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सौदेबाजी वाली सरकार राज्य के हित में नहीं है: बाबूलाल मरांडी

झारखंड के प्रथम मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी ने राज्य और देश की राजनीति से उठते ज्वलंत मुद्दों पर उदय इंडिया के कार्यकारी संपादक श्रीकान्त शर्मा से बेबाक बातचीत की। प्रस्तुत है यहां उस बातचीत के कुछ अंश…झारखंड के राजनीतिक परिदृष्य पर आपकी क्या टिप्पणी है?
झारखंड भी इसी देश में है, तो झारखंड की राजनीति, देश की राजनीति से अलग कैसे हो सकती है? जो कुछ देश की राजनीति में हो रहा है, वही कुछ झारखंड में हो रहा है। झारखंड की चर्चा अधिक है। छोटा राज्य है। गरीब राज्य है। इसलिए जैसी की कहावत है-‘गरीब दी जोरू, सबकी भाभी।’ वही झारखंड के साथ भी सत्य हो रहा है।

झारखंड के वर्तमान हालात के लिए किसे जिम्मेदार मानते हैं?
झारखंड की परिस्थितियों के लिए देश के दोनों बड़े राष्ट्रीय दल-भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस, समान रूप से जिम्मेदार हैं। झारखंड बनने के बाद प्रथम मुख्यमंत्री के तौर पर जब मैंने 2003 में राज्य की सत्ता छोड़ी तो बीजेपी ने सरकार बनाने के लिए सभी शर्तें मान लीं। बल्कि कहें तो सौदेबाजी कर ली। राजनीति में समझौते तो होते ही हैं। राजनीतिक समझौते जरूरी भी होते हैं। लेकिन वह राजनीतिक समझौता नहीं था। वह तो सौदेबाजी थी। सौदेबाजी खतरनाक होती है। 2005 में कांग्रेस ने शिबु सोरेन को मुख्यमंत्री बनवा दिया। फिर भारतीय जनता पार्टी ने सरकार बनाई, जो लगभग डेढ़ साल चली, लेकिन 2006 में कांग्रेस ने उसका बदला ले लिया और निर्दलीय उम्मीदवार मधु कौड़ा को मुख्य मंत्री बनवा दिया। मधु कौड़ा की सरकार दो साल चली। शिबु सोरेन ने मधु कौड़ा की सरकार गिरा दी और 2008 में शिबु सोरेन ने उसी गठबंधन की अपनी सरकार बना ली। लेकिन शिबु सोरेन विधानसभा के सदस्य नहीं थे। विधानसभा के सदस्य बनने के लिए उन्होंने चुनाव लड़ा, लेकिन चुनाव हार गए। शिबु सोरेन की सरकार पांच महीने से अधिक नहीं चली। भारतीय जनता पार्टी शिबु सोरेन से नाराज थी। उसने शिबु सोरेन की सरकार गिरा दी। भारतीय जनता पार्टी यदि उनकी सरकार नहीं गिराती, तो भी शिबु सोरेन की सरकार गिरनी ही थी। वह विधानसभा के सदस्य ही नहीं बन सके थे। तीन महीने राष्ट्रपति शासन रहा। 2010 में अर्जुन मुंडा की भारतीय जनता पार्टी की सरकार फिर बनी जो 28 महीने चल कर इसी साल जनवरी में गिर गई। राज्य में राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया। राष्ट्रपति शासन को संसद की मंजूरी मिलनी थी। 2014 के गणित को देखते हुए कांग्रेस ने झारखंड मुक्ति मोर्चा और राष्ट्रीय जनता दल की सरकार बनवा दी। राजनीति के इस खेल में भाजपा और कांग्रेस पूरे ढंग से शामिल है।

यह सरकार कितने दिन चलेगी?
कितने दिन चलेगी, यह कहना कठिन है। मैं ज्योतिषी नहीं हूं। 2014 के आम चुनाव इस सरकार का भविष्य तय करेंगे। कांग्रेस और झारखंड मुक्ति मोर्चा के बीच इस सरकार के गठन के लिए हुए समझौते ने ही इसकी आयु सीमा तय कर दी है।यह आप कैसे कह सकते हैं?
जब इस सरकार का गठन हुआ तो घोषणा की गई कि लोकसभा चुनाव झारखंड मुक्ति मोर्चा और कांग्रेस मिल कर लडेंग़े। राज्य में लोकसभा की कुल 14 सीटें हैं। उनमें से दस सीटों पर कांग्रेस के उम्मीदवार खड़े होंगे और चार सीटों पर झारखंड मुक्ति मोर्चा अपने प्रत्याशी खड़े करेगा। राज्य की विधानसभा के चुनाव 2014 के दिसम्बर में होने हैं और 2014 के लोकसभा के चुनाव परिणाम यह तय करेंगे कि राज्य विधानसभा के चुनावों में
दोनों दल साथ होंगे या नहीं। इस तरह इस सरकार की आयु सीमा तो कांग्रेस ने पहले ही तय की हुई है। राज्य में लोकसभा चुनावों के परिणाम अनुकूल हुए तो कांग्रेस इस सरकार को आगे चलाएगी। अन्यथा राष्ट्रपति शासन लगाने में उसे देर नहीं लगेगी। आप इस सरकार के गठन के पक्ष में थे, या नहीं?
यह सरकार नहीं बननी चाहिए थी। झारखंड विकास मोर्चा तो शुरू से ही इस सरकार के गठन के विरोध में रहा है। शिबु सोरेन की सरकार गिरी तभी से हमारी पार्टी-झारखंड विकास मोर्चा की मांग थी कि विधानसभा भंग कर राज्य में चुनाव कराए जाएं। इस बारे में हम राज्यपाल से ही नहीं, बल्कि राष्ट्रपति से भी मिले थे। खरीद-फरोख्त वाली सरकार के गठन का विरोध करते हुए हमने चुनाव कराए जाने की मांग की थी। खरीद-फरोख्त या सौदेबाजी वाली सरकार राज्यहित में नहीं होती।

राज्य में आपकी स्थिति कैसी है?
हमारी पार्टी के लोकसभा में दो सांसद हैं और राज्य विधानसभा में 11 विधायक हैं। जब भी चुनाव होंगे, हमारी स्थिति बेहतर ही होगी।

चुनाव के बाद क्या आप सरकार बना सकते हैं?
हम कह रहे हैं कि आने वाले चुनावों में हमारी स्थिति सुधरेगी, तो उसका साफ अर्थ है कि हम सरकार बनाने की स्थिति में होंगे।

किस आधार पर ऐसा दावा कर रहे हैं?
राज्य में कानून एवं व्यवस्था की हालत बद से बदतर होती जा रही है। उग्रवाद पर नकेल कसने में कोई भी सरकार कामयाब नहीं हो पाई। पिछले दस सालों में कांग्रेस, भारतीय जनता पार्टी, सोरेन सहित सभी ने शासन किया है। लेकिन कोई भी व्यवस्था को सुधार नहीं पाया है। भ्रष्टाचार के कैंसर ने राज्य के सभी अंगों को गिरफ्त में लिया हुआ है। सरकारी तंत्र में भ्रष्टाचार लगातार बढ़ता ही जा रहा है। विकास का मुद्दा पूरी तरह से कुंद हो चुका है। राज्य में खनिज की प्रचूरता होने के बाद भी राज्य गरीबी के अंधेरों में कैद है। लोग रोजगार की तलाश में पलायन कर रहे हैं।

2014 के आम चुनावों का क्या आकलन है?
2014 के आम चुनावों के बाद देश की परिस्थितियां अधिक जटिल होने की आशंका है। इस समय भी किसी गठबंधन या पार्टी का लोकसभा में स्पष्ट बहुमत नहीं है, 2014 में भी किसी एक पार्टी या गठबंधन को स्पष्ट बहुमत मिलने की आशा नहीं है। अगली सरकार किस की बनेगी, अनुमान लगाना कठिन है। आपकी पार्टी का रूख क्या होगा?
हमारी पार्टी का समर्थन भारतीय जनता पार्टी या कांग्रेस को छोड़ कर किसी अन्य विकल्प को रहेगा।
मोदी के बारे में आप क्या कहेंगे?
उन्होंने पहले कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के इलाज के खर्च के बारे में कहा। उसके बाद शशि थरूर की पत्नी पर टिप्पणी की। उत्तराखंड की त्रासदी के दौरान केवल गुजरातियों को बचाने के बारे उनका बयान आया। एक बयान में उन्होंने आदमी की मौत की तुलना जानवर की मौत से की। इतनी छोटी सोच से इतने विशाल और इतनी अधिक विविधताओं वाले देश को चलाना आसान नहीं होगा। उन्होंने तो उपवास पर बैठ कर एक मौलाना की टोपी लेने से परहेज दिखा दिया। बहुत छोटी मानसिकता दिखती है। बड़े नेताओं को तो बड़ी सोच और विशाल मानसिकता रखनी चाहिए। क्या मोदी का झारखंड में प्रभाव दिखाई देता है?
झारखंड हो या पूरा देश, जो प्रभाव भारतीय जनता पार्टी का है, वही मोदी का है। मोदी भारतीय जनता पार्टी के नेता हैं और देश या झारखंड में उनका प्रभाव भारतीय जनता पार्टी से अलग कैसे हो सकता है!

मोदी की विजय के बारे में क्या अनुमान है?
देश की राजनीति में जब हिन्दुत्व अपने पूरे उफान पर था और राममंदिर मुख्य मुद्दा उभर कर आया था, उस वक्त भाजपा की तीन राज्यों-मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश तथा हिमाचल प्रदेश में सरकारें थीं। उत्तर प्रदेश में कल्याण सिंह की सरकार थी। कल्याण सिंह कुशल वक्ता और अच्छे प्रशासक थे। उन्हें अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी के बाद तीसरे नम्बर पर माना जाता था। भारतीय जनता पार्टी भी उनको इसी प्रकार पेश करती थी। लेकिन हिन्दुत्व के उफान में गिरीं भाजपा की तीनों सरकारों में से कोई सरकार वापस नहीं आ पाई। जो लोग यह सोचते हैं कि मोदी हिन्दुत्व की नैया पर सवार हो कर प्रधानमंत्री की कुर्सी पर जा बैठेंगे, तो वे मूर्खों की दुनिया में रहते हैं।

लेकिन गुजरात में विकास का उदाहरण भी तो दिया जाता है?
विकास केवल गुजरात में ही क्यों देखते हैं, महाराष्ट्र और तमिलनाडु के उदाहरणों को भी तो देखें। ऐसे राज्यों को नजरअंदाज कैसे किया जा सकता है। और भी राज्य हैं। एनडीए में वाजपेयी सरकार का उदाहरण लें। पं. नेहरू को व्यक्तिगत या अन्य कारणों से पसन्द करें या न करें, वह दीगर बात है। लेकिन उनके कार्यकाल में देश के विकास की गति के तथ्य को तो नकारा नहीं जा सकता। नेहरू के बाद यदि देश में विकास की किसी सरकार ने गति दी है तो वह वाजपेयी सरकार ने दी। इसे तो देश की पूरी जनता मानती है। कोई नहीं कह सकता कि वाजपेयीजी की सरकार में विकास नहीं हुआ। लेकिन फिर 2004 में भारतीय जनता पार्टी की सरकार वापस क्यों नहीं आई।

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