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रूपये की गिरावट ने धकेला अंधेरी गुफा में

अर्थव्यवस्था को सस्ती वित्तीय मुद्रा देने के नाम पर ईसीबी और एफसीसीबी के अनियंत्रित अनुमोदन, जिससे बाहरी ऋण 35 प्रतिशत तक बढ़ गया है, भारतीय रूपये की गिरावट का एक महत्वपूर्ण कारण माना जाना चाहिए। रिजर्व बैंक की वर्तमान नीति शायद राजनैतिक दुव्र्यवस्था से खासा प्रभावित दिख रही है। जबकि होना ठीक इसके विपरीत चाहिए था। भारतीय केन्द्रीय बैंक की विसंगतिपूर्ण रीति-नीति के लिए कौन जिम्मेदार है, इसका विश्लेषण शायद आने वाले समय में हो सके।भारतीय रूपये का अवमूल्यन या सामान्य भाषा में कहें तो अनियंत्रित गिरावट एक ऐसा ऐतिहासिक सत्य है, जिसे आर्थिक तथ्यों के आधार पर होना था। 2007-08 से ही इसकी भूमिका बंधनी प्रारंभ हो गयी थी। लेकिन तब भी विश्व के सभी केन्द्रीय बैंक, जिनमें अमेरिका का फेडरल बैंक प्रमुख है, लगातार वैश्विक सकल उत्पाद का 16-17 प्रतिशत मुद्रा विश्व बाजार में जबरन डालता रहा था। उसकी कीमत तकरीबन 12 से 14 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर थी। यही कारण था कि संकट टलता गया। अभी हाल ही के वैश्विक शेयर, बॉण्ड और मुद्रा के बेचान और फेडरल बैंक के 85 बिलियन डॉलर की परिसंपत्ति खरीद कार्यक्रम में संकोचन के स्पष्ट संकेतों ने बॉण्ड मार्केट के बाह्य प्रभावों की बाढ़ ला दी। यह परिस्थिति मई 2013 के दौरान तीव्रतम हुई। यही कारण है कि कोई संयोग नहीं था कि विश्व की सारी उभरती अर्थव्यवस्थाएं, जिनमें करेंट अकाउंट घाटा लंबे-चौड़े थे। जैसे की इंडोनेशिया, दक्षिण अफ्रीका, ब्राजील, भारत, चिली आदि सभी देशों की मुद्राओं में तेजी से गिरावट हुई। सैद्धांतिक रुप से भारतीय मुद्रा के गिरने का कारण, भारतीय अर्थव्यवस्था के समष्टि कारकों में ही छिपे हैं। लगातार गिरती हुई विकास दर, उच्च से उच्चतम होती मुद्रास्फीति, करेंट अकाउंट घाटा, जो कि संस्थागत विदेशी निवेशकों (एफआईआई) पर ही निर्भर है, उसी का परिणाम है। यह सब ऐसा खतरनाक अभियान था कि रूपये को गिरना ही था। बढ़ते आयात, जिनमें कच्चा तेल, सोना, कोयला, उर्वरक, खाद्य तेल आदि के मद से, जो भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए निर्भरता का पारंपरिक मद हैं, इनमें कमी नहीं की जा सकती थी। ऐसे समय में यह केवल विसंगति ही थी कि यूपीए जनता को भ्रमित करने के लिए आशा और अपेक्षा का एक ऐसा दृष्टिभ्रम देती गयी, जिसका अंत रूपये में गिरावट की निश्चित सुरंग में होना था।

अर्थव्यवस्था को सस्ती वित्तीय मुद्रा देने के नाम पर ईसीबी और एफसीसीबी के अनियंत्रित अनुमोदन, जिससे बाहरी ऋण 35 प्रतिशत तक बढ़ गया है, भारतीय रूपये की गिरावट का एक महत्वपूर्ण कारण माना जाना चाहिए। रिजर्व बैंक की वर्तमान नीति शायद राजनैतिक दुव्र्यवस्था से खासा प्रभावित दिख रही है। जबकि होना ठीक इसके विपरीत चाहिए था। भारतीय केन्द्रीय बैंक की विसंगतिपूर्ण रीति-नीति के लिए कौन जिम्मेदार है, इसका विश्लेषण शायद आने वाले समय में हो सके। वर्तमान में तो इतना ही समझ में आता है कि केन्द्रीय बैंक की दखलअंदाजी से, जो एक प्रभावोत्पादक दृश्य बनना चाहिए था, वैसा कुछ हो ही नहीं सका। पिछले सप्ताह में रिजर्व बैंक ने कुछ यांत्रिक कदम उठाए, लेकिन जब संस्थागत ढ़ांचा ही बिगड़ा है, यह तकनीकी कदम क्या कर पाएंगे।

कहां ले जाएगा गिरता रूपया?
सबसे बड़ी दुर्घटना तो यह हुई है कि भारत में मुद्रास्फीति को रोकने का कोई भी प्रयत्न अब कारगर सिद्ध नहीं होगा। वैश्विक हलचलें, वैश्विक दामों में परिवर्तन, आयात का अलचीलापन और भारत की गिरती विकास दर, इन सबके संयोग से यह लगभग तय हो गया है कि आने वाली दशाब्दी, अनियंत्रित मुद्रास्फीति की दशाब्दी होगी। यह ज्ञात तथ्य है कि भारत के सभी आयात अलचीले हैं। खाद्य तेल की 70 प्रतिशत जरूरतों की पूर्ति आयातित तेल से होती है। ठीक इसी रूपये में गिरावट के कारण कच्चा तेल के आयात भुगतान में वृद्धि से ऑयल वितरण कंपनियों की अंडर रिकवरी में लगातार बढ़ोत्तरी होगी और सब्सिडी के बोझ में वृद्धि होती रहेगी। इससे वित्तीय ढ़ांचा स्पष्ट तौर पर गड़बड़ाएगा। भारतीय मैनुफैक्चरिंग क्षेत्र की अधिकांश कंपनियां, जो अपना 25 से 30 प्रतिशत फॉरेक्स हेज नहीं रखतीं, वह भी अपने लाभांश माध्यमों में लगातार गिरावट महसूस करेंगे। जबकि होना यह चाहिए था कि रूपए के अवमूल्यन से भारत जैसे विकासशील राष्ट्र की मांग की लोच को देखते हुए निर्यात बाजार में तेजी से प्रसारित होना चाहिए था। साथ ही साथ आयात प्रतिस्थापन के इतने वर्षों बाद आयात बिल भी एक सीमा तक नियंत्रित हो जाना चाहिए था। लेकिन ऐसा हुआ नहीं, क्योंकि भारत में दोनों परिदृश्यों पर मूल रूप से मेहनत की ही नहीं गयी। अर्थव्यवस्था के विषय में एक अजीब सी अवधारणा को स्वीकार कर लिया गया कि भारतीय अर्थव्यवस्था के फंडामेंटल इतने मजबूत हैं कि वैश्विक हलचलों का हम पर वैसा दुष्प्रभाव पड़ेगा ही नहीं। मोंटेक सिंह अहलुवालिया ने लगातार यही अवधारणा मीडिया में बेची और कांग्रेस के थिंकटैंक ने बड़े शौक से खरीदा भी। लेकिन अंतत: इस विषय की पड़ताल किसी ने नहीं की कि भारत की अर्थव्यवस्था के निर्णायक फंडामेंटल, 2004 से ही बिगडऩे आरंभ हो गए थे। कांग्रेस ने लगातार ग्लोबल कारकों का हवाला देकर विषय को कालीन के नीचे सरकाने का काम जारी रखा। लेकिन 2009 के बाद स्थिति लगभग अनियंत्रित होती गयी। निर्यात की अपेक्षाएं भी पूरी होने वाली नहीं थीं, क्योंकि अन्य वैश्विक मुद्राओं में भी साझा गिरावट जारी थी। उससे जो स्पर्धा निर्माण हुई, उसमें से भारतीय अर्थव्यवस्था को मिलने वाले शुद्ध लाभ का प्रतिशत लगातार गिरने ही वाला था, क्योंकि हम निर्यात बाजार में स्पर्धाशील होने का कोई प्रयत्न वास्तव में कर ही नहीं रहे थे। तब तक सतर्कता प्रभाव के भरोसे आर्थिक स्थिरता रखी जा सकती थी।

यद्यपि गिरते रूपये से आयात करने वाली कंपनियों का गहरा नुकसान है, तब भी कपड़े और अन्य छोटे-मोटे उत्पादकों को स्पर्धा का मामूली लाभ होगा। विशुद्ध निर्यात क्षेत्र, जैसे कि फर्मास्यूटिकल, कपड़ा उद्योग, आईटी और उससे संबद्ध क्षेत्रों का शायद थोड़ा बहुत फायदा हो, किंतु इस सेक्टर को भी अंतर्राष्ट्रीय स्पर्धा का सामना करना पड़ता है। इसलिए गिरते रूपये का लाभ इन्हें भी शायद पूरा-पूरा नहीं मिलेगा। एक अनुमान के अनुसार, लगभग 70 बिलियन यूएस डॉलर की अपना 80-90 प्रतिशत उत्पादन अंतर्राष्ट्रीय बाजार से करने वाला आईटी सेक्टर, खासे फायदे में रहेगा। लेकिन पिछले कुछ दिनों में यह अनुभव भी सामने आया कि इस प्रकार का लाभ केवल अल्पकालीन ही हो सकती है, क्योंकि दीर्घकाल में इस प्रकार के सौदों में कीमतें समायोजित हो ही जाती हैं। विसंगति तब होती है, जब देशी मुद्रा का अवमूल्यन तो हो जाता है, लेकिन अंतर्राष्ट्रीय कीमतों का समायोजन हो जाने पर निर्यातक सेक्टर को उनके पूरे लाभ मिल पाते। दूसरा कारण यह भी है कि पिछले कुछ हफ्तों में रूपये का अवमूल्यन अचानक और तेजी से हुआ। ऐसी स्थिति में निर्यातकों को उसका पूरा लाभ कभी नहीं मिल सकता।

कच्चे माल के सेक्टर में, जबकि अंतर्राष्ट्रीय कीमतों में गिरावट हो रही होगी, तब भी डॉलर के मुकाबले रूपये में गिरावटों के कारण हमें अधिक भुगतान करना होगा। यह स्थिति बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है, क्योंकि कच्चे तेल के लिए किए गए भुगतान पर भारत के मुद्रास्फीति बड़ी प्रतिशतता पर टिकी हुई है। लगभग सभी आयात महंगे हो जाएंगे। व्यवसायिक घराने, जो देशी मुद्रा में ऋण लेते हैं, वे भी विदेशी मुद्रा में ब्याज को भारतीय रूपये के मुकाबले ज्यादा आकर्षक पाएंगे। इसका परिणाम भी अर्थव्यवस्था पर ऋणात्मक ही होगा। अभी हाल ही में पिछले बजट के दौरान प्रधानमंत्री के प्रमुख आर्थिक सलाहकार प्रो. रघु रामराजन ने भारत के ‘युवा डेमोग्राफिक डिवीडेंट’ की बात कही थी। विदेशों में जाकर पढ़ाई करने और भारतीय अर्थव्यवस्था को गति देने में भूमिका निभाने वाले भारतीय विद्यार्थी भी बहुत ज्यादा हतोत्साहित होंगे। क्योंकि रूपये में प्रत्येक गिरावट के साथ उनका खर्च दुगना-तीगुना हो गया है। एसोचैम के अनुसार, एक सामान्य भारतीय विद्यार्थी की फीस 20 से 30 हजार यूएस डॉलर होती है। इसमें अगर ट्यूशन फीस और रहने-खाने के खर्चे को जोड़ लिया जाए तो रूपए में गिरावट के कारण भारतीय विद्यार्थियों के बजट में काफी बड़ी वृद्धि हो जाती है। ठीक इसी प्रकार, अगले वर्ष विदेश जाने का सपना देखने वाले विद्यार्थियों को टोफेल, आईईएलटीएस, जीआरई और जीमैट जैसे अंतर्राष्ट्रीय स्तर की परीक्षाओं की भारी फीस देनी होगी। एसोचैम के अध्ययन के अनुसार, प्रतिवर्ष 6 से 8 लाख भारतीय विद्यार्थी शिक्षा ग्रहण करने के लिए विदेश जाते हैं। इनमें अमरीका और यूरोपीय देशों में जाने वाले विद्यार्थियों की संख्या सबसे ज्यादा है। इस हिसाब से तकरीबन 100 हजार करोड़ रूपये की भारतीय मुद्रा देश से बाहर जाती है। रूपए के अवमूल्यन के साथ ही यह आंकड़ा और भी बढ़ जाएगा। इसके विपरीत यह भी हो सकता है कि विदेश जाकर अध्ययन करने वाले विद्यार्थियों की संख्या में अप्रत्याशित गिरावट हो जाए। वर्तमान में विदेशी और भारतीय एमएनसी में जिस प्रकार की प्रवृत्ति चल रही है, उसमें शिक्षा पर निवेश भारतीय अर्थव्यवस्था को अच्छे रिटर्न दे रहा था। इस दृष्टि से भी भारतीय रूपये का गिरना भी निराशाजनक रहेगा।

अगर कुछ समय के लिए यह मान लें कि रूपये में गिरावट की दर में वृद्धि, अंतर्राष्ट्रीय दबावों के कारण ही हुई है, तो भी इसके समाधान शुद्ध देशीय हो सकते हैं। यह समझना जरूरी है कि व्यापार घाटा कम करने जैसे परंपरागत उपाय अब भी जरूरी है। सिर्फ रिजर्व बैंक की बाजीगरी से काम नहीं चलेगा। जबकि यह और भी महत्वपूर्ण हो जाता है कि रिजर्व बैंक कहां, कितनी और कैसी दखलअंदाजी करता है। शायद यह समय भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए गहन मंथन और ठोस ऐक्शन का है। यूपीए सरकार ने अपना सारा का सारा ऐक्शन एफडीआई उन्मुखी कर लिया है। हालांकि यह सच है कि भारत में एक बड़े एफडीआई इनफ्लो की आवश्यकता है, लेकिन यह एफडीआई इनफ्लो भारत की ढ़ांचागत विकास की आवश्यकताओं के अनुरूप होना चाहिए। तभी इसके दीर्घकालिक फायदे हो सकते हैं। रिटेल में एफडीआई के खोलने और कुछ सेक्टर में इसकी उच्चतम सीमा बढ़ाने से कौन से सुधार होंगे, यह शायद यूपीए का थिंकटैंक ही बेहतर बता सकता है। सामान्य अर्थशास्त्री यही सुझाता है कि ढ़ांचागत क्षेत्रों में निवेश होना चाहिए।

भारत को अपने परंपरागत निर्यात क्षेत्रों में नवीन भौगोलिक विस्तार ढ़ूढऩे होंगे। आईटी सेक्टर को अमेरिका और यूरोपियन देशों की सीमाओं से बाहर भेजने की कोशिश करनी होगी। साथ ही साथ चीन से व्यापारिक संबंधों को पुन: परिभाषित करना होगा। पाकिस्तान, बांग्लादेश और लैटिन अमेरिकी देशों से व्यापार को पुनर्निरीक्षित करना होगा। इसके अतिरिक्त आंतरिक अर्थव्यवस्था में सुधार, पूरी राजनैतिक इच्छाशक्ति के साथ करने का माद्दा भी भारत को दिखाना होगा। अमत्र्य सेन जैसे अर्थशास्त्रियों के प्रभाव क्षेत्र से बाहर निकलकर अगर वास्तविक सुधार, सामाजिक न्याय और विकास के संतुलित मॉडल का एक बार फिर से पुन: निरीक्षण कर सकें तो शायद कई अनुपूरक प्रश्नों के उत्तर मिल सकेंगे।

 

प्रो. ज्योति किरण

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