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”भाजपा से चुनाव समझौते के लिए दरवाजे खुले हैं’’ बी. एस. येद्दियुरप्पा

”मेरे लिए कनार्टक का हित सर्वोपरि है। राज्य के लिए जो हित में होगा और राष्ट्र का रूख जिधर होगा उसके अनुसार हम चुनाव समझौते करेंगे। कर्नाटक जनता पक्ष का स्वरूप क्षेत्रीय दल का है, लेकिन उसका दृष्टिकोण राष्ट्रीय है। कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री बी.एस. येद्दियुरप्पा ने उदय इंडिया के विशेष संवाददाता एस. ए. हेमंत कुमार से एक बातचीत में कहा। प्रस्तुत हैं कुछ अंश:

अपने राजनीतिक भविष्य के प्रति आप स्पष्ट नहीं हैं?
नहीं, यह सही नहीं है। मुझे क्या करना है इस बारे में मैं बिल्कुल स्पष्ट हूं। हमने निश्चय किया है कि हमारा दल कर्नाटक जनता पक्ष ( क ज प ) का किसी भी अन्य दल में विलय नहीं होगा। यह अपनी पहचान को खत्म नहीं करेगा, लेकिन हम किसी भी दल के साथ चुनाव समझौता करने को तैयार हैं।

आप अपने चुनाव के सहयोगी का चयन कैसे करेंगे?
इसके दो मान दंड हैं? पहला हमारे गठबंधन से कर्नाटक को लाभ होना चाहिए। चुनावी या राजनीतिक लाभ के लिए हम कर्नाटक के हितों की बलि नहीं चढ़ायेंगे। कर्नाटक के हितों की रक्षा करने के लिए ही हम क ज प का निर्माण कर रहे हैं। इसके लिए हम केन्द्र में प्रेशर ग्रुप के रूप में बड़ी भूमिका निभायेंगे। दूसरा हांलाकि हमारा दल क्षेत्रीय है, पर हमारा दृष्टि कोण राष्ट्रीय है। इसलिए हम राष्ट्रीय रुख को ध्यान में रख कर ही कदम उठायेंगे। इस बारे में अभी से कुछ भी कहना जल्दबाजी होगी।

आपने भजपा के नेताओं से बात की है, गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी की तारीफ की है, इसका अर्थ है आप पुन: भाजपा में जाना चाहते हैं?
मैंने कहा न कि क ज प का किसी भी अन्य दल में विलय का प्रश्न ही नहीं उठता। यह सही है कि मेरे मन में मोदी जी का बहुत आदर है। उन्होंने साबित कर दिया है कि वे अच्छे प्रशासक हैं। उन्हें सारा भारत पंसद करता है। किसी के अच्छे गुणों की तारीफ करने में कोई बुराई नहीं है। लेकिन केवल इतने से ही चुनावी समझौता संभव नहीं है। मैं चुनाव समझौते का फैसला इस आधार पर करूंगा कि राज्य के हित में क्या है? और राष्ट्र का रूख क्या है? मुझे क ज प के भविष्य के बारे में भी सोचना है। मैं राज्य के आत्म सम्मान अपने साथियों और कार्य कर्ताओं के आत्म सम्मान और अंत में अपने आत्म सम्मान की बलि नहीं चढ़ा सकता।

भाजपा में पुन: शामिल होने में समस्या क्या हैं? आपका जीवन वहीं गुजरा हैं?
मेरा कहना है कि भाजपा में पुन: शामिल होने की बात पर मैं तब विचार करूंगा, जब भाजपा इस बारे में केन्द्र और राज्य दोनों स्तरों पर सम्मूहिक फैसला ले और मुझ से दल में लौटने की प्रार्थना करें और मुझे सार्वजनिक रूप से यह वचन दें कि दल में पुन: शामिल होने के बाद मेरी उपेक्षा नहीं की जायेगी। मेरी और कोई शर्त नहीं है। यह अफवाह कोरी गप्प है कि मैंने विधान सभा में विपक्ष के नेता पद की मांग की है। लेकिन मैं जानता हूं कि भाजपा में इस बारे में मतभेद है कि मुझे आमत्रंण दिया जाये या नहीं। मैं बिना बुलाया मेहमान नहीं बनना चाहता। आत्म सम्मान नाम की भी कोई चीज होती है। मैं एक योद्धा हूं। मैं कुछ मूल्यों और सिद्धांतों के लिए संघर्ष कर रहा हूं। मैं समझौता नहीं करूंगा।

यदि नरेन्द्र मोदी आप से भाजपा में वापस आने को कहें?
इस काल्पनिक प्रश्न का उत्तर मैं नहीं दे सकूंगा। रास्ते में कोई पुल आयेगा तभी तो मैं उसे पार करूंगा। लेकिन मुझे नहीं लगता कि यह स्थिति ( पुन: शामिल होने की ) आयेगी। लेकिन भाजपा से चुनाव समझौता करने के बारे में मेरा मन खुला है। यदि वह दोनों पक्षों के हित में हो। जिस में सीमा के मुद्दे पर, नदी पानी विवाद और राज्य के साथ सद्यवहार आदि मुद्दों पर कर्नाटक के हितों की रक्षा करना शामिल है।

दिल्ली में आपने भाजपा पर दवाब डालने के लिए कांग्रेस के नेताओं से भी बात की थी?
मेरी दिल्ली यात्रा पूरी तरह से व्यक्तिगत यात्रा थी। वहां मैंने किसी भी राजनैतिक दल के नेताओं से मुलाकात नहीं की। विभिन्न मुकदमों के सिलसिले में मुझे वकीलों से मिलना था और उनसे बात करनी थी। आज ऐसा वक्त है जब 24 घंटे मीडिया जागरूक रहता है। क्या यह संभव है कि बड़े नेताओं से मुलाकात हो और मीडिया को पता नहीं चले? और यदि मैं किसी नेता से मिलता तो इसे खुलकर बताने में मुझे कोई दिक्कत नहीं होती। किसी पर दवाब बनाने के लिए किसी और से मिलने का सवाल ही पैदा नहीं होता। मैं सीधा खेल खेलता हूं। मैं किसी से डरता नहीं हूं।

आपने कहा कि मैं तीसरे मोर्चे को मजबूत करूंगा और अचानक आप का प्यार जद ( एस ) के नेताओं एच. डी. देवगौड़ा और उनके पुत्रों के प्रति उमड़ पड़ा?
नही। राजनीति में स्थायी शत्रुता जैसी कोई चीज नहीं होती। यदि विचार धारा के मुद्दों पर गहरे और तीव्र मतभेद हों तो बात अलग है। अभी तक कांग्रेस और भाजपा दोनों राष्ट्रीय दलों ने किसी भी मुद्दें पर पार्टी लाइन से ऊपर उठ कर कर्नाटक को न्याय नहीं दिलाया है, चाहे उर्वरकों, कोयले की आपूर्ति का मामला हो, नदी पानी विवाद हो या पड़ोसी राज्यों के साथ सीमा के विवाद हों। मेरी यह दृढ़ मान्यता है कि कर्नाटक को न्याय दिलाने के लिए मजबूत लॉबी की जरूरत है। इस संदर्भ में मैंने कहा था कि मं तीसरे मोर्चे को मजबूत करने का यत्न करूंगा। जिसमें क ज प मुख्य भूमिका में होगी। लोकसभा में यदि सीटों की संख्या बढ़ती है, तभी क ज प बड़ी भूमिका निभा सकती है, इस संदर्भ में मैंने कहा था कि केवल कर्नाटक के हित के लिए मैं किसी भी दल के साथ समझौते करने को तैयार हूं , जिसमें जद (एस) भी शामिल है।

आप मानते हैं कि अन्य दलों से समझौता करके ही क ज प अपनी शक्ति बढ़ा सकती है?
क ज प को 10 प्रतिशत मत और छह सीटें मिलीं। 37 विधानसभा क्षेत्रों में यह दूसरे नंबर के करीब थी, 29 विधानसभा और 10 लोकसभा क्षेत्रों में यह 6,000 से भी कम मतों से हारी। हमें 10 लाख से अधिक मत मिले। केवल चार माह पुराने दल के लिए यह मामूली उपलब्धि नहीं है। कर्नाटक राज्य के राजनैतिक और निर्वाचन इतिहास में ऐसा कोई दूसरा उदाहरण नहीं है। हमारी ताकत को देख कर अन्य राजनीतिक दल क ज प से गुपचुप चुनाव समझौते करने का विचार कर रहे हैं। मैं यह भी कहना चाहंूगा कि हमे सचाई को स्वीकार करना होगा। भावनात्मक कोण और महत्वकांक्षा एक तरफ हैं, दूसरी तरफ समझदारी है। 1989 में लोकसभा चुनावों में चुनाव समझौतों के कारण भाजपा को लाभ हुआ। इसमें एक मुख्य भूमिका चुनाव समझौतों की भी थी। हालांकि उन दिनों राम मंदिर की प्रबल लहर चल रही थी।

अन्य नेताओं से चुनाव समझौतों पर आपकी बातचीत की क्या स्थिति है?
किसी भी राजनैतिक दल से अभी औपचारिक या अधिकारिक बातचीत नहीं हुई है, इसमें भाजपा भी शामिल है। लेकिन यह सच है कि मेरे मित्रों ने भाजपा में पुन: शामिल होने का मुद्दा राज्य और केन्द्र के स्तरों पर बड़े नेताओं के सम्मुख उठाया है। लेकिन इसका यह अर्थ नहीं है कि कोई बातचीत शुरू हो गई है। यह मामला केवल निजी स्तर पर है। कुछ नेता आपस में बात कर रहे हैं, राज्य या केन्द्र के स्तर पर किसी ने भी मुझ से संपर्क नहीं किया है। यदि इससे हमारे दल को लाभ होता है तो मुझे किसी से भी बात करने में संकोच नहीं है। क ज प के माध्यम से इससे राज्य को भी लाभ होना चाहिए।

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