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एक रू. में मुक्ति

ठंडा पानी कहां से पीऊं? कभी 15 रू. में देसी ठर्रा या गरमागरम दूध आ जाता था आज 1 रू. में कोई चुल्लू भर पानी देने तक को राजी नहीं है।

एक नेता जी का कहना है कि दिल्ली की जामा मस्जिद के इलाके में जाकर कोई भी आदमी 5 रू. में अपना पेट भर सकता है। दूसरे नेता जी कहते हैं कि मुम्बई में 12 रू. में भर पेट खाना मिलता है। तीसरे नेता जी फरमाते हैं कि पेट का क्या वह तो 1 रू में भी भर सकता है और हो सकता है कि किसी का 100 रू. में भी न भरे। क्या कोई बता सकता है कि इसमें से किस नेता का बयान सही है?

मुझे लगता है कि तीसरे नेता का बयान सच्चाई के ज्यादा निकट है। पहले दो तो मजाक कर रहे हैं। तीसरा नेता भारत के यथार्थ को समझता है। जैसे किसी का मन अरबों-खरबों रू. की सम्पत्ति इकठ्ठी करने के बाद भी नहीं भरता और वह दिन रात भांय-भांय करता घूमता रहता है, जबकि दूसरा व्यक्ति कुछ न होने पर भी संतोष के साथ जीता है, उसी प्रकार किसी का मन होटलों में हजारों रू. का खाना खाकर भी नहीं भरता जबकि गरीब आदमी 1 रू. में जो कुछ भी सड़ा-गला, बासी-कुबासी मिलता है, उसे खाकर संतोष से किसी सड़क के किनारे पड़ा रहता है। पड़े-पड़े वह इस दोहे का मन ही मन जाप करता रहता है :

रूखा सूखा खाय कर ठंडा पानी पी।

देख पराई चूपड़ी मत ललचावै जी।।

वह जानता है कि भूख की समस्या हजारों साल से चली आ रही है, लेकिन भूखे लोग आसानी से मरते नहीं, बशर्ते वह दूसरे की चुपड़ी रोटी देखकर ललचाने न लगें। मगर अन्तर्विरोध यह है कि जिस समय इस दोहे की रचना की गई, उन दिनों समाज में ठंडा पानी सबको समान रूप से मिला करता था। नदियां कल-कल बहती थीं, तालाब और बावडिय़ां साफ जल से प्लावित रहते थे और घर-घर में कुएं हुआ करते थे। आज सब विलुप्त हो गए हैं। तो आदमी को ठंडा क्या, कैसा भी जल सुलभ नहीं हैं। इसलिए इस दोहे का जाप करता हुआ सड़क के किनारे किसी आवारा कुत्ते या पिल्ले को अपने पास लिटाए यह आदमी सोचता है कि भाई मेरे! ठंडा पानी कहां से पीऊं? कभी 15 रू. में देसी ठर्रा या गरमागरम दूध आ जाता था आज 1 रू. में कोई चुल्लू भर पानी देने तक को राजी नहीं है। यह तीसरा नेता बड़ा खुर्राट नेता है। यह अच्छी तरह से जानता है कि जिसके पास संतोष धन है वह बेचारा तो अपने हाथ पैर भी नहीं पटकता और खून का घूंट पीकर अपने कुत्ते के साथ चुपचाप सो जाता है, जबकी दूसरा आदमी पनीर टिक्का और साबुत मुर्गा खाकर भी भूखा रह जाता है और सैकड़ो क्या फाइव स्टार होटलों में हजारों रू. खर्च करके भी उसका पेट नहीं भरता। वह घर लौटकर फिर पैग लगाता है और भुने हुए काजू, नमकीन, पिस्ते वगैरह-वगैरह भकोसता है। यह पेट साला चीज ही ऐसी है। इसकी हकीकत यह तीसरा नेता ही सबसे अच्छी तरह जानता है जिसकी बात में लोगों के लिए नसीहत भी है कि ऐ लोगो! संतोष करना सीखो क्योंकि पेट का क्या है, यह तो 1 रू. में भी भर सकता है और 100 रू. में भी नहीं भर सकता। यह नेता भारतीय इतिहास और संस्कृति को भी जानता है। कुंभकर्ण टनों सामान खाकर भी तुष्टि नहीं पाता था, जबकि श्री राम भीलनी के सूखे और जूठे बेर खाकर ही संतुष्ट हो गए थे।

पहले के राजा महाराजा यह देखते थे कि उनके राज्य में कोई भूखा न सोए

जबकी आज के मंत्रियों के बारे में किसी शायर ने कहा है :

भूख से बेताब जनता के भरख्वाहों को देख

पेट भर-भर रोटियां खाते हैं लेते हैं डकार

यह तीसरा वाला नेता पहले वाले दोनों नेताओं की तरह 5 रू. और 12 रू. में भूखों और गरीबों का मजाक नहीं उड़ा रहा है, बल्कि संतोष धन का गुणगान करके आदमी के आत्मिक-आध्यात्मिक उत्कर्ष की बात कर रहा है।

इसे औरों की तरह वक्तव्य वीर मत कहिए बल्कि बिना हल्दी और बिना फिटकरी के चोखा रंग रचने वाला यह तीसरा नेता सचमुच एक पहुंचा हुआ नेता है जो गरीबों को कहीं न कहीं पहुंचाकर ही मानेगा। 1 रू. में आदमी संतोष भी कर ले और उसकी मुक्ति भी हो जाए, इससे अच्छा क्या है!

 

मधुसूदन आनंद

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