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एक अनूठा नंदी

इस मंदिर की स्थापना 16वीं शताब्दी में केंपा गौड़ा ने की थी। स्थानीय सरदार कैंपा गोड़ा ने सन् 1537 में बैंगलुरू नगर की नींव डाली डाली थी। मंदिर में भूरे पत्थर के नंदी की स्थापना की गई। यह मूर्ति एक ही पत्थर को काटकर गढ़ी गई है। नंदी के चेहरे पर मुस्कान वाली इस मूर्ति में कहीं कोई जोड़ नहीं है। इसकी ऊंचाई 4.67 मीटर (15.5 फुट) और लंबाई 6.13 मीटर (22 फुट) है। संस्कृत में नंदी का अर्थ है ‘आनंद दायक’।

बैंगलुरू असाधारण नगर है। इस अत्याधुनिक नगर ने सूचना प्रौद्योगिकी में क्रांति कर दी है। इसका ‘एशिया का सिलिकन नगर’ नामकरण उचित है। नवीनतम प्रौद्योगिकी के साथ यह नगर प्राचीन भी है। यहां अनेक मंदिर और स्थापत्य के स्मारक इसके सुनहरे अतीत की कहानी कहते हैं। भव्य अतीत और वर्तमान के साथ नई पीढ़ी के मन में यह नगर उज्जवल भविष्य की आशा जगाता है। यहां के मंदिर अतीत और भविष्य के बीच जीवित संपर्क सूत्र हैं।

दक्षिण बैंगलुरू में बासवनगुडी का नंदी मंदिर ऐसा ही उल्लेखनीय स्मारक है। नंदी मंदिर के कारण इस सड़क का नाम ‘नंदी मंदिर मार्ग’ पड़ गया है। कन्नड़ में बासव का अर्थ है- नंदी या बैल, और गुडी का अर्थ है मंदिर। ‘नंदी मंदिर’ के कारण ही यह स्थान ‘बासवनगुडी’ कहलाता है।

इस मंदिर की स्थापना 16वीं शताब्दी में कैंपा गौड़ा ने की थी। स्थानीय सरदार कैंपा गोड़ा ने सन् 1537 में बैंगलुरू नगर की नींव डाली डाली थी। मंदिर में भूरे पत्थर के नंदी की स्थापना की गई। यह मूर्ति एक ही पत्थर को काटकर गढ़ी गई है। नंदी के चेहरे पर मुस्कान वाली इस मूर्ति में कहीं कोई जोड़ नहीं है। इसकी ऊंचाई 4.67 मीटर (15.5 फुट) और लंबाई 6.13 मीटर (22 फुट) है। संस्कृत में नंदी का अर्थ है ‘आनंद दायक’।

यह मंदिर द्रविड़ स्थापत्य कला का सर्वोत्तम उदाहरण है। साथ ही यह विश्व में नंदी का सबसे बड़ा मंदिर है। नंदी शिवजी का वाहन है। इस मंदिर की स्थापना के बारे में एक कथा प्रचलित है, जिसके अनुसार इस क्षेत्र में उगनेवाली मूंगफली की सारी फसल एक बैल नष्ट कर देता था। उसे शांत और संतुष्ट करने के लिए यहां नंदी मंदिर का निर्माण किया गया। कथा है कि किसानों ने यहां हर वर्ष कार्तिक मास (नवंबर-दिसंबर) में एक महीने तक कदलेकाई पारशे (मूंगफली मेला) लगाने का निश्चय किया, तो उक्त बैल ने मूंगफली की फसल को नष्ट करना बंद कर दिया। मेले के दौरान यहां सड़क के दोनों तरफ मूंगफली के ऊंचे-ऊंचे टीले बन जाते हैं। हजारों लोग मेले में मूंगफली की थोक बिक्री के लिए आते हैं।

दक्षिण बैंगलुरू में पद्मनाभनगर की निवासी श्रीमती गीता सुब्रमण्यम कहती हैं – ‘यह कादलेकाई पारशे 14वीं या 15वीं शताब्दी में लगना शुरू हुआ था, लेकिन बैंगलुरू नगर में यह आज तक चल रहा है। हम इसे त्योहार की तरह मनाते हैं। इस का मतलब यह है कि हम कितने ही आधुनिक और तकनीकी रूप से विकसित क्यों न हो जाएं, पर हम अपनी परंपरा और विरासत को नहीं छोड़ सकते। यही हमारी पहचान है।’
आज कंप्यूटर के खेलों का प्रचलन है। नई पीढ़ी इन खेलों की दीवानी है। पर एक प्राचीन परंपरा को जीवित रखने के लिए कदलेकाई पारशे में अवश्य आना चाहिए। बैंगलुरू के विश्वप्रिया इलाके की श्रीमती सुकन्या श्रीकांत का कहना है कि ‘कादलेकाई पारशे हमें आनंद से भर देता है। जब मैं छोटी थी, हम नंदी मंदिर के पास
हनुमंतनगर में रहते थे। मेरे माता-पिता मुझे मेले में ले जाते थे। बाद में जब मैं हाईस्कूल में पढऩे लगी, तो मेरी सारी सहेलियां मेले में जाती थीं। कादलेकाई पारशे तो हमारे जीवन का ही अंग है।’
मंदिर तक जानेवाली सीढिय़ों की संरचना ही भव्य है। मंदिर एक प्रसिद्ध चट्टान पर बना है, जहां चारों तरफ घने पेड़ हैं। इस मंदिर ने बैंगलुरू के लाखों निवासियों के जीवन में बड़ी भूमिका निभाई है। स्टेट बैंक ऑफ इंडिया में काम करने वाले एस. एन. जयंत का कहना है – ‘मैं जब बी.कॉम कर रहा था, तब मैं कॉलेज से लौटने के बाद नंदी मंदिर के परिसर में बैठकर गणित और सांख्यिकी पढ़ता था और अभ्यास करता था। तब यहां बहुत शांति होती थी। यातायात नहीं के बराबर था। यहां पढ़ाई करने में किसी तरह की कोई बाधा नहीं होती थी। हमारा घर बहुत छोटा था। घर में पढ़ाई के लिए अलग से कोई कमरा नहीं था। यह 70 के दशक के अंतिम और 80 के दशक के आरंभ की बात है। मंदिर के सामने नल लगा था। मैं यहां आकर पेट भर पानी पीता था और घर जाने से पहले यहां बैठकर घंटों पढ़ाई करता था। मैं उन दिनों को भूल नहीं सकता। मैं जब कभी मंदिर आता हूं तो वे यादें उमडऩे लगती हैं।’

बसवनागुड़ी में स्थानीय और विदेशी पर्यटकों का तांता लगा रहता है। अवकाश के दिन और रविवार को यहां भारी भीड़ होती है। पर्यटक बस सेवा चलाने वाले सारे ऑपरेटर यात्रियों को यहां अवश्य लाते हैं। कर्नाटक राज्य परिवहन विकास निगम लक्जरी बसों में पर्यटकों को यहां लाता-ले जाता है। इन बसों का ब्रांड नाम है – ‘इंक्रेडिबल इंडिया’ ।

यहां स्थापित भव्य नंदी की मूर्ति का मुंह उत्तर की ओर है। जो हल्का-सा उत्तर-पश्चिम की ओर झुका है। नंदी के बैठने का ढंग बहुत शानदार है। पूरी दुनिया में जो परिवर्तन हो रहे हैं, उनकी गवाह यह नंदी मूर्ति है, जो हर पीढ़ी को यह संदेश दे रही लगती है कि समय-समय पर समाज बदलता रहता है, लेकिन समाज को संचालित करने वाले मूल्य वही रहते हैं।

 

एस. ए. हेमंत कुमार

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