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यूपीए ने किया बंटाधार देश की अर्थव्यवस्था का: प्रकाश जावडेकर

अर्थव्यवस्था की फिसलन और रूपये की गिरावट पर राज्यसभा सांसद एवं भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता प्रकाश जावडेकर से उदय इंडिया के वरिष्ठ संवाददाता सुधीर गहलोत की बेबाक बातचीत के अंश…

रूपये की गिरावट से अर्थव्यवस्था पर क्या असर होगा?
रुपये की गिरावट बीमारी नहीं, बीमारी शुरू होने के लक्षण हैं। अगर समय रहते इसका इलाज नहीं किया गया, तो यह बीमारी जल्दी ही लाइलाज हो जाएगी। आयात-निर्यात का संतुलन बिगडऩे के कारण ‘करेंट एकाउंट डेफिसीट’ होता है। इसकी मुख्य वजह आयात का ज्यादा होना और निर्यात का कम होना है। यह यूपीए सरकार की नाकामी का ही परिणाम है कि आयात बढ़ता गया और निर्यात को बढ़ावा देने के लिए सरकार ने कुछ नहीं किया। जिसका नतीजा यह हुआ कि आयात-निर्यात असंतुलन का घाटा, सकल घरेलू उत्पाद का 5 प्रतिशत हो गया है। यूपीए सरकार की तमाम आर्थिक नीतियों को देखें तो निर्यात बढ़ाने पर जोर देने के लिए ऐसा कोई कदम नहीं उठाया गया है, जिसका लाभ देश को मिल सके।

एफडीआई के माध्यम से अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने की कोशिश कितनी सफल होगी?
देश में उपलब्ध विदेशी मुद्रा का बड़ा हिस्सा विदेशी संस्थागत निवेशकों (एफआईआई) द्वारा लगाई गयी पूंजी का है। दरअसल ये निवेशक शेयर बाजारों में सट्टेबाजी के उद्देश्य से बाहर आते हैं। बहुत कम समय में अपनी पूंजी लेकर वापस चले भी जाते हैं। पिछले 6 महीनों में लगभग 6 खरब रुपये, ये भारत से ले जा चुके हैं। अमरीका के फेडरल बैंक द्वारा निवेशकों में विश्वास जगाने के लिए किए गए उपायों के कारण, ज्यादातर निवेशकों ने अमरीकी बाजारों में अपनी पूंजी लगाई है। जिसका असर अमरीका के शेयर बाजारों में तेजी के रुप में दिखाई दे रहा है।

रुपये के अवमूल्यन के क्या कारण हैं?
पिछले 6 महीनों में रुपये के दामों में 30 प्रतिशत की गिरावट आई है। आजादी के समय 1 रुपये का मूल्य, 1 डॉलर के बराबर हुआ करता था। आज 1 डॉलर का मूल्य 60 रुपए हो गया है। यह यूपीए सरकार की आर्थिक नीतियों की खामी का नतीजा है। सरकार की नीतियों के कारण बचत करने की प्रवृत्ति कम हो रही है, जिससे घरेलू स्तर पर निवेश कम हो रहा है। औद्योगिक स्तर पर पिछले 3-4 सालों में जितना निवेश भारत में हुआ है, उससे ज्यादा भारतीय उद्यमियों ने विदेशों में निवेश किया है। इससे भारतीय मुद्रा बाहर गई है। यह निवेश अगर भारत में होता तो भारतीय अर्थव्यवस्था को संबल मिलने के साथ-साथ भारत में रोजगार के अवसर भी बढ़ते। जिससे लोगों की क्रयशक्ति में वृद्धि होती।

भारतीय उद्यमी विदेश में क्यों निवेश करते हैं?
देखिए, ग्लोबल इम्पैक्ट बनाना जरुरी होता है। व्यवसाय के लिए अनुकूल वातावरण भी चाहिए होता है। निवेशकों को चार चीजें चाहिए। जल्दी मंजूरी, बुनियादी और मजबूत आधारभूत संरचना, सरकार का क्लियरेंस व्यवसायिक वातावरण तैयार करने के लिए बनाई गयी नीतियां। यूपीए सरकार ने सब कुछ उलटफेर कर दिया। इन नाकामियों में पर्यावरण मंत्रालय की भी बड़ी भूमिका है। कई मामलों में पर्यावरण मंत्रालय की नाकामी की वजह से प्रधानमंत्री भी कुछ नहीं कर पा रहे हैं। यही वजह है कि आर्सेलर मित्तल जैसी देशी कंपनी अपना व्यवसाय भारत से बटोर ले गयी। विश्व की सबसे बड़ी स्टील कंपनी आर्सेलर मित्तल ने 60 हजार करोड़ रूपये का कारोबार उड़ीसा में और 30 हजार करोड़ रुपये का कारोबार कर्नाटक में शुरू करने से पहले ही अपने हाथ खींच लिए। एफडीआई की वजह से भारत में 6 बिलियन अमेरिकी डॉलर का निवेश होगा लेकिन इन कंपनियों द्वारा पूंजी बाहर से बाहर लगाने पर इससे कई गुणा ज्यादा का नुकसान हो रहा है। सरकार समस्या का समाधान कर सकती थी। वोडाफोन मामले पर सरकार ने जल्दी में जो फैसले लिए, उससे निवेश नहीं बढ़ाया जा सकता। इसके लिए एक नीति होनी चाहिए, जिसमें घरेलू निवेशकों सहित विदेशी निवेशकों के लिए प्रावधान हों।

अगर यही स्थिति भाजपा के सामने आती तो भाजपा की क्या नीति होती?
यह एक अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री की विफलता है। अनाज गोदामों में सड़ रहा है, लेकिन सरकार उसे वितरित कराने में अक्षम है। इस मामले में वाजपेयी सरकार ने उचित कदम उठाए थे। उस समय गोदामों में अनाज नहीं सड़ा करता था। 2003 में खाद्यान्न तेल का आयात नहीं किया जाता था। तिलहन और दलहन फसलों के आधार पर हम अपनी जरुरतों को खुद पूरा कर लिया करते थे। लेकिन आज देश में खाद्यान्न तेल की कुल जरुरत का 60 प्रतिशत विदेश से आयात किया जाता है। हमारे यहां कोयले का भंडार है, फिर भी आज सालाना 50 हजार करोड़ रुपये का कोयला आयात किया जाता है। भारतीय अर्थव्यवस्था पर कच्चे तेल की स्थिति का अलग से बोझ है इन सब वजहों से आयात का भार देश पर बढ़ता गया और निर्यात खुद को संतुलित करने में अक्षम रहा। सरकार पेट्रोल-डीजल पर 50 फीसदी टैक्स लेती है। जो सालाना 1.50 लाख करोड़ रुपये बैठता है। जिससे भारतीय अर्थव्यवस्था पर भार पड़ता है।
प्रधानमंत्री अर्थशास्त्री हो कर भी देश की अर्थव्यवस्था को संभालने में अक्षम क्यों हैं?
इस तरह का विकास निष्प्राण है, जो रोजगार देने और बचत को बढ़ावा देने में असफल है। डॉ. मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री की तुलना में एक वित्तमंत्री के रुप में ज्यादा प्रभावी थे। लेकिन सोनिया गांधी के साए में आकर वह निष्प्रभावी हो गए हैं। उनका सारा ज्ञान निरर्थक हो गया है। यूपीए सरकार ने वोट की चिंता में पैसे बांटने का काम जारी रखा लेकिन पैसे जुटाने का कोई प्रबंध नहीं किया।

1998 में भारत की विकास दर 4.8 प्रतिशत सलाना थी। कुशल संचालन से हम इसे 8.4 तक लेकर आए। बचत अच्छी थी, इसलिए निवेश ज्यादा था। आयात-निर्यात का घाटा शून्य था। आज यह आंकड़ा बढ़कर 5 प्रतिशत हो गया है। हमने यूपीए सरकार को 8.4 प्रतिशत की विकास दर के साथ जो सत्ता सौंपी थी, उसे यूपीए ने वापस 4.8 प्रतिशत पर ला दिया है।

क्या वैश्विक मंदी के कारण यूपीए सरकार असफल हो रही है ?
वाजपेयी सरकार के कार्यकाल के दौरान भी परिस्थितियां ऐसी ही थी। एशियन डवलपमेंट बैंक क्राइसिस हुआ था। पोखरण में परमाणु विस्फोट के कारण भारत पर आर्थिक प्रतिबंध लगाया गया था। जिसके कारण करेंसी क्राइसिस का भी वाजपेयी सरकार को सामना करना पड़ा था। फिर भी वाजपेयी सरकार ने अर्थव्यवस्था को पटरी से उतरने नहीं दिया।

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