ब्रेकिंग न्यूज़ 

गंड मूल दोष से घबराने की जरूरत नहीं: आचार्य आर.एस. पंवार

आचार्य आर.एस. पंवार ने भारतीय विद्या भवन से ज्योतिष ज्ञान प्राप्त कर समाज को उसके प्रकाश से रोशन करने का संकल्प किया। वह भारतीय विद्या भवन के ज्योतिश संस्थान में ज्योतिष ज्ञान के जिज्ञासुओं को इस प्राचीन विद्या की शिक्षा दे रहे हैं।

अर्थ
हिन्दू समाज में गंड-मूल या कहें ‘गंडांत’ को लेकर काफी भय फैला हुआ है। बच्चा यदि किसी नक्षत्र विशेष में जन्म ले तो जन्म के वक्त पंडित उसके मां-बाप को डरा देते हैं। इस संबंध में सबसे पहले सच्चाई और दन्त कथाओं को जानना आवश्यक है। ‘गंड’ का अर्थ है -‘गांठ’ और ‘अंत’ का अर्थ है-‘समाप्त’। भचक्र या चन्द्रमा का मार्ग 12 राशियों अथवा 27 नक्षत्रों में विभाजित है। इसलिए, यह भचक्र में जंक्शन बिन्दु है जो तीन स्थानों में हो सकता है।

परिकल्पना
दिलचस्प यह है कि प्रत्येक राशि की प्रकृति की पुनरावृत्ति खुद से हर चौथी राशि पर होती है। उदाहरण के तौर मेष प्रथम राशि है। यह अग्नि तत्व है। इसके बाद क्रम इस प्रकार है:

मेष, सिंह, धनु-अग्नि तत्व

वृषभ, कन्या, मकर-पृथ्वी तत्व

मिथुन, तुला, कुम्भ-वायु तत्व

कर्क, वृश्चिक, मीन-जल तत्व

हम जानते हैं कि अग्नि और जल एक दूसरे के शत्रु हैं और मेष-मीन, कर्क-सिंह और वृश्चिक-धनु के बीच खतरे की सीमा होती है। दूसरे शब्दों में यह एक प्रकार से ‘गांठ’ या ‘जंक्शन प्वाइंट’ है। इसीलिए जब चन्द्रमा विभाजित रेखा को क्रास करने वाला होता है या उसने क्रास किया होता है तो उसे चेतावनी संकेत की तरह माना जाता है। ऐसा विश्वास किया जाता है कि एक व्यक्ति जब इस स्थिति में पैदा होता है तो उसके जीवन में काफी कठिनाइयां, परेशानियां और दुख आते हैं। प्रत्येक राशि को नक्षत्रों में उपविभाजित किया जा सकता है। इसलिए जो नक्षत्र मेष, सिंह या धनु के आरम्भ में आते हैं, (जैसे कि अश्विनी, मघा या मूल) और जो नक्षत्र कर्क, वृश्चिक या मीन के अन्त में आते हैं, (जैसे कि अश्लेषा, ज्येष्ठा या रेवती) कठिनाइयों, परेशानियों और दुखों का कारण बनते हैं।

ये नियम बहुत सामान्य हैं और पंडित इसे नवजात शिशु के पैदा होने पर उसके मां-बाप को डराने के लिए हथियार के रूप में प्रयोग करते हैं। लेकिन नक्षत्रों को चार चरणों में बांटा जा सकता है, इसलिए रेवती, अश्लेषा या ज्येष्ठा के चौथे चरण को जांच में रखा जा सकता है। अश्विनी, मघा और मूल नक्षत्रों की पहली तीन घटी और अश्लेषा, ज्येष्ठा और रेवती की अन्तिम पांच घटी (1 घटी में 24 मिनट होते हैं) महत्वपूर्ण होती हैं।

विचार
यदि जन्म दिन में हुआ है, तो यह पितृ (पिता) गंडांत कहलाएगा जबकि यदि जन्म रात्रि में हुआ है तो यह मातृ (माता) गंडांत कहलाएगा।

दूसरा मत है कि यदि जन्म रेवती-अश्विनी के बीच हुआ है तो यह ‘स्व’ (स्वयं) गंडांत कहलाएगा और यदि जन्म अश्लेषा-मघा के बीच हुआ है तो यह मातृ (माता) गंडांत होगा और यदि जन्म ज्येष्ठा-मूल के बीच हुआ है तो यह पितृ (पिता) गंडांत कहलाएगा।

मूल नक्षत्र का निवास
• मार्गशीर्ष, फाल्गुन, विशाखा और ज्येष्ठा के महीनों में मूल नक्षत्र का निवास ”पाताल लोक’’ में होता है।
• श्रावण, कार्तिक, चैत्र और पौष में मूल नक्षत्र का निवास मृत्यु लोक यानी पृथ्वी पर होता है।
• आषाढ, अश्विन, भाद्रपद और माघ मास में मूल नक्षत्र का निवास स्वर्ग लोक में होता है।

यदि शिशु का जन्म गंडांत में हुआ है और मूल नक्षत्र का निवास मृत्यु लोक में है तो उससे शिशु के जीवन में बड़ी कठिनाइयों, परेशानियों और दुखों के संकेत होते हैं। यदि मूल नक्षत्र का निवास अन्य लोकों-पाताल लोक या स्वर्ग लोक में हो तो संकेत होता है कि शिशु के जीवन में कठिनाइयां, परेशानियां और दुख कुछ कम ही रहेंगे।

जन्म के समय के अतिरिक्त चर, स्थिर और द्विस्वभाव राशियों से भी मूल नक्षत्र के निवास का पता लगाया जाता है कि शिशु के जन्म के वक्त मूल नक्षत्र का निवास मृत्यु, पाताल या स्वर्ग लोक में से कहां था।

जन्म नक्षत्र की संख्या को तीन से गुणा किया जाता है। जन्म तिथि की गणना शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से की जाती है और जन्म के दिन (रविवार से गिनते हुए) को उसमें जोड़ देते हैं। जो संख्या आती है उसे आठ से विभक्त किया जाता है। शेष आने वाली संख्या गंड दोष (त्रुटि/दुख) का संकेत देती हैं।

शेष संख्या से निम्नलिखित प्रभाव माने जाते हैं:

पूर्ण विनाश

सम्पत्ति का नुकसान

माता को खतरा

शारीरिक शक्ति का ह्रास

माता की ओर के रिश्तेदारों की हानि

साथ जन्मे शिशुओं को हानि

पिता की हानि

पूर्ण विनाश

निष्कर्ष
परम्पराओं के अनुसार यदि शिशु का जन्म गंडमूल दोष में हुआ हो तो उसके लिए विभिन्न उपाय किए जाते हैं। लेकिन यह ध्यान रखना भी जरूरी है कि शिशु के जीवन में उपरोक्त नकारात्मक परिणाम तभी आएंगे जब उसकी जन्म कुंडली में अन्य योग भी मौजूद होंगे। जन्म कुंडली में यदि प्रभावित करने वाले अन्य योग मौजूद नहीं हैं तो गंडांत में जन्म का विशेष प्रभाव नहीं होगा। ऋषि वशिष्ठ के अनुसार ‘अभिजीत मुहर्त’ में जन्मे शिशु पर गंडांत के नक्षत्रों का प्रभाव नहीं होता। यदि चन्द्रमा अपने वर्गों में अच्छी स्थिति में हो और वह शुभ ग्रहों से दृष्ट हो तो वह प्रतिकूल प्रभावों को दूर करता है। इसलिए, आंख मींच कर हालात स्वीकार करने की जरूरत नहीं और डरने की भी जरूरत नहीं है, उपाय हैं न!
info@saiastro.com

Владимир мунтян пастор биографияМунтян

Leave a Reply

Your email address will not be published.