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दहशतगर्दी की तरफ न लौट जाए घाटी

आंतरिक सुरक्षा मामलों के विशेषज्ञ अजय साहनी का मानना है कि देश को यह राहत अफगानिस्तान में अमेरिकी फौज के कारण मिल पाई थी। क्योंकि आतंकी गुट वहां उलझे हुए थे। इंटेलीजेंस ब्यूरो का भी यही अनुमान है। इसलिए 2014 के बाद के हालात को लेकर सभी के मन में चिंता है। भारत ने अपनी इन चिंताओं का साझा भी किया है।

जम्मू-कश्मीर घाटी पिछले कुछ सालों से शांत थी। सीमापार से घुसपैठ या फिर लाल चौक पर आतंकी हमले की खबर दो-तीन साल से आनी बंद हो गई थी लेकिन देश की शीर्ष खुफिया और सुरक्षा एजेंसियों को इसका खतरा दिखाई देने लगा है। मेजर जनरल वीके सिंह(अव.) को भी घाटी के कुछ अशांत दिखने का खतरा साफ-साफ दिखाई दे रहा है। वीके सिंह ने देश की शीर्ष खुफिया एजेंसी रिसर्च एंड एनालिसिस विंग(रॉ) को अपनी सेवाएं दी हैं और हाल में प्रधानमंत्री की यात्रा से ठीक पहले घाटी में सेना के काफिले पर आतंकी हमले के बाद राज्य के हालात की जानकारी लेने जम्मू-कश्मंीर गए थे।

मनमोहन सिंह का दो टूक कहना है कि घाटी में दहशतगर्दी की संभावना अभी खत्म नहीं हुई है। इसलिए सरकार को राज्य में हालात काबू में करने के लिए सैन्य विशेषाधिकार अधिनियम को बनाए रखना होगा। इतना ही नहीं 2014 में अमेरिकी सैनिकों की अफगानिस्तान से वापसी के बाद घाटी में बड़ी चिंताएं पैदा हो सकती हैं। पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई के माध्यम से राज्य में सीमापार से होने वाली घुसपैठ बढऩे के पूरे आसार हैं। आतंकी हमले की संभावना बढ़ सकती है और सीमा पर सैनिकों की तैनाती बढ़ानी पड़ सकती है। यह चिंता इकलौते मेजर जनरल वीके सिंह की नहीं है। सेना के चेहरे पर भी इसे लेकर चिंता की रेखाएं हैं। भारत सरकार और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार सचिवालय लगातार इसके आकलन में जुटे हैं। इतना ही नहीं गृह मंत्रालय के भी माथे पर बल है। विदेश मंत्रालय के एक संयुक्त सचिव का साफ कहना है कि अफगानिस्तान से अमेरिकी फौज के वापस जाने के बाद जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद और दक्षिण एशिया में दहशतगर्दी बढऩे की प्रबल संभावना है। इसके बाबत अमेरिका के विदेश मंत्री जॉन कैरी, उपराष्ट्रपति जोए बिडेन के साथ भारत चर्चा कर चुका है। हम लगातार उन्हें अपनी चिंताओं से अवगत करा रहे हैं लेकिन इसके बाद भी हम हाथ पर हाथ रखकर नहीं बैठे हैं।

राज्य और केन्द्र सरकार के आंकड़ों के मुताबिक 2006 में जम्मू-कश्मीर में विस्फोट की करीब 215 घटना हुई थी। इनमें 1,116 लोग (599 आतंकी, 168 सुरक्षा बल के जवान, 349 आम नागरिक) मारे गए थे। तब साल भर में सेना के आंकड़ों के हिसाब से 100-125 घुसपैठ की घटनाएं जानकारी में आती थी। यह वह दौर था जब अफगानिस्तान में अमेरिकी फौज तालिबानियों से सत्ता लेकर और वहां राज-पाट का खाका तैयार करने में जुटी थी। पाकिस्तान के कबीलाई इलाकों और नार्थ-वेस्ट फ्रंटियर जोन में फैले आतंकियों पर कार्रवाई में लिप्त थी। इसी समय देश के भीतर सीमापार से ने केवल घुसपैठ कम होनी शुरू हुई बल्कि आतंकी घटनाओं में भी कमी आई।

2012 के राज्य और केन्द्र सरकार के आंकड़ों के अनुसार 24 विस्फोट की घटनाएं हुई, कुल 117 लोग मारे गए। इनमें 84 आतंकी, 17 सुरक्षा बलों के जवान और 16 आम नागरिक शामिल हैं। घुसपैठ की घटनाएं भी सिमट कर कुछ दर्जन में आ गई थी। यह समझने के लिए काफी है कि राज्य में न केवल आतंकवाद काबू में आया बल्कि राज्य के पयर्टन उद्योग, सामान्य जन-जीवन, निवेश, सैलानियों के घाटी में जाने की इच्छा को भी पंख लग गए। डल झील की रौनक लौट आई है। पिछले दो सालों में जम्मू-कश्मीर में रिकार्ड पर्यटक गए हैं। गुलमर्ग में प्रकृति के साथ आनंदित होने का सिलसिला शुरू हुआ है। यह फर्क साफ तौर पर देखा जा सकता है। जिस कश्मीर की घाटी में 2005-06 में सामान्य नागरिक कलेजे पर हाथ रखकर जाता था, अब वहां लोग बड़े चाव से छुट्टियां बिताने जा रहे हैं। इससे उत्साहित होकर राज्य के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला लगातार कश्मीर से फौज को कम करने तथा सैन्य विशेषाधिकार कानून को हटाने की मांग कर रहे हैं। उनकी ही पहल पर घाटी में शहरी क्षेत्रों से सेना को सीमा की तरफ लौटना पड़ा।

2013 का जिक्र करें तो संसद भवन पर हमले के आरोपी अफजल गुरू फांसी दिए जाने के बाद राज्य में प्रतिक्रिया में कुछ छिटपुट घटना हुई और दूसरी बड़ी घटना पिछले महीने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के राज्य में दौरे से ठीक पहले हुई थी। जब आतंकियों ने सुरक्षा बल के वाहन पर हमला बोल दिया था। जुलाई साऊथ एशिया टेररिज्म पोर्टल (एसएटीपी) के अनुसार 28 जुलाई 2013 तक राज्य में विभिन्न घटनाओं में 87 लोग मारे गए हैं। इनमें 36 आतंकी, 37 सुरक्षा बलों के जवान और 14 आम नागरिक शामिल हैं।

घाटी ने 1989 में आतंकवाद की गरमी झेलनी शुरू की थी। 994-95 आते-आते राज्य में आतंकवाद नासूर बनने की तरफ बढ़ा और करगिल संघर्ष से पहले काफी बड़ी समस्या बन गया था। करगिल के बाद भी घाटी में आतंकवाद और घुसपैठ ने निबटना से जटिल बना हुआ था लेकिन 2006 के बाद से हालात में

तेजी से सुधार आना शुरू हुआ। इसकी आड़ लेकर देश की सुरक्षा एजेंसियों ने हर महीने छह-आठ आतंकी माडैूल को टारगेट करने का लक्ष्य रखा और बड़े पैमाने पर देश के भीतर मौजूद आतंकियों के स्लीपर सेल नष्ट हुए। बेंग्लुरू से लेकर केरल(खासकर कोच्चि), आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, कोलकाता, बिहार, म.प्र. उ.प्र., बिहार और नेपाल से लगते बिहार के तराई इलाकों तक में काफी बड़े सफाई अभियान को अंजाम दिया गया। इतना ही नेपाल और बांग्लादेश के साथ तालमेल बनाकर आतंकियों की रीढ़ तोडऩे के प्रयास हुए। इसका एक बड़ा कारण यह भी था कि अमेरिका आतंक के खिलाफ युद्ध को धार देने के अभियान में था। इसके चलते पाकिस्तान पर बड़ा दबाव था। अफगानिस्तान में अमेरिकी फौज की मौजूदगी, ओसामा बिन बिल लादेन के पाकिस्तान एबटाबाद में मिलना, मारा जाना आदि। इसके चलते पाकिस्तान को जहां भारत के सीमा पर संघर्ष विराम का पालन करना पड़ रहा था वहीं मुंबई मेंं 2008 को हुए आतंकी हमले के बाद दुनिया भर में आतंक को पनाह देने के मामले में पाकिस्तान की पोल खुल गई थी। इससे पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई को आतंकियों सह देना काफी मुश्किल भरा महसूस होने लगा। इतना जरूर हुआ कि 2006 से आतंकियों ने मेंढर, रामपुर, गुरेज जैसे काफी ऊंचाई और अति दुरूह समझे जाने वाले सेक्टरों की तरफ से घुसपैठ करना शुरू कर दिया। हंदवारा के जंगलों में मुठभेड़ होने लगी। उड़ी, राजौरी, पुंछ से लेकर मेंढर तक सेना को निगाह चौकस रखनी पड़ी।

भारतीय सुरक्षा विशेषज्ञ इसे घाटी में हालात सुधरने के की प्रक्रिया में मील के पत्थर के तौर पर देख रहे हैं लेकिन भविष्य को लेकर उनके माथे पर तनाव की रेखाएं पैदा होने लगी है। गृह मंत्रालय लगातार जम्मू-कश्मीर राज्य सरकार और सुरक्षा एजेंसियों के संपर्क में है। खुफिया एजेंसियां संभावित स्थिति का आकलन करके सरकार को चेता रही है। इसमें घाटी के अशांत होने की तरफ बढऩे की संभावना लगातार मौजूद है। इसके लिए समय रहते उपायों पर खासा जोर दिया जा रहा है।

आंतरिक सुरक्षा मामलों के विशेषज्ञ अजय साहनी का मानना है कि देश को यह राहत अफगानिस्तान में अमेरिकी फौज के कारण मिल पाई थी। क्योंकि आतंकी गुट वहां उलझे हुए थे। इंटेलीजेंस ब्यूरो का भी यही अनुमान है। इसलिए 2014 के बाद के हालात को लेकर सभी के मन में चिंता है। भारत ने अपनी इन चिंताओं का साझा भी किया है। पाकिस्तान के नए प्रधानमंत्री नवाज शरीफ से तालमेल बनाकर चलने की कोशिश भी हो रही है। इसी के साथ-साथ अफगानिस्तान में स्थिरता के प्रयासों के लिए काफी प्रयास किए जा रहे हैं। नई दिल्ली का हमेशा मानना है कि एक अस्थिर पड़ोसी हमेशा न केवल खुद के समस्या खड़ी करता है बल्कि आस-पड़ोस के देशों की सुरक्षा के लिए भी खतरा होता है। इसलिए पड़ोस में स्थिरता का लाभ पड़ोसी देश को भी मिलता है।

 

रंजना

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