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हिन्दुत्व हमारी ध्येय साधना

विचार का प्रथम साक्षात्कार और इस विचार का प्रत्यक्ष जीवन में अभिव्यक्तिरूप विकास संयोग से हमारे देश में हुआ, समुद्रवेष्ठित, हिमालय के किरीट से मण्डित हमारी मातृभूमि के अंदर हुआ। इसी मानवता को, इसी वैश्विक सत्य को, इसी बन्धुभाव को दुनिया कहती है-‘हिन्दुत्व’। यह हमारी पहचान है ओर हमारे जीवन की प्रेरणा है इसलिए हमारे पुरूषार्थ का उत्स है। हमारी सब प्रकार की प्रगति का वह कारक है और हमारे विविध प्रकारों को जोडऩे का वह एकमात्र सूत्र है।

गीता में श्लोक है–”अधिष्ठानं तथा कर्ता, करणम् च पृथकविधम्। विविधाश्च पृथकचेष्टा, देवं चैवात्र पंचमम्।।’’ हमारे पास एक शाश्वत सत्य अधिष्ठान है जिस सत्य के आधार पर अपना संघ कार्य चलता है वो हिन्दुस्थान ‘हिन्दू-राष्ट्र’ है। सम्पूर्ण सृष्टि के विविध प्रकार के सारे अस्तित्व में समग्र एकात्म एक ही तत्व है जिसके ये सारे रूप हैं और इसलिए विविधताओं को लेकर किसी प्रकार का झगड़ा नहीं होना चाहिए, मिलजुल कर, अपनी-अपनी विविधताओं को मान्यता देकर सबको प्रगति के मार्ग में आगे बढऩा चाहिए। सबको सबके प्रति कृतज्ञता रखनी चाहिए और जीवन में उस एक तत्व का साक्षात्कार कराने के लिए भोगों को त्यागकर त्यागपूर्ण और संयमित जीवन जीना चाहिए और यही मानवता है। इसी को बंधुभाव भी कह सकते हैं।

इस विचार का प्रथम साक्षात्कार और इस विचार का प्रत्यक्ष जीवन में अभिव्यक्तिरूप विकास संयोग से हमारे देश में हुआ, समुद्रवेष्ठित, हिमालय के किरीट से मण्डित हमारी मातृभूमि के अंदर हुआ। इसी मानवता को, इसी वैश्विक सत्य को, इसी बन्धुभाव को दुनिया कहती है-‘हिन्दुत्व’। यह हमारी पहचान है ओर हमारे जीवन की प्रेरणा है इसलिए हमारे पुरूषार्थ का उत्स है। हमारी सब प्रकार की प्रगति का वह कारक है और हमारे विविध प्रकारों को जोडऩे का वह एकमात्र सूत्र है। दुनिया में सृष्टि, मानवता और व्यक्ति आदि-आदि सब को संतुलित ढंग से जोड़ कर उन सब का जीवन प्रगति की ओर बढ़ाने वाला वह एकमात्र तत्व है। संयोग से वही हमारी पहचान है और इसीलिए हिन्दुस्थान हिन्दूराष्ट्र है। ये सत्य बात है इसको कोई नकार नहीं सकता और नकारने का कोई उपयोग भी नहीं क्योंकि बार-बार आप नकारें तो भी सत्य कभी न कभी सर पर चढ़ के बोलता है। भले ही 1925 में लोग कहते होंगे कि मुझे गधा कहो लेकिन हिन्दू मत कहो, लेकिन आज ऐसा नहीं है। आज हिन्दुत्व का सत्य सबके सिर चढ़ कर बोल रहा है।

उसी सत्य को लेकर हम चल रहे हैं। उसी सत्य के अनुरूप अपने जीवन को तैयार करने वाली कार्यपद्धति हमारे पास है। 83 वर्षों के प्रयोगों के बाद वह सिद्ध कार्यपद्धति बन गई है। उस कार्यपद्धति की यशस्विता के लिए आवश्यक विविध प्रकार की चेष्टाएं हमारे स्वयंसेवक कर रहे हैं। आज अपने समाज-जीवन का कोई ऐसा क्षेत्र नहीं है कि जहां अपना स्वयं सेवक काम नहीं कर रहा है और अच्छा काम कर रहा है, सर्वत्र उसके कर्तव्य का लोहा माना जाता है। आज संघ के पास यह सारा ठीक चलाने के लिए, अपने आपको सदैव कार्य के योग्य बनाने की दक्षता रखने वाले, अपने जीवन-कार्य का उदाहरण रखने वाले ऐसे देवदुर्लभ कार्यकर्ताओं का केवल संचय ही नहीं है, वह संचय लगातार बढ़ता चला जा रहा है।

‘हिन्दुत्व’ विजय का आधार
कार्यसिद्धि का पांचवा देवता भाग्य है जिसको कोई नहीं जानता और भाग्य को जानने की इच्छा भी नहीं करनी चाहिए, लेकिन कुछ लोग होते हैं जिनके शील की, तपस्या की अवस्था इतनी उन्नत होती है कि उस ऊंचाई पर आरूढ़ होकर जब वो देखते हैं तो उनको दूर दृष्टांत दिखाई देता है। हमारे द्वितीय सरसंघचालक पू. गुरूजी एवं हमारे आद्यसरसंघचालक पू. डा. जी ऐसे ही दूरदृष्टा थे। डा. जी ने कहा कि ये ईश्वरीय-कार्य है और पू. गुरू जी ने जाते-जाते हमको संदेश दिया ”विजय ही विजय है’’ तो भाग्य के हमारे साथ होने का संकेत हमें पहले ही मिला है और अब वह केवल संकेत नहीं रहा अनुभव भी मिल रहा है। दुनिया करवट बदल रही है, नियति का मन बदल रहा है। बंगलौर में रामकृष्ण मिशन के स्वामी हर्षानन्द लिखित ‘द एनसाइक्लोपीडिया ऑफ हिन्दुइज्म’ का विमोचन हुआ। उदघाटन करने आए थे-हमारे पूर्व राष्ट्रपति डॉ. अब्दुल कलाम। उनका वहां भाषण हुआ। रामकृष्ण मिशन से ‘जीवन-विकास’ पत्रिका निकलती है। मैं उसका नियमित पाठक हूं। उसमें उस भाषण का सारांश छपा था। उसमें डॉ. अब्दुल कलाम ने कहा है कि ”यहां इस पुस्तक के उदघाटन से पहले मैं मेरठ से आया हूं। मेरठ में एक संयुक्त हिन्दू परिवार में मैं रहा। लगभग 70 लोग उस परिवार के सदस्य एक साथ रहते थे। वहां बहुत आनंद बहुत शान्ति थी।

मैंने पूछा इसका रहस्य क्या है? तो उन्होंने बताया–”हिन्दुत्व की हमारे घर में चलती आई हुई परम्परा ही हमारे संस्कार हैं।’ कितना सुन्दर है यह हिन्दू धर्म। वो कहते हैं कि दुनिया के सब धर्मों का जिसमें समन्वय है ऐसा यह हिन्दू धर्म है। इसका आचरण अगर हम सब करने लगेंगे और दुनिया करने लगेगी तो दुनिया में कोई हिंसा नहीं रहेगी, कोई अशान्ति नहीं रहेगी।’’ ये डॉ. अब्दुल कलाम कहते हैं। उसी हिन्दुत्व के आधार पर आधुनिक जीवन खड़ा करने की आवश्यकता है यह बात अब दुनिया भी मान रही है।

(लेखक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक हैं)

 

मोहन राव भागवत

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