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क्यों हो रहा है, गरीबों के साथ क्रूर मजाक

योजना आयोग के कंगाली (गरीबी रेखा) से जुड़े ताजा आंकड़ों से राजनीतिक हलकों में तूफान मचा हुआ है। जब महंगाई की मार से आम आदमी त्राहिमाम-त्राहिमाम कर रहा हो तब गांव में जिंदा रहने के लिए 27 रूपए और शहर में गुजर-बसर के लिए 33 रूपए काफी बताना एक क्रूर मजाक ही माना जाएगा। कांग्रेस के सांसद राज बब्बर और रशीद मसूद ने 12 और पांच रूपए की थाली का शगूफा छोड़ जले पर नमक छिड़कने का काम किया है। योजना आयोग के दावों पर विपक्षी दल ही नहीं कांग्रेस के नेता भी भरोसा करने को राजी नहीं हैं। कांग्रेस के महासचिव दिग्विजय सिंह और कानून मंत्री कपिल सिब्बल तो खुले आम अपनी असहमति प्रकट कर चुके हैं। इस विवाद से पांच दशक पहले तत्कालीन प्रधानमन्त्री जवाहरलाल नेहरू तथा प्रखर समाजवादी नेता डॉ. राममनोहर लोहिया के बीच हुई बहस की याद ताजा हो जाती है। इस बहस की शुरुआत तब हुई थी जब लोहिया ने संसद में कहा कि जिस देश में ज्यादातर लोगों को दो जून का भोजन भी नसीब न हो उस देश के प्रधानमंत्री पर हर रोज 25000 रूपए खर्च करना धन की बर्बादी है। योजना आयोग के आंकड़ों की बदौलत नेहरु जी ने दावा किया था कि भारत में प्रतिदिन प्रति व्यक्ति औसत आय 15 आना ( तब एक रूपए में 16 आना होते थे) है, जबकि लोहिया ने इस आंकड़े को झूठ का पुलिंदा बताते हुए कहा कि अधिकांश आबादी की आय केवल तीन आना है। तीन आना बनाम 15 आना के नाम से प्रसिद्ध इस बहस के अंत में लोहिया ने सिद्ध कर दिया कि देश की 70 प्रतिशत आबादी की आमदनी प्रतिदिन केवल तीन आना ही है।आम चुनाव करीब है इसलिए सरकार के हर दावे पर आज विपक्षी दल सवाल खड़े कर रहे हैं। योजना आयोग का कंगाली का आंकडा भी विपक्ष के निशाने पर है और आगामी चुनावों में इसे खूब उछाला जाएगा। लेकिन जब राजनेता ही नहीं नामी अर्थशास्त्री भी उक्त दावों की सच्चाई को संदेह की दृष्टि से देख रहे हों तब गहराई से जांच किया जाना जरूरी हो जाता है।

नेशनल सेम्पल सर्वे की ताजा रिपोर्ट का सहारा लेकर योजना आयोग ने दावा किया है कि संयुक्त प्रगतिशील गठबन्धन (यूपीए) सरकार के शासन काल में गरीबों की संख्या 37:2 प्रतिशत से घटकर 21:9 प्रतिशत रह गई है। मतलब सन् 2004-05 और 2011-12 के बीच गरीब आबादी 15.3 प्रतिशत कम हुई और इस दौरान हर साल का हिसाब लगाएं तो गरीब घटने का औसत आंकड़ा 2.2 प्रतिशत बैठता है जो अटल बिहारी वाजपेयी के शासनकाल से कहीं बेहतर है। राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठबन्धन (एनडीए) सरकार के शासनकाल में गरीबी में गिरावट की दर केवल 0.74 प्रतिशत थी। यूपीए सरकार के ये सारे आंकड़े तेंदुलकर समिति के मापदंड पर आधारित हैं। सन् 2009 में तेंदुलकर समिति ने गरीबी रेखा की जो परिभाषा दी थी उसकी भारी खिलाफत हुई। समिति ने गरीबी मापने के कैलोरी आधारित फार्मूले में बदलाव कर खर्चे में स्वास्थ्य और शिक्षा को शामिल करने का सराहनीय काम तो किया लेकिन भोजन कैलोरी घटाकर 1776 (शहरों में) कर दी। समिति की सिफारिशों का विरोध होने पर सरकार ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के आर्थिक सलाहकार रंगराजन की अध्यक्षता में एक नयी समिति गठित कर दी थी। रंगराजन समिति की सिफारिशें अगले वर्ष के मध्य तक मिलने की आशा है। ऐसे में सवाल यह उठता है की जब तेंदुलकर समिति की सिफारिशों को नामंजूर किया जा चुका है और रंगराजन समिति की सिफारिशें अभी आई नहीं तब योजना आयोग का गरीबी घटने का आंकड़ा कैसे विश्वसनीय माना जा सकता है। लगता है महंगाई और भ्रष्टाचार के थपेड़ों से बेबस यूपीए सरकार योजना आयोग के संदेहास्पद आंकड़ों के सहारे अपनी नैया पार लगाने का प्रयास कर रही है।

नोबेल पुरस्कार प्राप्त अर्थशास्त्री अमत्र्य सेन और ज्यों द्रेज़ की ताजा पुस्तक ‘ इंडिया एंड इट्स कंट्राडिक्शन‘ से देश के विकास के दावों और पैमानों को गंभीर चुनौती मिलती है। खुली और बाजार आधारित अर्थव्यवस्था का मोटा सिद्धांत है कि यदि गरीबों का भला करना है तो देश की आर्थिक विकास दर ऊंची रखो। इस सिद्धांत के अनुसार जब विकास तेजी से होगा तो समृद्धि आएगी और गरीबों को भी इसका लाभ मिलेगा। लेकिन अंतर्राष्ट्रीय जगत में आज केवल आर्थिक विकास के पैमाने को अपनाने का चलन खारिज किया जा चुका है। किसी देश की खुशहाली नापने के लिए अब मानव विकास सूचकांक तथा भूख सूचकांक जैसे मापदंड अपनाए जा रहे हैं और इन दोनों पैमानों पर हमारे देश की हालत दयनीय है। यदि विकास के लाभ का न्यायसंगत बंटवारा न किया जाए और खुले बाजार पर विवेकपूर्ण नियंत्रण न रखा जाए तो समाज में बदअमनी फैलने का भय रहता है। आज हमारा देश इस खतरे के मुहाने पर खड़ा है।

नेशनल सेम्पल सर्वे की ताजा रिपोर्ट के अनुसार भारत में गरीबों और अमीरों के बीच की खाई निरंतर चौड़ी होती जा रही है। खर्चे और उपभोग के आधार पर किये गए अध्ययन में पाया गया है कि वर्ष 2000 और 2012 के बीच ग्रामीण इलाकों में रईसों के खर्चे में 60 फीसदी इजाफा हुआ जबकि गरीबों का खर्च केवल 30 प्रतिशत बढ़ा। इस दौरान शहरी इलाकों में धनवान और निर्धन के व्यय में क्रमश: 63 और 33 प्रतिशत बढ़ोतरी हुई। जहां वर्ष 2000 में एक अमीर आदमी का खर्च गरीब के मुकाबले 12 गुना था, वहीं अब यह बढ़कर 15 गुना हो गया है। ताजा अध्ययन से एक और भ्रम टूटा है। आज शहरों के मुकाबले गाँवों में महंगाई की मार ज्यादा है। आंकड़ों के अनुसार दाल, सब्जी, फल, तेल, दूध, चीनी और कपड़ों की कीमत देहाती इलाकों में कहीं ज्यादा है। ग्रामीण इलाकों में गरीबी की रेखा से नीचे जीने को मजबूर लोगों की संख्या भी अधिक है। इसका अर्थ तो यही हुआ की आज शहरों के मुकाबले गाँवों में रहने वालों की हालत कहीं दयनीय है।

आंकड़ों के जंगल से निकलकर फिर अमत्र्य सेन के सुझाव पर लौटते हैं। उनके अनुसार ‘मार्किट मेनिया’ के लोभ और ‘मार्किट फोबिया’ के भय से निकले बिना देश का कल्याण असंभव है। झूठे आर्थिक विकास के दावे और थोथी राजनितिक बहस जनता को गुमराह करने के औजार हैं। बहस मूल मुद्दों पर होनी चाहिए। भोजन, शिक्षा और स्वास्थ्य मूल मुद्दे हैं और इन्हें मुहैया कराना हर सरकार की पहली जिम्मेदारी है। जो सरकार इस जिम्मेदारी को पूरा नहीं कर पाती उसका सत्ता में बने रहना कठिन होता है।

 

धर्मेंद्रपाल सिंह

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