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वैज्ञानिकों ने खोजा दूसरा नीला ग्रह

ब्रह्मांड में सिर्फ हमारी पृथ्वी एकमात्र नीला ग्रह नहीं है। वैज्ञनिकों ने अब एक और नीला ग्रह खोज लिया है। लेकिन इस ग्रह की परिस्थितियां इतनी विषम हैं कि वहां किसी तरह के जीवन के पनपने की बात सोची भी नहीं जा सकती। ‘एचडी 189733बी’ नामक यह ग्रह हमारी पृथ्वी से 63 प्रकाश वर्ष दूर वुलपेकुला नक्षत्रमंडल में स्थित है। इस ग्रह की खोज 2005 में हुई थी। हबल स्पेस टेलीस्कोप द्वारा एकत्र आंकड़ों के मुताबिक इस ग्रह का रंग गहरा नीला है, लेकिन यह रंग पानी की वजह से नहीं है। वहां 7000 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से बहने वाली हवाओं के बीच तरल कांच की वर्षा होती है। उसी से यह ग्रह खूबसूरत नीला दिखाई देता है।

ब्रिटेन की एक्स्टर यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिक फे्रडरिक पोंट ने तारे की परिक्रमा के समय ग्रह का बारीकी से अध्ययन किया है। ग्रह के तारे के सम्मुख आने पर हबल टेलीस्कोप ने तारे से परावर्तित होने वाले प्रकाश के साथ-साथ ग्रह से परावर्तित होने वाले प्रकाश को भी ग्रहण किया। जब ग्रह तारे के पीछे चला गया तो परावर्तित होने वाला प्रकाश एकदम अवरुद्ध हो गया। पोंट ने टेलीस्कोप पर लगे एक उपकरण की मदद से देखा कि तारे के पीछे जाने पर नीली रोशनी एकदम मंदी पड़ गई लेकिन ग्रह के दूसरी तरफ उदित होने पर रोशनी फिर से तेज हो गई।

यह पहला अवसर है, जब वैज्ञानिक हमारे सौरमंडल से बाहर किसी बाहरी ग्रह का वास्तविक रंग निर्धारित करने में कामयाब हुए हैं। अतीत में कई वैज्ञानिक दल इस ग्रह का अध्ययन कर चुके हैं, लेकिन अभी किसी ने भी रंग का अनुमान नहीं लगाया था। ग्रह के रंग को निर्धारित करना तकनीकी दृष्टि से बहुत ही चुनौतीपूर्ण कार्य है क्योंकि उससे परावर्तित होने वाला प्रकाश उसके तारे की रोशनी में लुप्त हो जाता है लेकिन ग्रह के तारे के पीछे ओझल होने पर प्रकाश में होने वाली क्षति की नापजोख करके वैज्ञानिक उसके रंग का पता लगा सकते है। पोंट के अनुसार अब हम यह कल्पना कर सकते हैं कि प्रत्यक्ष रूप से देखने पर ग्रह कैसा दिखाई देगा।

यह ग्रह बृहस्पति की भांति एक विशाल गैस पिंड है। यह अपने सूरज के बहुत नजदीक है। यही वजह है कि इसकी सतह का तापमान 1000 डिग्री सेल्सियस या उससे अधिक है। पृथ्वी के वायुमंडल में नीली रोशनी के बिखराव से हमारा ग्रह अंतरिक्ष से देखने पर नीला नजर आता है। लगभग इसी तरह की प्रक्रिया इस ग्रह पर भी होती है। पोंट ने पता लगाया कि ग्रह पर चलने वाली तेज हवाओं के बीच सिलिकेट के कणों की उपस्थिति से नीली रोशनी बिखरती है।

टेक्नोलॉजी के और अधिक उन्नत होने पर खगोल वैज्ञानिक ग्रह के रंग से यह पता लगा सकेंगे कि ग्रह जीवन योग्य है या नहीं। हमारे सौरमंडल में अधिसंख्य ग्रह या तो पूरी तरह से बादलों से घिरे हुए हैं, या उन पर से बादल पूरी तरह से नदारद है। शोधकत्र्ताओं का कहना है कि बादल ग्रहों के वायुमंडलों में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं और गर्म बृहस्पतियों में बादलों की उपस्थिति का खास महत्व है। पृथ्वी की सतह का लगभग आधा हिस्सा बादलों की वजह से अवरुद्ध रहता है। ये बादल जल चक्र की देन हंै, जो जीवन के लिए अनिवार्य है। पोंट का कहना है कि ग्रह का रंग हमें बहुत कुछ बता सकता है। भविष्य में बनने वाले उपकरण पारलौकिक ग्रहों के बदलते हुए रंगों का पर्यवेक्षण कर सकते हैं लेकिन इन उपकरणों की तैनाती के लिए अंतरिक्ष में उपयुक्त दूरबीनों का अभाव हो सकता है।

हबल टेलीस्कोप 20 साल पूरे कर चुका है। चार साल पहले उसकी मरम्मत की गई थी। हबल के अलावा ऐसी कोई और अंतरिक्ष दूरबीन नहीं है, जो प्रकाश के द्रश्य वेवलेंथ में ग्रहों को देख सके। हबल की जगह तैनात किया जाने वाला जेम्स वेब स्पेस टेलीस्कोप सिर्फ इंफ्रारेड रोशनी को ही ग्रहण कर सकता है। 2007 में नासा के स्पिट्जर स्पेस टेलीस्कोप ने ‘एचडी 189733बी’ की इंफ्रारेड रोशनी को नापा था। इसके आधार पर पहली बार किसी बाहरी ग्रह का तापमान-नक्शा तैयार किया गया था। इस नक्शे से पता चलता है कि ग्रह के दिन की तरफ वाले हिस्से और रात की तरफ वाले हिस्से के तापमान में करीब 260 डिग्री सेल्सियस का फर्क है। वैज्ञानिकों के मुताबिक तापमान में इस भारी अंतर के कारण दिन वाले हिस्से से रात वाले हिस्से की तरफ प्रचंड हवाएं चलनी चाहिए।

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