ब्रेकिंग न्यूज़ 

यह कैसा मृत्यु-पूर्व भोज!

बिहार के सारन जिले के एक ग्रामीण प्राइमरी स्कूल के तेइस बच्चों की मध्याह्न भोजन खाने से त्रासद मृत्यु हो गयी। इस घटना नें देश को दहला दिया है परन्तु जिस ढंग से राज्य सरकार ने अपना कर्तव्य निभाने में कोताही की उससे आगे के लिए कोई नई आशा का संचार नहीं होता। वे लोग जो बिहार की शिक्षा व्यवस्था से परिचित रहे हैं, इस दुर्घटना से दुखी हैं परन्तु यह भी कहते हैं कि ऐसा बिहार के सरकारी स्कूलों में कहीं भी और कभी भी हो सकता था। बिहार के मुख्यमंत्री ने उस गॉंव के लोगों के पास जाकर सांत्वना जताने की कोई आवश्यकता नहीं समझी। राज्य के शिक्षा मंत्री जिनसे अपेक्षा थी कि वे नैतिकता का कुछ खयाल करेंगें और इस्तीफा देंगें, उन्होंने इस घटना को राजनैतिक साजिश बताकर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर ली।

राज्य के मुख्यमंत्री जिन्हें ‘सुशासन’ शब्द अत्यन्त प्रिय है और जिसे वे अपने आस-पास के लोगों से लगातार सुनना चाहते हैं, नैतिकता का एक भी अंश इस दुर्घटना के समय भी याद नहीं कर पाये। वे कहते हैं कि वे राममनोहर लोहिया की विरासत के उत्तराधिकारी हैं और उन्हीं के अनुसार कार्य कर रहे हैं। राममनोहर लोहिया ने लखनऊ जेल से 12 अगस्त 1954 को केरल के मुख्यमंत्री पट्टम थानू पिल्लई को इस्तीफा देने को कहा था, क्योंकि उस राज्य में पुलिस की गोलियों से सात निहत्थे लोगों की मृत्यु हुई थी और आठ लोग घायल हुए थे। यदि डा0 राममनोहर लोहिया आज जीवित होते और नितीश कुमार उन्हीं की पार्टी के सदस्य होते तो क्या आज वे पद पर बने रह सकते थे?

इस स्कूल के पास ही जीरादेई में जन्मे और सरकारी स्कूल में पढ़े डा. राजेन्द्र प्रसाद अपनी योग्यता के लिए सारे जगत में विख्यात हुए और अपने त्याग तथा देश भक्ति के लिए राष्ट्र द्वारा सराहे गये। वह बिहार ही था जहां मोहनदास करमचंद गांधी ने चंपारण जाकर नील की खेती करने वाले किसानों की दुर्दशा देखी और भारत को वहां उन्होंने पहली बार पूरी तरह समझा। उन विकट परिस्थितियों में भी उन्होंने ग्रामीणों को सलाह दी की वे स्कूल खोलें और अपने बच्चों को शिक्षित करें। वहां तीन स्कूल खोले गये और उनके अध्यापक गांधी जी ने तत्कालीन मुम्बई प्रांत से भेजे। ये अध्यापक स्वयंसेवक थे, परन्तु इन्हें ग्रामीणों के साथ रहना था और भीषण गरीबी में भी इनके खाने-पीने तथा रहने का प्रबन्ध ग्राम समाज की ही जिम्मेदारी रखी गई थी।

गांधी जी जानते थे कि भारत के अधिकांश लोग गरीबी में अज्ञान और अशिक्षा के कारण ही जकड़े हुए हैं इन्हें बाहर लाने का रास्ता अच्छी शिक्षा देकर और कौशल सिखाकर ही निर्धारित किया जा सकता है। आखिर इसी बिहार ने ज्ञान के सृजन और उपयोग के ऐसे मापदण्ड स्थापित किये थे जिनका लोहा इतिहास में प्रत्येक काल में माना गया है। गौतम बुद्ध, तीर्थंकर महावीर, सम्राट अशोक तथा चाणक्य जैसे मनीषीयों का कार्यक्षेत्र बिहार ही था। आज इस बिहार में शिक्षा की जो दुर्दशा है उसे राजनेताओं तथा अधिकारियों की मिलीभगत का प्रपंच ही माना जा सकता है। यदि ऐसा ना होता तो केन्द्र सरकार द्वारा आवंटित 500 करोड़ रूपये की धनराशि का उपयोग राज्य सरकार करती और इस स्कूल में भी भोजन बनाने की एक स्वच्छ रसोई स्थापित हो जाती। केन्द्र द्वारा प्रद्त्त यह धनराशि राज्य सरकार ने अपनी अक्षमता का एक और उदाहरण प्रस्तुत करते हुए वापस कर दी।

बिहार का शैक्षिक प्रशासन तंत्र अपनी गतिशीलता पूरी तरह खो चुका हैं। यहां सबसे पहले गांव में पढ़ाने वाले नियमित अध्यापकों ने अपनी जगह छोटे से मानदेय पर स्थानीय लोगों को एवजी अध्यापक बनाना प्रारम्भ किया और स्वयं अपने इच्छित स्थानों पर रहे और वेतन प्राप्त करते रहे। ऐसा अधिकारियों की मिलीभगत के बिना संभव नहीं था। गांव के लोग स्कूलों से लगातार कटते गये, क्योंकि सरकारी अधिकारी जो कुछ कर रहे थे वह राजनेताओं के संरक्षण में होता रहा और इस स्थिति का लाभ उठाने में किसी ने कोई कोर कसर बाकी नहीं रखी। जब बच्चों को विषाक्त भोजन खिलाया गया और वे बीमार पडऩे लगे तब यदि ग्राम समाज तुरन्त सक्रिय होता और स्थानीय स्वास्थ्य केन्द्र भी उचित स्तर पर कार्य कर रहा होता तो निश्चित ही मरने वाले बच्चों की संख्या बहुत कम होती।

यदि उस गांव के विधायक या सांसद से गांव के लोगों का सीधा सम्पर्क होता और वे बिना विलम्ब सारी स्थिति उन्हें बता सकते तो वे अपने प्रभाव का उपयोग कर पटना से चिकित्सक और आवश्यक दवाइयां समय पर भिजवा सकते थे। बच्चों को शीघ्रता से पटना मेडिकल में भी ले जाया जा सकता था। शासन तन्त्र की अकर्मण्यता तथा उससे हुई देरी का जिम्मा कौन लेगा?

यह संपर्क तथा आवश्यक व्यवस्थाएं समय से क्यों नहीं हो सकी- इसका विवेचन आवश्यक है। जनतंत्र का अर्थ सामान्य व्यक्ति के लिए यह है कि जनता से ही एक व्यक्ति उनका प्रतिनिधि बनता है, लगातार उनके सम्पर्क में रहता है, उनके साथ मिलजुल कर समस्याओं का समाधान ढूढंता है और जहां आवश्यकता होती है वहां राज्य तथा केन्द्र की सरकारों से सहयोग तथा सहायता लाने में अग्रसर होता है। हर चयनित प्रतिनिधि लगातार आकलन करता रहता है कि उसके मतदाताओं का विश्वास उस पर बना हुआ है और कम तो नहीं हो रहा है।

दुर्भाग्य से भारत में ऐसी स्थिति नहीं है। हर स्तर का चयनित प्रतिनिधि अपने को जनता से अलग दिखाना चाहता है, विशिष्ट दिखना चाहता है और विशेषाधिकारों को प्राप्त करने के लिए हर प्रकार का प्रयत्न करता रहता है। मतदाता और उसके चयनित प्रतिनिधियों के बीच दूरियां लगातार बढ़ रही हैं। यह प्रश्न उठाया जा सकता है कि यदि प्राइमरी स्कूल ठीक से नहीं चल रहा है या वहां पर मध्याह्न भोजन की अव्यवस्था है तो चयनित प्रतिनिधि अपने प्रभाव का उपयोग कर उसे ठीक करने का प्रयास क्यों नहीं करत।

बिहार के सरकारी स्कूलों की दशा जिस स्थिति में पहुॅची है वह केवल दयनीय ही कहीं जा सकती है। नितीश कुमार के मुख्यमंत्री बनने के बाद लोगों को बड़ी आशायें थी कि उनके बहुप्रचारित ‘सुशासन’ में शिक्षा भी एक महत्वपूर्ण स्थान पायेगी। ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। पहले एवजी अध्यापक नियमित अध्यापक के द्वारा छिपकर नियुक्त होता था। आज बिहार में लाखों ऐसे अध्यापक हैं जिनके पास न तो आवश्यक अर्हताएं हैं, और न ही उन्हें कोई प्रशिक्षण मिला है। सरकार ने उनकी नियुक्ति पंचायतों तथा गांव के मुखिया द्वारा कराई है, उनसे अपेक्षा की जाती है कि वे नाममात्र के मानदेय पर वे सारे कार्य करेंगे जिनकी अपेक्षा नियमित अध्यापक से की जाती है।

बेरोजगारी के समय में युवा सरकार के इन नियमों को मानने को बाध्य हैं परन्तु जब वे देखते हैं कि उनसे पांच-छ: गुना अधिक वेतन प्राप्त करने वाले उनके वरिष्ठ अध्यापकगण किस प्रकार और कितना कार्य करते हैं तब उनके अन्दर आक्रोश तथा निराशा पनपती है। वे पटना की सड़कों पर कुछ महीनों के अन्तराल से प्रदर्शन करते हैं और नितीश सरकार की पुलिस बिना महिलाओं और पुरूषों में कोई भेद-भाव किये बेरहमी से लाठियां बरसाती हैं। बिहार में अधिसंख्य वे लोग जो अपने बच्चों को राज्य से बाहर शिक्षा दे सकते हैं ऐसा ही करते हैं। जो साधन सम्पन्न नहीं हैं वे मजबूरी में केवल सरकारी स्कूलों पर निर्भर हैं। उच्च शिक्षा में स्थिति इससे भी बदतर है। पिछले दो वर्षों से सरकार और
राज्यपाल महोदय (जो अब स्थानांतरित हो गये हैं) के बीच कुलपतियों और प्रति-कुलपतियों की नियुक्तियों को लेकर रस्साकसी चलती रही है। राज्य के अनेक विश्वविद्यालयों में नियुक्तियों पर प्रतिबन्ध है और अध्यापकों के 60 से 70 प्रतिशत पद रिक्त हैं। यहीं से स्कूलों के अध्यापक तैयार होते हैं।

नितीश कुमार के सत्ता में आने के पहले बिहार की राजनेताओं ने जो दुर्गति की थी उसमें बिहार कई दशक पिछड़ गया था। नितीश से बहुत आशाएं थीं। उन्हें जो प्रशंसा और प्रोत्साहन प्रारम्भ में मिला उससे उन्होंने बिहार के बाहर अपने लिये कार्य क्षेत्र देखना प्रारम्भ कर दिया। गुजरात सरकार ने जब बिहार के बाढ़ पीडि़तों के लिए 5 करोड़ रूपये की धनराशि भेजने की पेशकश की तो उसे मोदी के नाम पर उन्होंने अस्वीकार कर दिया। देश भर में लोग सकते में आ गये- यह सेक्यूलर बनने का नया तरीका था जहां एक मुख्यमंत्री एक पूरे राज्य की जनता का अपमान कर बता रहा था कि उन्होंने नरेन्द्र मोदी को चुनकर गलती की थी। यह अत्यन्त अप्रत्याशित कदम था क्योंकि गुजरात के लोग यदि बिहार के लोगों के साथ उनके संकट में खड़े होने को उत्सुक थे तो उसका रास्ता तो जनतांत्रिक ढंग से चुनी गई सरकार के द्वारा ही हो सकता था।

यह 5 करोड़ रूपये गुजरात के लोगों के थे, नरेन्द्र मोदी के नहीं थे। इसके बाद अनेक ऐसी घटनाएं हुई है जो सिद्ध करती हैं कि नितीश कुमार का ध्यान अब बिहार का स्थितियों का सुधार करने से हट गया है। जिस सुशासन की प्रारम्भ में अपेक्षा की थी उसका अब नाम निशान भी दिखाई नहीं देता है। नितीश कुमार की संवेदनहीनता का बचाव संभवत: उनके निकट सहयोगी भी नहीं कर पायेंगे। जब बच्चे एक के बाद एक मर रहे थे, मुख्यमंत्री दो लाख रूपये की अनुग्रह राशि की घोषणा कर रहे थे। जनतंत्र का अर्थ तो यह था कि वह तुरंत उस गांव पहुंचते, वहीं रहते और बचाव कार्य का निर्देशन करते। उनकी इस बार की असफलता बिहार के अधिसंख्य लोगों को उनसे विमुख करने लगी है। वे संभवत: इसे न सुनना चाहेंगे और न मानना चाहेंगे।

कोई भी समाज अपने को सभ्य तभी कह सकता है जब उसकी सबसे बड़ी प्राथमिकता नई पीढ़ी को अपने से अच्छा जीवन प्रदान करने के लिए प्रयत्नों के रूप में दिखाई देती हो। बिहार सरकार और वहां के मुख्यमंत्री इस कसौटी पर पूरी तरह असफल रहे हैं। वे तो अपने मतदाताओं के इस भीषण दुख में साथ बैठकर संवेदना के शब्द बोलने तक के लिए अपने को प्रस्तुत नहीं कर पाये।

 

जगमोहन सिंह राजपूत

вирус сайтростов никас харьков

Leave a Reply

Your email address will not be published.