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खड़ी बोली के पहले कवि भारतेन्दु नहीं, संत गंगादास थे

खड़ी बोली के प्रथम कवि भारतेन्दु नहीं संत गंगादास थे। उनका जन्म 1827 में गाजियाबाद के रसूलपुर गांव मं हुआ था। वह 1913 तक जीवित रहे। उनकी 37 रचनाएं प्रकाशित हो चुकी हैं। अभी 18 रचनाएं अप्रकाशित हैं। पांच विद्वानों ने उन पर शोध किया है। अंग्रेजों के बारे में उन्होंने लिखा है – ‘जो ये व्यापारी आये हैं, टोटा देकर जाए हैं। पूंजी पाकर भरमाएं हैं।’ और ‘अब तुम अपने देस कूं जाओ। छोड़ के अब इस देस कूं जाओ।’ यह सब जानकारी अवधेश श्रीवास्तव की पुस्तक ‘शब्द, विचार और समाज’ में है। समुद्र में डूबे पत्रकार जसविंदर उर्फ जस्सी के बारे में भी उन्होंने लिखा है। उपन्यासकार प्रताप नारायण श्रीवास्तव को आज कोई याद नहीं करता। लेखक ने उन्हें प्रेमचंद युग का आखिरी स्तंभ कहा है। इसी तरह नागार्जुन को भी याद किया है।

पुस्तक के पहले खंड में राजेन्द्र यादव, मैत्रेयी पुष्पा, विष्णु प्रभाकर, प्रयाग शुक्ल, इब्बार रब्बी, मंगलेश डबराल, विष्णु नागर और असद जैदी जैसे लेखकों कवियों से लिये गये साक्षात्कार संग्रहित हैं। इनमें सबसे उल्लेखनीय राजेन्द्र यादव और मंगलेश डबराल से की गई बातचीत है। पुस्तक का यही खंड कुछ ध्यान बंटाता है। प्रेम के बारे में राजेन्द्र यादव का कहना है कि ‘प्रकृति तो चाहती है कि प्रेम किया जाय पर समाज ने जो अपने तौर तरीके बनाए हैं, उसमें सिर्फ विवाह करने की छूट है, प्रेम करने की नहीं।’ राजेन्द्र जी को गुलेरी की अमर कहानी ‘उसने कहा था’ सिर्फ एक भावनात्मक प्रेम कहानी लगती है। इस बातचीत में राजेन्द्र जी ने अपनी पहली प्रेमिका के बारे में भी बताया है। मैत्रेयी पुष्पा को प्रेम एक खुशबू लगती है ‘जो मनुष्य को तरोताजा रखता है’। वह भी अपने बचपन के प्रेमी की जानकारी देती हैं। विष्णु प्रभाकर से बाचतीच बहुत लंबी है। उन्होंने अपने बारे में अनेक निजी जानकारियों को साझा किया है। मंगलेश डबराल के पिता गढ़वाली के अच्छे कवि थे। उन्हीं से कविता के संस्कार मंगलेश में आए। पिता उन्हें डॉक्टर बनाना चाहते थे, पर वह विद्वान बनना चाहते थे। लीलाधर जगूड़ी से परिचय होने के बाद उनका जीवन बदल गया। परंपरागत जीवन से निकलकर उन्हें आधुनिकता और आधुनिक साहित्य की जानकारी मिली। असद जैदी का बचपन रूढिग़्रस्त परंपरावादी माहौल में बीता। सिनेमा ने उन्हें लेखक बनने की सकारात्मक प्रेरणा दी। यह एक विद्रोह था। उनके अनुसार ‘कविता को किसी हद तक ठंडा सुविचारित और सख्त होना चाहिए। क्षणिक बेकली या भावोच्छवास पैदा करके कुछ नहीं होने जा रहा है। उसमें तर्क और व्याख्या की गुंजाइश भी बनी रहनी चाहिए।’

पुस्तक में बालमुकुन्द गुप्त, भगवती चरण वर्मा, अंचल की पुस्तकों की परिचयात्मक सूचनाएं भी हैं। पुस्तक की भूमिका महेश दर्पण ने लिखी है।

 गोवर्धन दास

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