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तेलंगाना पर सिकेंगी सियासी रोटियां

मैं इतिहासकार नहीं हूं, लेकिन देश के इतिहास में मेरी रूचि जरूर है। आजकल टीवी पर आ रहे शेखर कपूर के सीरियल ”प्रधानमंत्री’’ से मुझे आजादी के वक्त रहे देश के राजे-रजवाड़ों की संख्या का पता लगा कि उस वक्त देश में कुल 565 राजवाड़े थे और सरदार पटेल की अथक कोशिशों के बाद उन्हें भारत संघ में मिला कर एक देश बना दिया गया था।

सियासी पार्टियां अपने स्वार्थ के लिए जो करें, सो थोड़ा। एक बार फिर केन्द्र में सत्ता में आने के लिए कांग्रेस को एक-एक सीट इतनी महत्वपूर्ण लग रही है कि उसके लिए वह कोई कसर नहीं छोडऩा चाहती। तेलंगाना राज्य के गठन को हरी झंडी दे कर लगता है कांग्रेस और यूपीए को इससे कोई मतलब नहीं कि उसके सियासी दांव पेचों से पिंडारा बाक्स खुल जाएगा और छोटे राज्यों के गठन की मांग की कैसी बाढ़ आ सकती है। विकास के लिए 27राज्यों के गठन की मांगें पहले से ही इस पिंडारा बाक्स में रखी हैं। तेलंगाना के गठन के लिए हरी झंडी दिए जाने पर यूपीए की ही महत्वपूर्ण सहयोगी पार्टी नेशनल कांफ्रेंस और जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने कांग्रेस के इस कदम को नकारते हुए कहा है कि तेलंगाना के गठन को मंजूरी देने से देश के अन्य हिस्सों में भी ऐसी मांग को बढ़ावा मिलेगा। अलग राज्य के गठन की मांग के सामने हार मान लेना खतरनाक है।

मैं इतिहासकार नहीं हूं, लेकिन देश के इतिहास में मेरी रूचि जरूर है। आजकल टीवी पर आ रहे शेखर कपूर के सीरियल ”प्रधानमंत्री’’ से मुझे आजादी के वक्त रहे देश के राजे-रजवाड़ों की संख्या का पता लगा कि उस वक्त देश में कुल 565 राजवाड़े थे और सरदार पटेल की अथक कोशिशों के बाद उन्हें भारत संघ में मिला कर एक देश बना दिया गया था। लेकिन जिस प्रकार देश में पिछड़े इलाकों के विकास की ओर ध्यान देने की बजाया छोटे राज्यों के गठन की मांग जोर पकड़ रही है और संघर्ष चल रहे हैं, उससे लगता है कि देश आजादी के समय में मौजूद रजवाड़ों की संख्या के पास पहुंचने के लिए बेताब है। राजनीतिक दल भी सियासी दांव-पेचों में उन मांगों को अपना हथियार बनाने से नहीं चूक रही हैं। तेलंगाना के गठन की मांग के लिए कांग्रेस कभी उसके पक्ष में रही तो कभी उसे यह मांग निरर्थक ही लगी। अब आंध्र प्रदेश के 23 में से दस जिलों को काट कर देश के इस नए 29वें राज्य-तेलंगाना के गठन के लिए कांग्रेस और यूपीए ने हरी झंडी दे दी है। अब इस संबंध में केन्द्रीय गृहमंत्रालय प्रस्ताव तैयार कर कैबिनेट में भेजेगा और वहां से स्वीकृति मिलने के बाद इस संबंध में संसद में प्रस्ताव लाया जाएगा। आंध्र प्रदेश की विधानसभा की कुल 294सीटों में से 119 सीटें और लोकसभा की 42 में से 17 सीटें नए राज्य के पास चली जाएंगी।

तेलगांना के गठन से वहां के लोगों का कितना भला होगा या उसका असर पूरे देश में क्या होगा, इस पर बात करने से पहले यदि तेलगांना के गठन की मांग के इतिहास की यदि झलक देख ली जाए तो वह अप्रासंगिक नहीं होगा। असल में तेलंगाना का गठन किए जाने की मांग नई नहीं है। यह मांग लगभग 57साल पुरानी है। तेलंगाना का आंध्र में 1नवम्बर 1958 को विलय किया गया था लेकिन तेलंगाना के लोग इसके पक्ष में नहीं थे। उन्हें शान्त करने के लिए तेलंगाना को अनेक अधिकार देने के लिए दस साल एक समझौता किया गया। समझौता के अवधि समाप्त हुई तो तेलंगाना राज्य बनाए जाने की मांग फिर उभर आई। यहां तक कि टीआरएस के चन्द्रशेखर ने 2009 में इस मांग के लिए दस दिन का उपवास भी रखा था। बाद में केन्द्र सरकार ने श्रीकृष्ण कमेटी का इसके लिए गठन भी किया जिसके सुझाव सरकार के पास हैं। लेकिन सरकार ने सुझावों को ठंडे बस्ते में डाल दिया। लगभग छह दशक बाद जब कांग्रेस को आंध्र प्रदेश में अपनी जमीन खिसकती नजर आई तो उसने इसे स्थानीय लोगों की महत्वाकांक्षा बताते हुए प्रशासनिक और आर्थिक आवश्यकता बता कर इसे हरी झंडी दे दी है। तेलंगाना के गठन को हरी झंडी देना कांग्रेस के लिए चुनावी सियासत की मजबूरी का इसी से पता लग जाता है कि तेलंगाना के गठन का 2009 में तत्कालीन केन्द्रीय गृहमंत्री पी. चिदम्बरम् द्वारा ऑन रिकॉर्ड आश्वासन दिए जाने के बाद भी यूपीए सरकार ने तब तक कुछ नहीं किया जब तक कि चुनावों की धमक के बीच आंध्र प्रदेश में उसे दिन में ही तारे नजर नहीं आ गए। यहां यह बताना अप्रासंगिक नहीं होगा कि कांग्रेस ने 2004 में आंध्र प्रदेश से मिली लोकसभा की 29सीटों में 2009 में इजाफा कर उसे 33सीटों पर पहुंचा दिया। इसका काफी कुछ श्रेय वाईएस राजशेखर रेड्डी को जाता है। दिलचस्प तो यह है कि तेलंगाना के गठन की आवाज को 2002 में ऊंचा करने वाले वाईएस राजशेखर का बेटा आज संयुक्त आंध्र प्रदेश बनाए रखने के लिए संघर्ष कर रहा है। वैसे वो दीगर बात है कि पृथक तेलंगाना के गठन को राजनीतिक हवा देने वाले राजशेखर रेड्डी ने आंध्र प्रदेश में कांग्रेस को जमा कर तेलंगाना के गठन की आवाज के गुब्बारे में ही पिन चुभो दी थी। राजशेखर रेड्डी के जाने के बाद होना तो यह चाहिए था कि आंध्र प्रदेश में कांग्रेस की जड़ें मजबूत करने वाले राजशेखर रेड्डी के बेटे जगन को कांग्रेस में उचित सम्मान और स्थान मिलता। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। जगन को अपने बूते आगे बढऩे का यह स्वर्णिम मौका मिला। लेकिन आंध्र में कांग्रेस को अपनी जड़ें जमाए रखने के लिए अब केवल तेलंगाना राष्ट्र समिति (टीएसआर) से ही नहीं जगन की वाईएसआर कांग्रेस के प्रभाव से भी जूझना है। एनडीए को केन्द्र की सत्ता से दूर रखने के लिए एक-एक सीट गिन रही कांग्रेस को आंध्र में अपनी सियासी रोटियां सेंकने के लिए तेलंगाना के पृथक राज्य के गठन का तवा ही गरम दिखाई दे रहा था। इसलिए उसने केबिनेट के अपने पिछले फेरबदल के दौरान तटीय आंध्र प्रदेश से दो कांग्रेसी नेताओं-संभाशिव राव और जेडी सेलवम को शामिल कर इस संबंध में संकेत देने शुरू कर दिए थे। कांग्रेस ने तेलगांना के गठन के लिए कदम आगे बढ़ा कर बहुत बड़ा सियासी दांव खेला है और उसकी उम्मीद है कि तेलंगाना में शामिल होने वाली लोकसभा की 17सीटों में से बड़ा हिस्सा उसकी जेब में आ सकता है। इसके लिए आश्चर्य नहीं होगा कि जगन की वाईएसआर कांग्रेस और टीआरएस को कांग्रेस अपने पाले में करने के लिए हर वो दांव खेले जो इसके लिए जरूरी होगा।

अब यदि तेलंगाना के गठन के बाद वहां के विकास और स्थानीय लोगों की महत्वाकांक्षाओं, प्रशासनिक व्यवस्था आदि पर पडऩे वाली संभावनाओं पर गौर करें तो पहले वहां की वर्तमान स्थिति पर बात करनी आवश्यक है। तेलंगाना में आंध्र प्रदेश के सबसे पिछड़े दस जिले शामिल हैं जबकि तेलंगाना प्राकृतिक संपदाओं का भंडार माना जाता है। लेकिन तटीय आंध्र प्रदेश और रायल सीमा के मुकाबले तेलंगाना काफी पिछड़ा हुआ है जबकि यह प्राकृतिक संपदाओं के भंडारों से भरा पड़ा है। इस दृष्टि से देखा जाए तो तेलंगाना को पृथक राज्य बनाया जाना इस क्षेत्र के विकास के लिए भी जरूरी माना जा सकता है। लेकिन इसी तर्क पर पहले गठित हुए राज्यों की वर्तमान स्थिति को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। इसके लिए झारखंड एक ज्वलंत उदाहरण है। वहां भी खनिज और अन्य प्राकृतिक संपदाओं का भंडार है लेकिन अपने गठन के एक दशक बाद भी वहां के विकास के ग्राफ में कोई अन्तर नहीं आया है।

बड़े राज्यों को काट कर छोटा राज्य गठित करने का प्रस्ताव देश के लिए नया नहीं है। झारखंड, उत्तराखंड और छत्तीसगढ़ राज्य तो हाल ही में लगभग एक दशक पहले वाजपेयी सरकार के कार्यकाल में ही गठित हुए थे। उससे पहले हरियाणा और हिमाचल प्रदेश का गठन हुआ था। झारखंड और उत्तराखंड के उदाहरण पिछड़े हुए राज्यों में शामिल किए जा सकते हैं जबकि हरियाणा और हिमाचल प्रदेश के उदाहरण विकास में आगे बढ़ते राज्यों के हैं। तेलंगाना राज्य के गठन के बाद विदर्भ, गोरखालैंड, बुंदेलखंड आदि करीब 27 ऐसे इलाके हैं, जहां से अलग राज्य के गठन की मांग जोर पकड़ सकती है। उत्तर प्रदेश में तो पूर्व मुख्यमंत्री मायावती अपने शासनकाल में प्रदेश के चार टुकड़े करने का प्रस्ताव पहले ही पारित कर चुकी हैं।

तेलंगाना अपने गठन के बाद किस रास्ते जाएगा, यह तो समय बताएगा लेकिन इतना जरूर है कि चुनावी समर में तेलंगाना के गठन का श्रेय ले कर कांग्रेस अपनी सियासी रोटियां कितनी सेंक पाएगी, यह देखना भी कम दिलचस्प नहीं होगा।

 

श्रीकान्त शर्मा

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