग्रेजी का पर्दा हट गया तो न जाने किन किन का मायावी संसार मिट्टी में मिल जाएगा।

अब पाठक जी उसी पर्दे को हटाने की जिद पकड़ कर बैठ गए हैं। लेकिन पाठक की एक दिक्कत है। वह सीधे न्यायपालिका से बात नहीं कर सकते, क्योंकि उनका संकल्प है कि वे भारत की भाषा में बात करेंगे, जिसका इन्दराज संविधान की आठवीं सूची में है। जिस तरह कभी महात्मा गान्धी ने दलितों के मंदिर प्रवेश के लिए आन्दोलन चलाया था, उसी तरह पाठक भारत माता के न्याय मंदिर में भारतीय भाषाओं के प्रवेश के लिए हठ कर रहे हैं।

तर्क दूसरे पक्ष का भी मजबूत है। कम्पनी बहादुर और बाद में अंग्रेज बहादुर तो विवशता में इस देश को छोड़ कर चले गए। अब इस देश में जो उनके वारिस हैं, उनके पास उन पूर्वजों की कितनी चीजें बची हैं? हमने तो लार्ड माऊंटबेटन को भी देश में संभाल कर रखने की कोशिश की थी। उन्हें अपना गवर्नर जनरल भी बना लिया था, लेकिन कितने दिन रख पाए? दिल पर पत्थर रख कर लंदन भेजना पड़ा। फिर नागार्जुन बाबा के शब्दों में हमने आजाद भारत में भी इंग्लैंड की महारानी की पालकी ढोई, क्योंकि ‘आओ।़ रानी हम ढोएंगे पालकी, यही हुई है राय जवाहर लाल की’। लेकिन वह भी कितनी बार ढो पाते? अब ले देकर उनकी याद, एक न्याय व्यवस्था बची है। क्या इसको भी गंवा दें? इतने कृतघ्न तो हम नहीं हैं। इस न्याय व्यवस्था की भारत में रहने की एक ही शर्त है कि यह अंग्रेजी में बोलती है, अंग्रेज़ी में ही सुनती है और अंग्रेजी में फांसी पर लटकाने
का आदेश देती है। इस व्यवस्था के आगे पूरा राष्ट्र गूंगा हो जाता है। लेकिन उससे क्या? इस देश का गूंगा रहना ही ठीक है। लोकमान्य तिलक, महात्मा गान्धी, डा. हेडगेवार ने इसे अपनी भाषा में बोलने का साहस बंधा दिया था तो इसने अंग्रेज बहादुर को ही सात समुद्र पार पहुंचा दिया। इसलिए इसका चुप रहना ही हितकर है। जब यह बोलता है तो सिंहासन हिल जाता है। सत्ताधीश धूल चाटते हैं। इस लिये इस देश को अंग्रेजी के भाषायी आतंक से डरा कर चुप रखना ही शासक वर्ग के हित में है। शायद इसीलिये पूरा शासक वर्ग पाठक के खिलाफ मोर्चा लगा कर बैठा है। देश के आम आदमी को उसकी औकात में रखना ही श्रेयस्कर है। आज न्याय व्यवस्था को भारतीय भाषाएं बोलने के लिये कह रहा है, कल आभिजात्य शासक वर्ग को भी भारतीय भाषा लिखने-बोलने को कह सकता है। इसलिए पूरा तंत्र पाठक को पहले मोर्चे पर ही शिकस्त देने के लिए आमादा है।

अलेकिन एक प्रश्न अभी अनुत्तरित है। श्याम रुद्र पाठक या यों कहिए कि भारतीय भाषाओं ने अपने अधिकार की मांग के लिए सोनिया गान्धी के भारतीय घर के आगे ही धरना क्यों दिया? दूसरे हिस्से का उत्तर तो आसान है। कोई भी दे सकता है। सोनिया गांधी का इटली वाला घर बहुत दूर है। वहां जाने के लिए भारतीयों को वीजा लेना पड़ता है। इसलिए वहां जाकर सत्याग्रह करना संभव नहीं था। इसी कारण से उनके भारत के घर का चयन किया गया होगा। लेकिन सोनिया गांधी के घर के आगे ही क्यों? हो सकता है कि भारतीय भाषाओं के समर्थकों को लगता हो कि गोरी नस्ल के पुराने हाकिमों की विरासत असल में भारत में गोरी नस्ल ने ही हिफाजत से संभाली हुई है। अपने घरेलू लोग तो उस समय भी दरबारियों की भूमिका में ही थे और आज लगभग सात दशक बाद भी उसी भूमिका में सिर पर मोर पंख लगाएं खीसें निपोर रहे हैं। लेकिन आम आदमी तो इतने साल में जान ही गया है कि भारत की नई हर मैजिस्टी का निवास कहां है। तो एक बार फिर लड़ाई वहीं से क्यों न शुरू की जाएं। देखना है कि अंग्रेजी द्वारा गूंगा बना दिया गया राष्ट्र क्या एक बार फिर बोलना शुरू करेगा। इतिहास गवाह है जब लोग अपनी भाषा में बोलना शुरू कर देते हैं तो ‘हिज मैजिस्टी’ हो या ‘हर मैजिस्टी’, सभी के तम्बू एक झटके में उखड़ जाते हैं। लेकिन फिलहाल तो श्याम रुद्र पाठक जेल में है और आचार्य रघुवीर व राम मनोहर लोहिया की विरासत को संभालने का दावा करने वाले मौन हैं। लेकिन पाठक तिहाड़ में भी मुखर हैं। उनका कहना है कि ‘अंग्रेजी हमारे ऊपर शासन करने वाले विदेशियों की भाषा है। अभिजात्य वर्ग की इस भाषा को खत्म करने के लिए उनका सत्याग्रह चलता रहेगा।’ यह सत्याग्रह केवल पाठक का नहीं है, बल्कि भारतीय अस्मिता व पहचान का है। पाठक तो , मात्र इसके माध्यम भर हैं।

 

डॉ. कुलदीप चन्द अग्निहोत्री

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