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घुसपैठ की चीनी हरकतें जारी हैं

चीन ने जब कश्मीरियों को नत्थी वीजा देने की नीति पर रोक लगाई तब भारत ने चीन के साथ सामान्य रक्षा रिश्ते बनाने को हरी झंडी दी। इसी लिये रक्षा मंत्री ए के एंटोनी के चार से सात जुलाई के चीन दौरे में चीनी रक्षा मंत्री छांग वान छ्वान के साथ बातचीत के दौरान दोनों देशों की थलसेनाओं के बीच फिर से साझा सैन्य अभ्यास का सिलसिला बहाल करने पर सहमति दी।

सात साल बाद भारत के रक्षा मंत्री ने चीन की धरती पर कदम रखा और उनका स्वागत धमकियों से हुआ। इसके बावजूद रक्षा मंत्री ए के एंटोनी ने चीन का दौरा कर चीन से रिश्तों में कटुता के मसलों पर चर्चा की और एक दूसरे पर भरोसा पैदा करने के नये उपायों पर बातचीत कर साझा बयान भी जारी किया लेकिन इसके बावजूद चीनी सेना द्वारा भारतीय इलाके में घुसपैठ की हरकतें लगातार जारी हैं। जुलाई के दूसरे और तीसरे सप्ताह में तो चीनी सैनिकों ने छह बार लद्दाख के इलाके में घुसपैठ की। चीनी सैनिक घोड़ों पर सवार हो कर आए और भारतीय सैनिकों को धमका कर चले गए कि यह इलाका चीन का है जहां से भारतीय सैनिक वापस चले जाएं।

हालांकि चीन के नये नेतृत्व ने भारत के साथ रिश्ते सुधारने की पहल की थी और इसी इरादे से अपने प्रधानमंत्री का सबसे पहला विदेश दौरा ( 19 से 21 मई) भारत से ही करवाया। लेकिन इसके एक महीना पहले लद्दाख की देपसांग घाटी में अपनी सेना से घुसपैठ करवा दी। इस घुसपैठ पर जब भारत ने नाराजगी दिखाई तब चीन किसी तरह वहां से हटने को तैयार हुआ। इसमें भी उसे तीन सप्ताह लग गए और बदले में भारत से भी अपनी शर्त मनवा ली कि भारतीय सैनिक भी काफी पीछे हट जाएं जब कि देपसांग घाटी लद्दाख के इलाके में ही है। चीन को जब लगा कि घुसपैठ के मसले को भारत ने काफी गम्भीरता से लिया है और इसका असर चीन के प्रधानमंत्री के भारत दौरे पर पड़ सकता है तब जाकर चीन ने अपने सैनिकों को पीछे हटाया। इस वारदात के बाद ऐसा लग रहा था कि भारत के संकल्प की परीक्षा लेने के बाद चीन अब समझ गया है कि वह भारत से पंगा नहीं ले सकता। लेकिन चीन ने एक बार फिर भारत के साथ मुंहजबानी पंगा लेने की कोशिश की और मौका चुना भारतीय रक्षा मंत्री के चीन दौरे का ।

एंटोनी ने देपसांग घाटी में चीनी घुसपैठ समाप्त करने को लेकर कई बार चेतावनी वाले लहजे में टिप्पणियां की थीं जो भारतीय विदेश मंत्रालय के नरम बयानों से काफी हट कर थीं। शायद इसीलिये रक्षा मंत्री ए के एंटोनी चार जुलाई को जब पेइचिंग पहुंचे तब उसी दिन चीन के एक मेजर जनरल ल्वो य्वान ने विदेश पत्रकारों से बातचीत में भारत के लिये अनाप शनाप बातें कहीं। चेतावनी दी कि भारत सीमा पर समस्या खड़ी नहीं करे। ल्वो चीनी जनमुक्ति सेना(पीएलए) के सेवारत जनरल हैं इसलिये अपनी सरकार की नीति के खिलाफ इतना खुलकर तो यूं ही नहीं बोल सकते। चीन में तो कोई अदना आदमी भी सरकार की नीतियों के खिलाफ नहीं बोल सकता इसीलिये जब एक सेवारत जनरल ऐसे मौके पर भारत को खुली धमकियां दे रहा हो तब यह माना जाना चाहिये कि चीन सरकार जनरल ल्वो के बहाने भारत को एक कड़ा संदेश देना चाह रही थी। यदि ऐसी बात नहीं थी तो चीन के विदेश या रक्षा मंत्रालय को इसका खंडन जारी करना चाहिये था और साफ कहना चाहिये था कि चीनी जनरल के खिलाफ सरकार की नीतियों से अलग राय जाहिर करने के लिये कार्रवाई की जाएगी। लेकिन चीन सरकार के प्रवक्ता ने केवल इतना ही कहा कि जनरल की राय चीन की नीति से मेल नहीं खाती है।

साफ है कि अपने जनरल के जरिये चीन भारत को यह बताना चाह रहा था कि चीन की शर्तों पर सीमा मसले का हल खोज ले अन्यथा सीमा मसला लटका रहेगा और इसमें नुकसान भारत का ही होगा। लेकिन चीन के प्रधानमंत्री ली ख छ्याग ने जिस तरह भारत दौरे में भारत के साथ रिश्तों को लेकर मीठी बातें कीं और भारतीयों को अपनी बातों से खूब लुभाया उससे शायद भारतीय पर्यवेक्षक ही चीन के असली इरादों को भांप नहीं पाए। इसीलिये न केवल भारतीय पर्यवेक्षक चीनी जनरल की भारत की चेतावनी वाला बयान सुनकर हैरान रह गये बल्कि दुनिया भर में इसे नोटिस में लिया गया। खासकर इसलिये कि मेहमान रक्षा मंत्री की मौजूदगी में चीन ने यह उद्दंडता दिखाई। अ’छा हुआ कि चीनी गिरगिट ने अपना असली रंग दिखा दिया। चीन की इस हरकत से भारत को अब चीन को लेकर कोई नीति तैयार करते वक्त यह हमेशा ध्यान रखना होगा कि चीन की भीतरी मंशा क्या है। जनरल ल्वो से उक्त बयान दिलवा कर चीन ने भारत में चीन के प्रति शंका और गहरी कर दी है और चीन के किसी सद्भावना वाले कदम को स्वीकार करने के पहले भारत कई बार सोचेगा। भारतीय सामरिक कर्णधारों ने यदि ऐसा नहीं किया तो वे भारत के हितों को भारी चोट पहुंचाएंगे।

चीनी जनरल के बहाने चीन ने भारत को चेताने की कोशिश तो की लेकिन वास्तव में उसने अपना असली चेहरा दिखाया जिससे भारतीय नीतिकार अगले कई सालों तक चीन की मीठी बातों के बहकावे में आने के पहले कई बार उसे तोलेंगे। चीन को यह समझना होगा कि भारत की सेना 1962 वाली नहीं रही जब उसके जवानों को बर्फीली पहाडिय़ों पर लडऩे के लिये कपड़े के जूते पहना कर भेजा गया था। भारत की सेना अब परमाणु बमों वाली बैलिस्टिक मिसाइलों से लैस हो चुकी है जो चीन की राजधानी तक वार कर सकती है। इसीलिये अपने जनरल के मुंह से चीन ने जो धमकी दिलवाई उसने भारत में इन आशंकाओं की पुष्टि की है कि चीन भारत के प्रति कितनी दुश्मनी की भावना रखता है। भले ही चीनी प्रधानमंत्री सबसे पहले भारत आ कर भारत से हिमालय की ऊंचाईयों पर हाथ मिलाने की बातें करें भारतीयों को अब हमेशा यह लगेगा कि चीन ने दूसरे हाथ में छुरा रखा हुआ है जिसे वह भारत की पीठ में घोंपने को तैयार बैठा है।

वास्तव में चीन भारत को धमकाने के साथ साथ लुभाने की दोमुंही नीति पर चलना चाहता है। भारत को लुभाने की कोशिश इसलिये कि वह चीन की मीठी मीठी बातों में आ जाए और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चीन के साथ खड़ा दिखे। चीन ने अपने दूसरे सागरीय पड़ोसी देशों के साथ जिस तरह का बर्ताव कर रखा है वह पूरी दुनिया में ङ्क्षचता की बात बनी हुई है। चीन ने छोटे से फिलीपीन को डराया हुआ है, अपने पड़ोसी वियतनाम को हमेशा धमकाने की कोशिश करता है और दक्षिण चीन सागर के वियतनामी इलाके पर अपना कब्जा यह कह कर बताना चाहता है कि पूरा दक्षिण चीन सागर चीन का है। पिछले साल चीन ने भारत को वियतनाम के इस इलाके से तेल और गैस के दोहन की गतिविधियां बंद कर देने की चेतावनी यह कह कर दी थी कि यह इलाका चीन का है जिस पर वियतनाम अपना अधिकार बताना चाह रहा है। लिहाजा भारत वियतनाम के कहने पर वहां अपने तेल और गैस खोजने वाले संसाधन नहीं लगाए।

दक्षिण चीन सागर पर यदि चीन का वास्तव में कब्जा हो गया तो न केवल भारत बल्कि पूरी दुनिया के व्यापार और समुद्री आयात निर्यात पर असर पड़ेगा। भारत का आधा से अधिक आयात निर्यात दक्षिण चीन सागर के समुद्री व्यापारिक मार्ग के जरिये ही होता है इसलिये भारत का आर्थिक व सामरिक हित मांग करता है कि दक्षिण चीन सागर का यह व्यापारिक मार्ग खुला रखने के लिये दक्षिण चीन सागर के तटीय देशों के साथ अपना तालमेल और सामरिक साझेदारी और गहरा करे। भारत की इस तरह की गतिविधियां चीन को नागवार गुजर रही हैं। चीनी प्रधानमंत्री के 20 मई के भारत दौरे के तुरंत बाद भारतीय प्रधानमंत्री जब चीन के दुश्मन समझे जाने वाले जापान के दौरे पर गए तो चीन को यह काफी बुरा लगा। जापान जा कर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने जापान को अपना स्वाभाविक साथी घोषित किया और रक्षा व सामरिक सहयोग के कई समझौते घोषित किये ।

हालांकि चीन के साथ पिछले दशक के शुरू में रक्षा सहयोग के सम्बन्ध कुछ गहरे होने लगे थे जब चीन और भारत के नौसैनिक पोतों ने एक दूसरे के यहां सद्भावना दौरे शुरू किये और 2007 और 2008 में हाथ में हाथ नाम से साझा सैन्य अभ्यास किये। लेकिन इसका तीसरा दौर इसलिये नहीं हो पाया कि 2010 में चीन ने जम्मू कश्मीर के उधमपुर स्थित उत्तरी कमांड के प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल जामवाल को चीन के आधिकारिक दौरे के लिये सामान्य वीजा के बदले नत्थी वीजा जारी करने का फैसला किया जिसे भारत ने नामंजूर कर दिया। नाराज भारत ने जवाब में चीन के साथ सभी तरह के रक्षा आदान प्रदान रोक दिये।

चीन ने जब कश्मीरियों को नत्थी वीजा देने की नीति पर रोक लगाई तब भारत ने चीन के साथ सामान्य रक्षा रिश्ते बनाने को हरी झंडी दी। इसी लिये रक्षा मंत्री ए के एंटोनी के चार से सात जुलाई के चीन दौरे में चीनी रक्षा मंत्री छांग वान छ्वान के साथ बातचीत के दौरान दोनों देशों की थलसेनाओं के बीच फिर से साझा सैन्य अभ्यास का सिलसिला बहाल करने पर सहमति दी। इसका फैसला इस साल जनवरी में ही हो चुका था जब भारतीय रक्षा सचिव के नेतृत्व में एक शिष्टमंडल पेइचिंग गया था। इसी फैसले को हरी झंडी दे कर भारत ने चीन को यह संदेश दिया है कि वह चीन के किसी जनरल के धमकी भरे बयान से डरने वाला नहीं है। इसीलिये रक्षा मंत्री एंटोनी ने चीन दौरे में चीनी जनरल के बयान को नजरअंदाज किया और कहा कि हमें यह देखना चाहिये कि दोनों देशों की बातचीत के नतीजे क्या निकले हैं। यह एक विडम्बना ही है कि भारत और चीन के सैनिक एक तरफ तो आतंकवाद के खिलाफ साझा सैन्य अभ्यास करेंगे और दूसरी ओर वे दोनों साझा सीमा पर चौकसी और रक्षा के लिये आमने सामने की स्थिति में तैनात हैं। चीन सीमा मसले को लटकाए रख कर भारत पर सैन्य दबाव बढ़ाना चाहता है। वास्तव में चीन ने अपने इलाके में सीमा के काफी भीतर ऐसे सैन्य ढांचे खड़े किये हैं जहां से वह अपने सैनिकों को कुछ घंटे के भीतर ही जमा कर भारत पर हमला कर सकता है।

दूसरी ओर भारत का इलाका पहाड़ी है जहां सैनिक हमेशा तैनात नहीं रह सकते। इसीलिये भारत को अपने सैनिकों को वास्तविक नियंत्रण रेखा के काफी नजदीक रखना पड़ता है। हाल में भारत ने इस चार हजार किलोमीटर लम्बी रेखा पर दो और सैन्य डिवीजन तैनात की है और तीन डिवीजनों वाला एक और पर्वतीय कोर (करीब 50 हजार सैनिक) तैनात करने की तैयारी शुरू कर दी है। चीन को अब लग रहा है कि अरुणाचल प्रदेश के इलाके में भारतीय सेना की एक और कोर तैनात हो गई तो चीनी सेना को भारत के खिलाफ कोई कार्रवाई करना काफी मुश्किल होगा।

 

रण जीत

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