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नाराज हैं सोनिया गांधी आपदा नियंत्रण प्राधिकरण से?

प्राकृतिक आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (एन.डी.एम.ए.) की उपयोगिता को लेकर कहा तो बहुत कुछ गया था, लेकिन उत्तराखंड में जिस तरह के विनाशकारी हालात बने और वहां जान और माल की भारी क्षति हुई, बदरी नाथ और केदारनाथ गए तीर्थ यात्रियों को सुरक्षित जगहों पर पहुंचाने के काम में जो चूक हुई उसे लेकर इस प्राधिकरण की छवि बहुत खराब हुई है। लगता है कि जैसे एन.डी.एम.ए. के अधिकारियों को पता ही नहीं था कि बचाव कार्य कैसे किए जाने हैं और भूस्खलन से संपत्ति का और अधिक नुकसान होने से कैसे बचाया जा सकता है।
उपाध्यक्ष एम. शशिधर रेड्डी को इस बात का अफसोस है कि वह हैदराबाद चले गए थे जहां कुछ मकान गिरे थे। वह वहां तीन दिन रहे। और आपातग्रस्त क्षेत्रों का दौरा किए बिना ही उन्होंने बयान जारी कर दिया कि 11,000 लोग गायब हैं। चूंकि यह आंकड़ा उपाध्यक्ष रेड्डी के संदर्भ से आया था, इसलिए इसे सही मान लिया गया, लेकिन राज्य सरकार द्वारा दिए गए आंकड़े इससे अलग थे।
कहा जाता है कि सोनियां गांधी बहुत नाराज थीं और उन्होंने गृहमंत्री शिंदे से अपनी नारजगी रेड्डी तक पहुंचाने के लिए कहा। जानकार सूत्रों का कहना है कि इसका मतलब यह नहीं है कि रेड्डी को जाना पड़ेगा। ”सरकार खुद ही कमजोर और डांवाडोल है और किसी को निकालने की स्थिति में नहीं है। और दूसरी बात यह है कि वह हैदराबाद का रेड्डी है। सरकार कांग्रेस की राज्य इकाई को छेडऩा नहीं चाहेगी।”
इसलिए रेड्डी एन.डी.एम.ए. के उपाध्यक्ष बने रहेंगे और वह आपदा की स्थितियों को किसी नौसिखिए की तरह निपटाते रहेंगे।
क्या आडवाणी रास्वसं द्वारा तय भूमिका निभाएंगे या…
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (रास्वसं) के प्रमुख मोहन भागवत की कोशिश है कि भाजपा संगठित दिखाई दे। लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, राजनाथ सिंह और नरेंद्र मोदी के साथ सलाह मशविरा करने के बाद पार्टी के शीर्षस्थ सभी नेताओं को आने वाले चुनावों से संबंधित विभिन्न समितियों में शामिल कर लिया गया है। किसी को भी बाहर नहीं छोड़ा गया। ताकि रास्वसं प्रमुख को विश्वास रहे कि पार्टी में समरसता है। वह किसी तरह नाराजगी नहीं देखना चाहते।
आडवाणी को मार्गदर्शक और सलाहकार बनाया गया है और मोदी के नेतृत्व में बनी चुनाव अभियान समिति के सभी फैसलों को उन्हें दिखाया जाएगा। लेकिन सभी कमेटियां मोदी के अधीन होंगी।
एक भीतरी सूत्र का कहना है, ”आडवाणीजी की उम्र को देखते हुए उन्हें पितामह की भूमिका दी गई है। हम खुश है। लेकिन एक बात कहे देता हूं, यह आडवाणीजी की प्रकृति में नहीं है कि वह बिना ताकत के प्रमुख बने रहें।”
ज्यादातर भाजपा सदस्य मानते हैं कि ‘आडवाणीजी’ बाहर से तो भागवत के फार्मूले के हिसाब से चलेंगे, लेकिन वह और उनके वफादार समर्थक मोदी की सफलता में पलीता लगाने की कोशिश करते रहेंगे। दो बिहारी विद्रोही भाजपा सदस्यों का आरोप है कि अनंत कुमार, जिनकी इस पूरे प्रकरण में महत्वपूर्ण भूमिका रही है, पूरी तरह से आडवाणी के आदमी हैं और चाहे हालात कैसे भी हों, वे आडवाणी के प्रति वफादारी नहीं छोड़ेंगे।
मोदी से नफरत करनेवालों की पहली चाल तो यह है कि येदयुरप्पा को भाजपा में शामिल होने या भाजपा के साथ चुनाव समझौता करने से रोकना। दूसरी बात यह है कि आडवाणी के संबंध नीतीश कुमार से बहुत दोस्ताना हैं, अगर इस बात में जरा भी सच्चाई है कि समझौता करना चाहते हैं, और भाजपा के गठबंधन में भी आ सकते हैं तो इस मामले में आडवाणी बड़ी भूमिका निभा सकते हैं।
लेकिन सीधी बात यह है कि मोदी आडवाणी की उपेक्षा कर नहीं सकते और अगर वह आडवाणी को कुछ ज्यादा जगह देते हैं तो वह खुद उनके सहायक बनने की भूमिका में आ सकते हैं।
जब सी.बी.आई.कोशिश करती है आई.बी. को पटकने की
अपने राजनीतिक लक्ष्यों को हासिल करने के लिए सरकार की आदत रही है सीबीआई का उपयोग (दुरुपयोग) करने की। अगर कोई आदमी लाइन से जरा भी बाहर जाने की गुस्ताखी करता है तो सिर पर सीबीआई की तलवार लटकती देखकर लाइन पर आ जाता है। कहा जाता है कि हाल ही में मुलायम सिंह यादव को अपनी नीति बदलने और खाद्य आपूर्ति विधेयक का समर्थन करने के लिए सहमत होना पड़ा। और इस सौदे के बदले सीबीआई ने उन्हें और उनके बेटों को सभी मामलों में दोषमुक्त करार कर दिया।
यह संभव है कि सरकार को सीबीआई और आईबी के बीच टकराव से होने वाले नुकसान का अनुमान भी न हो। दोनों ही अलग अलग भूमिकाओं वाली खुफिया एजेंसियां हैं, लेकिन दोनों ही महत्वपूर्ण हैं। संभव है कि सरकार से बढ़ावा पाकर सीबीआई आईबी के वरिष्ठ अधिकारी राजेंद्र कुमार को परेशान कर रही हो। राजेंद्र कुमार ने अदालत में शपथपत्र दिया था कि इशरत जहां लश्कर-ए-तैयबा की सदस्य है, जबकि सीबीआई का कहना है कि वह एक छात्रा है।
सरकार इस बात से नाराज है कि उनके दुश्मन नं. एक नरेंद्र मोदी के खिलाफ उनका पूरा केस ही खराब हो जाएगा। इसलिए आईबी से सरकार नाराज है। घटिया किस्म की राजनीति और घटिया किस्म के नेताओं ने देश की हर संस्था को बरबाद कर दिया है। अब गृह मंत्रालय के एक अवकाश प्राप्त वरिष्ठ अधिकारी ने गृह मंत्रालय में वर्तमान वरिष्ठ अधिकारी को लिखा है कि इशरत
जहां को लश्कर-ए-तैयबा का सदस्य बताने वाले पत्र का मसौदा उन्होंने तैयार किया है, आईबी के राजेंद्र कुमार इसमें शामिल नहीं हैं
आईबी के वरिष्ठ अधिकारी फिर भी सावधान है कि कोई नहीं जानता, इशरत जहां के लश्कर-ए-तैयबा की सदस्य होने के आईबी के दावे को झुठलाने के लिए सरकार कितना गिरेगी और इसके लिए सीबीआई का इस्तेमाल करेगी।
इस मामले में सच्चाई का साथ देना देश के हित में है। लेकिन सरकार के लोगों को डर है कि अगले चुनावों में उनका सफाया हो जाएगा और ज्यादा बड़ा डर यह है कि अगर मोदी ने सत्ता संभाल ली तो उनमें से कई तिहाड़ पहुंच सकते हैं।
झूठी प्रसिद्धि
ऐसा लगता है सोशल मीडिया पर राज करने के शशि थरूर और नरेन्द्र मोदी के दिन लद गए। सोशल मीडिया पर छाने की कतार में सबसे आगे, आज राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत चल रहे है। उनके फेसबुक पेज ‘आपका मुख्यमंत्री’ पर झूठी प्रसिद्धि के लिए ‘लाइक’ खरीदने के आरोप लग रहे हैं। गत 1 जून 2013 तक उनके अधिकारिक पेज पर 1,69,077 लाइक थे, जिनमें सबसे ज्यादा मई 5 वाले सप्ताह में आए। गौरतलब है कि 30 जून तक उनकी प्रसिद्धि 2,14,639 ‘लाइक’ के साथ आसमान छूने लगी। राजस्थान भाजपा की प्रवक्ता ज्योतिकिरण के अनुसार, अशोक गहलोत, झूठी प्रसिद्धि के लिए ‘लाइक’ खरीद रहे हैं। कुछ आई.टी. कंपनियां थोक में ‘लाइक’ बेचने का धंधा करती हैं और गहलोत ‘लाइक’ खरीद कर अपनी झूठी प्रसिद्धि दिखाना चाहते हैं।
गौरतलब है कि अशोक गहलोत की प्रसिद्धि का अधिकांश हिस्सा इस्तांबूल (तुर्की) से आया है। मुद्दे के सामने आते ही उनकी प्रसिद्धि गिरने लगी। इससे यह तो दिखता है की कांग्रेस सोशल मीडिया पर अशोक गहलोत
की झूठी लोकप्रियता का नाटक कर रही है। ज्योतिकिरण ने कहा कि सोशल मीडिया पर झूठी प्रसिद्धि का घोटाला राजस्थान में पहली बार हुआ है। फेसबुक पर झूठी प्रसिद्धि की जगह राज्य की जनता का विश्वास पाना ज्यादा जरूरी है। सोशल मीडिया पर जागरूकता फैलाने के राहुल गांधी के फरमान के दवाब में मुख्यमंत्री यह भूल गए कि ऐसी हरकतें करदाताओं के पैसे और पारदर्शिता सूचकांक पर असर डाल सकती हैं।

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