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क्या आडवाणी के मॉडल को उलट सकते हैं मोदी?

क्या भाजपा अगले आम चुनावों में जीत हासिल करेगी? यह एक सवाल है जो शैक्षिक और राजनयिक क्षेत्रों में सामने आ रहा है। और वहां मुझे कई संशयी भी मिल जाते हैं लेकिन उनके पास भी अपना तर्क है। आखिरकार आज के हालात 2009 से बहुत ज्यादा अलग तो नहीं हैं जब भाजपा ने अपने सबसे कद्दावर नेता (जिन्हे कुछ लोग सबसे योग्य भी मानते हैं) लालकृष्ण आडवाणी के नेतृत्व में चुनाव लड़ा था। उस समय पार्टी या कहें कि नीतीश कुमार और उनके जनता दल यूनाइटेड समेत पूरा एन.डी.ए. काफी खराब प्रदर्शन करते हुए मूल्यवृद्धि, भ्रष्टाचार, आतंकवाद, माओवाद, विदेश नीति के धराशायी होने और क्षेत्रीय माहौल के बिगडऩे जैसे मुद्दों पर असफल हुई, आजादी के बाद के इतिहास में देश की सबसे कमजोर मानी जाने वाले सरकार के प्रति लोगों के गुस्से का लाभ नहीं उठा पाई थी। और यह इस कारण था कि भाजपा अपनी अंदरूनी लड़ाइयों में उलझी हुई थी और लोगों का विश्वास नहीं जीत पाई थी। आज भी भाजपा इसी तरह की दुरभिसंधियों और अंदरूनी लड़ाइयों में उलझी हुई है, तो फिर लोग इसे क्यों वोट दें?

दरअसल इस समय भाजपा में एक और विसंगति नजर आ रही है। और वह यह है कि पार्टी अपनी चुनावी रणनीति को लेकर बुरी तरह से भ्रमित है भले ही नरेंद्र मोदी को पार्टी की चुनाव अभियान समिति का प्रमुख क्यों न नियुक्त कर दिया गया हो। और यह इसलिए कि पार्टी के भीतर बहुत से मुद्दे अभी ऐसे हैं जिनका हल नहीं निकला है। एक मुद्दा तो यही है कि क्या ‘आडवाणी मॉडल’ को पूरी तरह छोड़ दिया जाए? 1990 के दशक में आडवाणी मॉडल (वाजपेयी भले ही उस समय भाजपा के सबसे कद्दावर नेता रहे हों और उन्हीं को प्रधानमंत्री भी बनाया गया था लेकिन पार्टी की अभूतपूर्व सफलता के पीछे आडवाणी का ही दिमाग काम कर रहा था) ने कमाल कर दिया था। यह दो प्रमुख बातों पर आधारित था। पहली तो यह कि भाजपा अपने दम पर लोकसभा में बहुमत नहीं ला सकती, इसे दूसरी पार्टियों के साथ गठबंधन करना ही होगा, खासकर कांग्रेस विरोधी क्षेत्रीय पार्टियों से। और एक बार जब आप गठबंधन बना लेते हैं तो पार्टी राज्य स्तर पर उन्हें वरिष्ठ सहयोगी बनाएंगी भले ही इन राज्यों में भाजपा को अपने दीर्घकालीन हितों की बलि ही क्यों न देनी पड़े।

आडवाणी मॉडल का सबसे ज्यादा फायदा बिहार में जनता दल यूनाइटेड और उसके मुख्य मंत्री नीतीश कुमार हो हुआ। उल्लेखनीय है कि 2000 तक बिहार में भाजपा गठबंधन की वरिष्ठ सहयोगी रही है। स्थिति यह थी कि 2000 में जब पहली बार नीतीश कुमार को मुख्य मंत्री बनाया गया (भले ही उनकी सरकार एक हफ्ते ही क्यों न चली हो) तो बिहार विधान सभा में जनता दल युनाइटेड के मुकाबले भाजपा के ज्यादा सदस्य थे। लेकिन आडवाणी मॉडल की वजह से भाजपा को राज्य में जनता दल युनाइटेड का कनिष्ठ सहयोगी बनना पड़ा। कमोबेश ऐसा ही कुछ ओडिशा में भी हुआ था। दरअसल 1998 में नवीन पटनायक ने जनता दल से अलग होकर बीजू जनता दल (बीजेडी) बनाया। इसका फायदा भाजपा को भी मिला खासकर ओडिशा के शहरी और पश्चिमी आदिवासी पट्टी में। नवीन राजनीति में नए थे। लेकिन आडवाणी मॉडल के कारण गठबंधन के राष्ट्रीय हितों को देखते हुए ओडिशा में भाजपा ने अपनी क्षमता की सीटें हासिल नहीं की और बीजेडी के कनिष्ठ सहयोगी की भूमिका में ही रही। आज स्थिति यह है कि इस पश्चिमी तटीय राज्य में भाजपा की ताकत नगण्य रह गई है जबकि कभी इसमें काफी संभावना नजर आ रही थी।
आप यह बात भी मानेंगे कि एनडीए के शासन के दौरान भाजपा ने केंद्रीय सरकार के स्तर पर भी अपनी पार्टी के लोगों और शुभचिंतकों के बजाय सहयोगी पार्टियों के लोगों के प्रति ज्यादा सहानुभूति पूर्ण व्यवहार बनाए रखा। यह किसी से छिपा नहीं है कि वाजपेयी सरकार के दौरान तेलुगू देशम पार्टी और आंध्र प्रदेश में इसके मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू ने खूब लाभ उठाया। और आडवाणी मॉडल की वजह से ही वाजपेयी ने चंद्रबाबू नायडू की मांग को मानते हुए आम चुनाव छह महीने पहले करवा दिए क्योंकि उस समय आंध्र प्रदेश में विधान सभा के चुनाव होने थे। अन्यथा क्यों एक सत्ताधारी दल अपने एक सहयोगी को खुश करने के लिए अपना कार्यकाल छह महीने कम करवाता। कौन जानता है कि अगर वाजपेयी सरकार अपने पूरे कार्यकाल तक बनी रहती, तो आखिरी छह महीनों में अच्छे मानसून और कुछ महत्वपूर्ण निर्णयों (यूपीए सरकार के खाद्य सुरक्षा अधिनियम की तरह) के कारण आगे भी बनी रहती। लेकिन ऐसा ही तो था आडवाणी मॉडल।

इस तरह यह तो साफ ही है कि आडवाणी मॉडल की दूसरी बात यह है कि पार्टी के भीतर और बाहर भी इस हद तक समझौते किए जाएं कि पार्टी के महत्वपूर्ण हितों को ही क्षति हो। इस बात ने पार्टी के कई उदीयमान और वरिष्ठ नेताओं को निरुत्साहित किया। उन्हें लगा कि पार्टी इतने सारे समझौते करके उनके भविष्य को ही खतरे में डाल रही है। इससे पार्टी में विभिन्न स्तरों पर असुरक्षा पैदा हो गई और भीतर लड़ाइयां व दुरभिसंधियां होने लगीं। इस तरह आडवाणी मॉडल की वजह से कई नेताओं ने या तो पार्टी छोड़ दी या उन्हें पार्टी से निकाल दिया गया। बाबूलाल मरांडी, शंकर सिंह वाघेला, उमा भारती, कल्याण सिंह आदि के साथ ऐसा ही हुआ है। इस प्रक्रिया की आखिरी बलि कर्नाटक में येदयुरप्पा की चढ़ी।

इस पृष्ठभूमि में भाजपा में नरेंद्र मोदी के उभार को देखा जाना चाहिए। साफ है कि जिन लोगों को आडवाणी मॉडल का सबसे ज्यादा फायदा मिला, वे ही भाजपा में मोदी की बढ़ती प्रतिष्ठा से परेशान है कि भाजपा अब नए तौर तरीके अपना सकती है। मोदी की कार्यशैली और भारत को लेकर उनके नजरिए को यह तो नहीं कहा जा सकता कि वह आडवाणी मॉडल जैसा ही होगा जो इतने सालों से पार्टी को चलाते रहे हैं। अगर गुजरात के उदाहरण से संकेत लें तो लोगों ने मोदी को वोट इसलिए दिए क्योंकि मोदी ने पारदर्शी सुशासन दिया और वह लोक लुभावन राजनीति से दूर रहे। मोदी ने साबित किया है कि भारतीय राजनीति को लेकर जो सोच है कि जातिवाद और संप्रदायवाद के आधार पर राजनीति तय होती है, ऐसा हमेशा होता नहीं है। उन्होंने अप्रतिम लोकप्रियता हासिल की। मोदी ने मुफ्त बिजली देने का वादा नहीं किया। उन्होंने उन सभी घरों और प्रतिष्ठानों की बिजली काट दी जिन्होंने बिल नहीं भरे। लोगों ने फिर भी उन्हें वोट दिए क्योंकि उन्होंने निर्बाध बिजली आपूर्ति का भरोसा दिलाया।

क्या मोदी गुजरात की इस सफलता को राष्ट्रीय स्तर पर दोहरा सकेंगे? भारत को केंद्र में कांग्रेस से अलग एक वैकल्पिक राष्ट्रीय पार्टी की जरूरत है जिसके पास देश को आगे ले जाने का एक नया नजरिया हो। जरूरी है कि ऐसी पार्टी देश के युवा के सामने एक स्पष्ट विकल्प लेकर आए जो पूरे देश के आधार पर संख्यात्मक बहुमत भी ला सके। हमें एक ऐसी पार्टी की जरूरत है जो बढ़ते हुए मध्यवर्ग की अपेक्षाओं पर खरी उतरे जो किसी भी देश की रीढ़ होता है और अमीर होना चाहता है। हमें ऐसी पार्टी की जरूरत है तो वैश्विक भूमिका निभा सके और पाकिस्तान या चीन या अमेरिका को लेकर जिसके मन में कोई खौफ न हो। हमें एक ऐसी पार्टी की जरूरत है जो पूंजीवाद और योग्यता का स्वागत करे, जिसके अपने निहित स्वार्थ न हों जिनकी वजह से हम प्रतियोगिता से दूर भागते हैं और मामूली बने रहने पर बाध्य हों। हमें एक ऐसी पार्टी की जरूरत है जो देश को एक सैन्य शक्ति बनाने के लिए प्रतिबद्ध होकर काम करे। हमें एक ऐसी पार्टी की जरूरत है जो देश के गरीब का सशक्तीकरण करे ताकि उन्हें काम मिले (या वे अपना काम शुरू कर सकें) और सरकारी अनुदानों को नहीं लेने पर गर्व महसूस कर सकें। क्योंकि अनुदान तो उन्हें गुलाम ही बनाते हैं। हमें एक ऐसी पार्टी की जरूरत है जो स्कूल स्तर पर सभी के लिए स्तरीय शिक्षा को लेकर काम करे ताकि हर भारतीय बच्वा उच्चा शिक्षा के लिए विभिन्न संस्थानों में प्रवेश के लिए योग्य हो और बाद में बिना आरक्षण की बैसाखी के नौकरी के अवसर पा सके। आरक्षण देश और समाज को बांटता ही तो है।

मेरा अपना विचार है कि ये सारी चुनौतियां मोदी के दिल के करीब हैं। दूसरे, जैसे कि मैं पहले भी कह चुका हूं, अगले आम चुनाव ‘राष्ट्रपतिय पद्धति’ की तरह के होंगे यानी भारतीय मतदाता पार्टी के नेता को वोट देंगे, जरूरी नहीं है कि यह वोट सिर्फ पार्टी के लिए ही हो, जैसे कि हम अमेरिका और फ्रांस में देखते हैं। ऐसा नहीं है कि भारत में हमने पहले कभी ऐसा नहीं देखा। 1971 में भारत के लोगों ने इंदिरा गांधी को नेत्री के रूप में वोट दिया था, उस अलग हुए कांग्रेसी धड़े को नहीं जिसमें वह थीं। और याद रहे, उस साल कांग्रेस के सभी वरिष्ठ नेताओं ने उन्हें छोड़ दिया था। 2014 का चुनाव भी 1971 की ही तरह होगा। यहां ‘प्रतिष्ठित नामों’ और पार्टियों से कोई फर्क नहीं पड़ेगा। फर्क इस बात से पड़ेगा कि ऐसा कौन सा नेता है जो उनकी उम्मीदों पर खरा उतरने का भरोसा दिलवा सकता है। और यहां मोदी के नेतृत्व में भाजपा की संभावनाएं ज्यादा नजर आती हैं।

अब भाजपा को यह देखना है कि वह आडवाणी मॉडल को चुनती है या पूरी तरह से मोदी के पीछे चलती है। बेशक इस समय गुजरात के मुख्यमंत्री के सामने कई कठिनाइयां हैं। सबसे कठिन विरोध तो केंद्र सरकार और इसके अधीन सीबीआई और आईबी जैसी संस्थाओं (उनके द्वारा फैलाए जाने वाले झूठे आरोपों) से झेलना पड़ रहा है। इनके अलावा वामपंथियों, उदारतावादी एनजीओ के सक्रिय लोगों, और राष्ट्रीय मीडिया का भी विरोध है। कई भाजपा नेता भी हैं जिन्हें आडवाणी मॉडल से फायदा पहुंचा है, वे भी मोदी के अभियान को पलीता लगाने की कोशिश कर रहे हैं। कुछ लोग तो उनके खिलाफ आपराधिक मामले बनाने के लिए रात-दिन एक किए हुए हैं।

देखें क्या होता है?

 

प्रकाश नंद

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