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मोदीत्व का महत्व?

लेकिन मोदी के लिए 2014 का महायुद्ध और वहां तक पहुंचने का रास्ता इतना आसान नहीं होगा। मोदी ने यहां तक पहुंचने में जितनी मेहनत की है और सावधानी बरती हैं, अपनों पर जितनी तलवारें चलाई हैं, अपनों और दुश्मनों के जितने तूफानों को झेला है, वे सब हालात अभी खत्म नहीं हुए हैं।

देश के 2014 के राजनीतिक महायुद्ध के लिए लगभग सभी दलों ने अपनी सेनाएं सजानी शुरू कर दी हैं। कांग्रेस सहित अन्य दलों की तुलना में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) कुछ जल्दी में दिखाई देती है जो पूरी तरह से ‘चुनावी मोड’ में पहुंच गई लगती है। अन्य दलों ने बेशक अपने पत्ते अभी छिपाए हुए हों, लेकिन भाजपा ‘खुला खेल फर्ररूखाबादी’ खेलती दिख रही है। सेनानायक की औपचारिक घोषणा की इंतजार किए बगैर ही पूरा देश भाजपा के हावभाव से जान गया है कि उसका सेना नायक कौन है। अचानक प्रधानमंत्री बनने वाले देवेगौड़ा और गुजराल या फिर राष्ट्रपति के पद पर पहुंचने वालीं प्रतिभा पाटिल आदि जैसे अनेक प्रकरण हैं, जिनके आधार कहा जा सकता है कि राजनीति में घटने से पहले कभी कुछ भी पक्के तौर पर नहीं कहा जा सकता है। इसके बावजूद पिछले सप्ताह नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में 20 टीमों के गठन के बाद अब इसमें कोई शक नहीं रह गया है कि नमो का जाप कर रही भाजपा ने 2014 के लिए अपना सेना नायक चुन लिया है। इतना ही नहीं विदेशी धरती से भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह द्वारा हथियार डाल देने के बाद तो पहले से स्पष्ट तस्वीर और भी साफ हो गई। दूसरी ओर मोदी को लेकर भाजपा के खिलाफ सदा आक्रामक रहने वाली कांग्रेस अब बचाव की मुद्रा में दिखाई दे रही है।

मोदी आज जहां खड़े हैं, उनको उस स्थान पर पहुंचा देख कोई कहे कि उनका ग्राफ हाल के दिनों में वहां तक पहुंचा है, तो शायद गलती होगी। मोदी ने यहां तक पहुंचने के लिए बहुत ही केलकुलेटिड ढंग से कदम बढ़ाए हैं। देश का प्रधानमंत्री बनने का सपना तो हर राजनेता देख सकता है, लेकिन मोदी ने उस सपने को हकीकत में बदलने के लिए अपने हर कदम को माप-तोल कर रखा और आज ऐसी जगह पहुंच गए जहां आप उन्हें पसंद करें या न करें, लेकिन नजरअंदाज नहीं कर सकते। मोदी आज देश में किसी के आंख की किरकिरी हैं, तो किसी के आंख की रोशनी बने हैं। आज राहुल गांधी की बात कोई नहीं कर रहा। कांग्रेस भी 2014 को मोदी बनाम राहुल बनने से बचाने की कोशिश कर रही है। मोदी ने गुजरात में सत्ता की तिकड़ी बना कर पार्टी में अपने नेतृत्व के दावे को मजबूत किया था। उसी का असर था कि उन्हें केन्द्रीय अभियान समिति का अध्यक्ष बनाए जाने से पहले ही देश में इस बात की चर्चा शुरू हो गई थी कि मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाया जाना चाहिए। हालांकि आडवाणी के रहते मोदी की दावेदारी मजबूत होने में जो रूकावटें खड़ी हो रही थीं, उन्हें जिस प्रकार से संघ ने दर-किनार किया, उससे स्पष्ट हो गया कि भाजपा में मोदी संघ के उम्मीदवार हैं, और आडवाणी सहित यदि किसी ने चीं-चपड़ की तो संघ का डंडा धीरे से चल कर जोर से पड़ेगा। वही हुआ भी आडवाणी को फेस सेविंग के लिए यह कह चुप कर दिया गया कि निर्णय उनसे पूछ कर होंगे। गोवा प्रकरण के बाद अभी जब केन्द्रीय अभियान समिति का विस्तार और 20उप-कमेटियों का गठन हुआ तो आडवाणी को वाजपेयी के साथ मार्गनिर्देशन के लिए ठंडे बस्ते में डाल ‘एसी-कक्ष’ में बैठा दिया। हालांकि इसके लिए काफी कशमकश चली, लेकिन उसमें भी मोदी पूरी तरह से विजयी योद्धा कर तरह निकल कर बाहर आए। एक वरिष्ठ नेता ने अनौपचारिक बातचीत में मोदी की इस युक्ति पर चुटकी लेते हुए कहा भी कि ‘बड़े प्यार से निपटा दिया बड़ों को! ‘ इस उम्र में आडवाणी को यह तो नहीं कहा जा सकता था कि वह अन्य सीनियर-जूनियर सभी नेताओं की तरह मोदी को रिपोर्ट करें। राजनीति इतिहास पर नहीं चलती। राजनीति की सीढिय़ां वर्तमान परिस्थितियों में सूर्य की किरणों की प्रचंडता की रोशनी और गर्मी में चढ़ी जाती हैं। इस बात से कोई इंकार नहीं कर सकता कि आडवाणी ने पार्टी को दो से सत्ता तक पहुंचाने में पूरा जीवन लगा दिया। यह उनकी तपस्या और सोच थी कि वाजपेयी सरकार ने केन्द्र में शासन किया। लेकिन वह पार्टी का इतिहास था। 2004 में प्रधानमंत्री पद के लिए घोषित उम्मीदवार होने के बाद भी आडवाणी यदि विपक्ष में बैठे तो ‘वर्तमान’ बदलाव मांगेगा ही। कभी आडवाणी की पहली पसन्द रहे मोदी आज यदि उनकी पसन्द नहीं हैं तो उसका कारण खुद आडवाणी की उम्र का वह पड़ाव है, जहां आंखों में सपने होने के बावजूद रास्ता ‘संन्यास आश्रम’ को जाता है। मोदी ने राजनीति के शिखर पर पहुंचने के लिए खुद को किसी के ‘आशीर्वाद’ का मोहताज नहीं बनाया।

चुनाव अभियान समिति के विस्तार के बाद पूरी तरह से स्पष्ट कर दिया गया है कि एक नेतृत्व रहेगा और वह नेतृत्व मोदी, और केवल मोदी का होगा। वाजपेयी और आडवाणी को छोड़ कर सभी बड़े-छोटे नेता मोदी को रिपोर्ट करेंगे। संघ के समक्ष पिछले दो आम चुनावों के परिणाम थे और उन परिणामों के मद्देनजर संघ ने साफ कर दिया है कि जिसका सूर्य चढ़ रहा हो, उसी को नमस्कार किए जाने में ही सबकी भलाई है।

संघ में आगामी आम चुनावों को लेकर लंबे समय से विचार विमर्श चल रहा था। उसके सामने जो चेहरे थे, उनमें आडवाणी को छोड़ दें तो लोकसभा में प्रतिपक्ष की नेता सुषमा स्वराज, राज्यसभा में प्रतिपक्ष के नेता अरूण जेटली, पार्टी के पूर्व अध्यक्ष नीतिन गडकरी, पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह और गुजरात में भाजपा की तिकड़ी जमाने वाले कट्टर हिन्दुवादी मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी थे। सुषमा स्वराज संघ की पसन्द कभी नहीं रहीं और अरूण जेटली और राजनाथ सिंह पहले से ही मोदी के समर्थन में खड़े दिखाई देते रहे हैं। संघ के समक्ष मोदी ही रह गए थे जिनके भाग्य और राजनीतिक पराक्रम का सूर्य राजनीतिक अंधड़ और तूफान में भी राजनीतिक आकाश में लगातार चढ़ता दिखाई दे रहा था। तमाम बाहरी और अंदरूनी अड़चनों के बाद भी मोदी का राजनीतिक ग्राफ उत्तरोत्तर आगे ही बढ़ रहा था।

मोदी यहां तक तो पहुंच गए कि उन्हें देश के राजनीतिक परिदृष्य में कोई नजरअंदाज नहीं कर सकता। यहां तक कि गुजरात में औद्योगिक प्रगति की चर्चा करते हुए विरोधी दल के नेता भी अनौपचारिक बातचीत में उनकी तारीफ में कसीदे कस ही देते हैं। आम जनों के बीच भी राजनीति के बारे में चर्चा चलते ही पहला सवाल यह उठता कि क्या मोदी प्रधानमंत्री बन जाएंगे। उद्योगपतियों के तो वह ऐसे चहेते बने हैं कि दिल्ली के एक युवा उद्योगपति का कहना है कि मोदी को एक बार प्रधानमंत्री बन जाने दो, फिर देश की आर्थिक प्रगति देखो, किस कदर आगे भागती है।

लेकिन मोदी के लिए 2014 का महायुद्ध और वहां तक पहुंचने का रास्ता इतना आसान नहीं होगा। मोदी ने यहां तक पहुंचने में जितनी मेहनत की है और सावधानी बरती हैं, अपनों पर जितनी तलवारें चलाई हैं, अपनों और दुश्मनों के जितने तूफानों को झेला है, वे सब हालात अभी खत्म नहीं हुए हैं। साउथ ब्लॉक में पहुंचने का वास्तविक संघर्ष शुरू होने तक उनके सामने कम कठिनाइयां नहीं आएंगी। इसकी बानगी उन्हें वीजा न दिए जाने के लिए भारतीय सांसदों द्वारा वाशिंग्टन से की गई लिखित गुहार में देखने को मिल सकती है। मोदी की छवि एक कट्टरवादी हिन्दू तानाशाह नेता की रही है। इसी छवि ने उन्हें देशव्यापी पहचान दी है। हैदराबाद में अगस्त में मोदी दर्शन के लिए लगाई पांच रूपए की टिकट किसी अन्य नेता के लिए संभव नहीं थी।

राजग में भाजपा के मित्रों को मोदी से एलर्जी होती दिखाई देती है। मुस्लिम वोट बैंक की खातिर मोदी से शुरू से ही 36का आंकड़ा रखने वाले नीतिश कुमार ने गोवा में मोदी की ताजपोशी होते ही राजग से किनारा कर लिया। 23 पार्टियों के गठजोड़ वाली राजग में अभी गिनचुन कर तीन दल बचे हैं। वोट बैंक की राजनीति में मुस्लिम वोटों की खातिर मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा के साथ कौन-सी पार्टी रहना चाहेगी, इस पर अभी संदेह व्यक्त किया जा रहा है। इस संबंध में भाजपा में मोदी समर्थकों का दावा है कि मोदी के नेतृत्व में पार्टी अपने बूते पर 200 से अधिक सीटें लाने का दम रखती है। ऐसा होने पर सत्ता के लिए अन्य दल तो चुम्बक से लोहे के मिलन की तरह खुद ही खिंचे चले आ सकते हैं।

वैसे यह दूर की कौड़ी है। कर्नाटक और हिमाचल प्रदेश के चुनावों ने भाजपा को आइना दिखाया हुआ है। भाजपा का दक्षिण भारत में कितना असर है, यह पूरी तरह साफ है। सेमीफाइनल अभी होना है। हालात स्पष्ट होने में अधिक समय नहीं लगना है। उत्तर प्रदेश से उम्मीद बांध कर मोदी ने अपने हनुमान अमित शाह को वहां लगाया है। सपा और बसपा के गढ़ में अमित कितना कर पाएंगे, यह भी समय बताएगा। कुल मिला कर मोदी को अभी अंदर और बाहर-दोनों प्रतिद्वन्द्वियों से लडऩा है। केवल कमेटियां बना कर यह तय कर देना काफी नहीं होता कि सभी उन्हें सीधे रिपोर्ट करेंगे। संघ का कैसा भी डंडा चले, आडवाणी से उनके समर्थकों को सहानुभूति तो है ही। अन्दरखाने उनका रूख कैसा रहेगा, उस पर भी कम निर्भर नहीं करेगा। अभिमन्यु को चक्रव्यूह में घुसना तो आता था, लेकिन विजय के लिए चक्रव्यूह से निकलना भी आना चाहिए। मोदी चक्रव्यूह को तोड़ कर कैसे अन्दर घुसेंगे और बाहर कैसे निकलेंगे, यह देखना भी कम महत्वपूर्ण और दिलचस्प नहीं होगा।

 

श्रीकान्त शर्मा

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