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कहां गए सुरक्षाबलों के मानवाधिकार?

पिछले कुछ सालों में कश्मीर में आतंकी वारदातों में कमी का दावा केन्द्र सरकार लगातार करती रही है। लेकिन इस अवधि में केन्द्रीय अद्र्ध सैनिक बलों, खासतौर पर सीआरपीएफ के प्रति नफरत फैलाने का अभियान बड़े पैमाने पर चला है। खासतौर पर मानवाधिकारों की आड़ लेकर सुरक्षा बलों को कठघरे में खड़ा किया गया है। राज्य सरकार भी इस मुद्दे पर अलगाववादियों के साथ खड़ी दिखाई दी है।

केन्द्रीय अद्र्धसैनिक बलों के जम्मू और कश्मीर घाटी में तैनात जवान और अधिकारी लंबे समय से कश्मीर सरकार के निशाने पर हैं। खुद मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्लाह सशस्त्र सैन्य विशेषाधिकार कानून की आड़ में केन्द्रीय अद्र्ध सैनिकबलों के खिलाफ मुहिम चला रहे हैं। कश्मीरी अवाम का दिल जीतने की हर मुमकिन कोशिश कर रही वर्तमान केन्द्र सरकार भी राज्य सरकार की हां में हां मिलाती है। लेकिन आंतरिक सुरक्षा के हालात और सेना का कड़ा विरोध कोई फैसला करने से रोक रहे हैं।
पिछले कई सालों से सरकारों का यह दावा चल रहा है कि कश्मीर घाटी में हालात सुधर रहे हैं। राज्य सरकार खासतौर पर मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला लगातार हर मंच से यह मांग उठा रहे हैं कि कश्मीर घाटी में सुरक्षा बल कम करो और उसे दिए गए ‘विशेष अधिकार’ खत्म करो। मानवाधिकारों के हनन को लेकर पूरे देश और दुनिया में कश्मीर में तैनात अद्र्ध सैनिक बल तथाकथित मानवाधिकार संगठनों और स्वयंसेवी संस्थाओं के निशाने पर रहे हैं। पर आज तक दुनिया के किसी मानव अधिकारवादी संगठन ने यह नहीं कहा कि एक खास तरह की वर्दी पहनने वाले सुरक्षाकर्मी भी मानव हैं। सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) या केन्द्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) में शामिल होने से पहले वह भी देश के आम नागरिक ही थे। वास्तविकता यह है कि आज देश में मानव अधिकारों का स्वभाविक उल्लंघन अद्र्धसैनिक बलों के साथ ही हो रहा है।

जम्मू-कश्मीर की ही बात करें, तो इस समय वहां सेना और बीएसएफ के अलावा सीआरपीएफ के करीब 70 हजार जवान तैनात हैं। राज्य सरकार के प्रमुख व्यक्तियों, संस्थानों और स्थलों की सुरक्षा की जिम्मेदारी सीआरपीएफ पर है। इसके अलावा रोजमर्रा की कानून व्यस्था की ड्यूटी में स्थानीय पुलिस की मदद करना उसकी मुख्य जिम्मेदारी है।

करीब ढ़ाई दशक से अलगाववाद और आतंकवाद की चपेट में चल रहे जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद की सबसे ज्यादा कीमत स्थानीय कश्मीरी पंडितों ने चुकाई है। उसके बाद उन जवानों का नंबर आता है, जिन्होंने देश सेवा की भावना के साथ रोजगार पाने के लिए केन्द्रीय अद्र्ध सैनिक बलों में शामिल होने का फैसला किया। स्थानीय जनता भी आतंकवाद की सजा भुगत रही है। लेकिन एक हद तक वह खुद इन हालात के लिए जिम्मेदार है।

जहां तक अद्र्धसैनिक बलों की तैनाती का सवाल है देश के संघीय ढ़ांचे और संविधान के मुताबिक कानून व्यवस्था राज्यों का विषय है। लेकिन आंतरिक सुरक्षा एवं सांप्रदायिक हालात की स्थिति में केन्द्र सरकार राज्य सरकारों की मदद के लिए अद्र्धसैनिक बलों को राज्यों में तैनात करती है। यह तैनाती राज्य सरकारों की मांग पर ही की जाती है। लेकिन इसके एवज में केन्द्र सरकार राज्य सरकारों से रकम वसूलती है। एक नियम यह भी है कि जो राज्य सरकारें केन्द्रीय बल मांगती है, उनकी यह भी जिम्मेदारी होती है कि वे इन बलों के लिए मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराएं। उनके रहने की उचित व्यवस्था करें तथा अन्य आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध कराएं।

मौजूदा समय में जम्मू-कश्मीर के अलावा सभी नक्सल प्रभावित राज्यों और पूर्वोत्तर राज्यों में केन्द्रीय अद्र्ध सैनिक बल तैनात हैं। कानून व्यवस्था बनाए रखने में मदद के लिए राज्यों में तैनात किए गए केन्द्रीय अद्र्ध सैनिक बलों के जवानों की संख्या इस समय करीब ढ़ाई लाख से ज्यादा है। सबसे ज्यादा जवान जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद से लडऩे के लिए तथा नक्सल प्रभावित राज्यों में नक्सलवाद से निपटने के लिए लगाए गए हैं। आंतरिक सुरक्षा के मोर्चे पर मुख्य भूमिका सीआरपीएफ की होती है।

पिछले कुछ सालों में कश्मीर में आतंकी वारदातों में कमी का दावा केन्द्र सरकार लगातार करती रही है। लेकिन इस अवधि में केन्द्रीय अद्र्ध सैनिक बलों, खासतौर पर सीआरपीएफ के प्रति नफरत फैलाने का अभियान बड़े पैमाने पर चला है। खासतौर पर मानवाधिकारों की आड़ लेकर सुरक्षा बलों को कठघरे में खड़ा किया गया है। राज्य सरकार भी इस मुद्दे पर अलगाववादियों के साथ खड़ी दिखाई दी है।

आपको याद होगा कि तीन साल पहले कश्मीर घाटी में ‘पत्थरबाजी’ अभियान चला था। आतंकियों के इशारे पर कई महिनों तक चले इस अभियान में सैकड़ों की तादाद में सुरक्षाकर्मी घायल हुए थे। आधा दर्जन सुरक्षाकर्मियों की जानें गयी थी। जवाबी कार्रवाई में कुछ पत्थरबाज भी मारे गए थे। सैकड़ों लोगों को पुलिस ने गिरफ्तार भी किया था। इस दौरान काफी विवाद भी हुआ था। केन्द्र को हस्तक्षेप करना पड़ा था।

बाद में सरकार मानव अधिकार के नाम पर पत्थरबाजों के साथ खड़ी दिखाई दी। घायलों और मृतकों के परिजनों को केन्द्र सरकार की ओर से ‘उचित’ मुआवजा दिया गया और बाद में गिरफ्तार किए गए युवकों को भी आम माफी दे दी गयी।

कहीं भी किसी भी स्तर पर उन घायल सुरक्षाकर्मियों के बारे में कोई चर्चा नहीं हुई, जिनकी तादाद हजारों में पहुंच गयी थी। कई जवानों का अंग भंग भी हुआ। लेकिन न तो केन्द्र सरकार और न ही राज्य सरकार ने इन घायल जवानों और अरबों रुपये की सरकारी संपत्ति के नुकसान का मुद्दा उठाया।

ऐसे हालात में एक सवाल बेहद प्रासंगिक है – क्या वर्दी पहनने वाले व्यक्ति के कोई मानव अधिकार नहीं हैं? क्या उन्हें आत्मरक्षा का अधिकार नहीं है?

यहां यह बताना भी जरुरी है कि कश्मीर या अन्य राज्यों में तैनात अद्र्ध सैनिक बलों के रहने की। उचित एवं मानवीय व्यवस्था करना राज्य सरकारों की जिम्मेदारी है। लेकिन जमीनी स्थिति काफी खराब है। चार साल पहले कश्मीर दौरे के समय इस लेखक ने खुद सीआरपीएफ को नारकीय स्थिति में रहते हुए देखा था। आतंक के लिए कुख्यात कश्मीर के सोपोर शहर में

सीआरपीएफ के जवानों को ऐसी जगह पर रहने को कहा गया था, जहां जानवर भी नहीं रखे जा सकते थे।

कुछ जिला मुख्यालयों और बड़े कस्बों की छोड़ दें तो बाकी पूरे कश्मीर में आज भी सीआरपीएफ के जवान बेहद खराब हालात में रह रहे हैं। इस बात का अहसास खुद गृहमंत्रालय और सीआरपीएफ के आला अफसरों को है। एक वरिष्ठ सीआरपीएफ अधिकारी ने अपने मन की व्यथा उजागर भी की थी। उन्होंने साफ कहा था – ‘हम और हमारे जवान बेहद खराब हालात में काम कर रहे हैं। हमसे यह उम्मीद की जाती है कि हम कश्मीरी आवाम और उसके नेताओं की रक्षा करें। लेकिन हमें स्थानीय पुलिस के पीछे रहकर यह काम करना होता है।’ स्थानीय पुलिस पर खुद सरकार को विश्वास नहीं है। नेता और मंत्री चाहते हैं कि अद्र्ध सैनिक बल उनकी ओर उठने वाली हर आंख को फोड़ दें। हर आतंकी को मार दें। लेकिन जब उनकी खुद की रक्षा की बात आए तो उनकी बंदूक नीची रहे। वे स्थानीय लोगों की भीड़ में शामिल आतंकियों की गोलियों का शिकार तो बने पर खुद गोली न चलाएं। अगर खुद को बचाने के लिए किसी जवान ने गोली चला दी तो वह राज्य सरकार और स्थानीय पुलिस दोनों के निशाने पर आ जाता है। स्थानीय जनता, मीडिया और नेता सभी अद्र्ध सैनिक बलों के खिलाफ मुहिम चलाते हैं।

यही नहीं आतंकवादी अलगाववादियों और स्थानीय लोगों के साथ मिलकर सुरक्षा बलों के खिलाफ सुनियोजित झूठे अभियान चलाते हैं। दो साल पहले दो युवतियों की कथित हत्या में केन्द्रीय अद्र्धसैनिक बलों की भूमिका बताकर महीनों तक अभियान चला। बाद में जांच के बाद यह पता चला कि वो स्थानीय पुलिस की करतूत थी। ऐसे सैकड़ों उदाहरण मौजूद हैं।

पिछले दिनों तो राज्य सरकार ने एक ऐसा फरमान जारी किया जिसने अद्र्धसैनिक बलों में विद्रोह जैसै हालात बना दिए। कश्मीर पुलिस के पुलिस महानिदेशक ने एक आदेश जारी किया कि कानून व्यवस्था में पुलिस की मदद के लिए जाने वाले सीआरपीएफ के जवान घातक हथियार लेकर ड्यूटी पर नहीं जाएंगे। अगर 100 जवानों को ड्यूटी पर जाना है तो सिर्फ 10 के पास ही आधुनिक हथियार होंगे। इस आदेश का मकसद यह था कि सरकार के खिलाफ प्रदर्शन करने वाले लोगों को घातक चोट न पहुंचे। लेकिन यह नहीं सोचा गया कि भीड़ में शामिल आतंकियों से घातक हथियारों से सुरक्षाकर्मियों को कौन बचाएगा? हुआ भी यही। श्रीनगर में आतंकियों ने दिन दहाड़े सीआरपीएफ कर्मियों पर हमला कर दिया। क्रिकेट खिलाड़ी बनकर आए इन दो आतंकियों ने पांच जवानों को मार डाला। मारे गए जवानों के पास हथियार नहीं थे। हालांकि उनके साथियों ने आतंकियों को तो मार डाला, लेकिन वे अपने साथियों को नहीं बचा सके।

गत 25 जून को भी श्रीनगर में ऐसे ही आतंकियों ने सेना के जवानों पर हमला कर कई जवानों को मार दिया था। यह प्रधानमंत्री की यात्रा के ठीक एक दिन पहले हुआ था। उससे पहले श्रीनगर में ही सीमा सुरक्षा बल के काफिले पर हमला किया गया। वे हाथ में हथियार लिए बीच शहर में इसलिए मारे गए, क्योंकि वे जिन लोगों की सुरक्षा के लिए तैनात थे, वे ही अपने साथ आतंकियों को ला रहे थे। अगर वे गोली चला देते तो फिर ‘मानव अधिकार’ की बात आ जाती है।

पिछले कई साल से लगातार यह मांग उठ रही है कि कश्मीर के हालात ठीक हैं तथा वहां से सेना और अद्र्धसैनिक बलों को हटा लिया जाना चाहिए। केन्द्र सरकार ने तीन साल पहले एक गैर सरकारी पर्यवेक्षकों की टीम भी भेजी थी। इन सदस्यों ने भी अपनी रिपोर्ट में अद्र्धसैनिक बलों की भूमिका पर सवाल उठाए थे।

खुद मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला लगातार यह मुद्दा उठाते रहे हैं। वह हर स्तर पर सशस्त्र सैन्य बल विशेषाधिकार कानून को हटाने की बात कह रहे हैं। उमर अब्दुल्ला ने कहा था कि अभी भी कश्मीरी आवाम में बहुत गुस्सा है। वह अपने हक के लिए कुछ भी कर सकते हैं। यही नहीं, उन्होंने कई मौके पर ऐसे बयान दिए जो अद्र्धसैनिक बलों के खिलाफ थे।

ऐसे में सवाल यह है कि आखिर अद्र्धसैनिक बलों के जवान क्या करें। न तो वह पुलिस उनका साथ देती है, जिसकी मदद करने के लिए उन्हें तैनात किया जाता है, और न ही वह जनता उनके प्रति कोई सहानुभूति रखती है, जिसकी सुरक्षा के प्रति वे जवाबदेह बनाए जाते हैं।

कश्मीर में पिछले सालों में कई जवानों को ड्यूटी करते समय अपनी जान गंवानी पड़ी। स्थानीय लोगों की भीड़ में से भरे बाजार, दिन दहाड़े कोई आया और ड्यूटी पर तैनात जवान को मार कर चला गया। न यह पता चला चला किसने मारा, न ही किसी ने यह दावा किया उसने जवान को मारते देखा। उसकी जान इसलिए गयी, क्योंकि वह दूसरों के मानवाधिकारों की चिंता के चलते अपने प्रति उदासीन हुआ। क्या आप यह कल्पना कर सकते हैं कि जिनकी सुरक्षा करने के लिए उसे तैनात किया गया था, उन्होंने ही उसे मरवा दिया।

यह स्थिति अकेले जम्मू-कश्मीर में नहीं है। पूर्वोत्तर और नक्सल प्रभावित राज्यों में भी अद्र्धसैनिक बलों की हालत ऐसी ही है। सवाल यह है कि आखिर इस समस्या का समाधान क्या है। सुरक्षा बल ज्यादती करते हैं – यह एक आम आदमी कहता है। जब राज्य सरकार, आतंकी, जनता और जन संगठन मिलकर यह आरोप लगाएं तो यह आरोप बेहद गंभीर हो जाता है। इसी वजह से पूरे देश में अद्र्धसैनिक बल निशाने पर हैं।

लेकिन कभी भी, किसी भी स्तर पर सिक्के के दूसरे पहलू पर गंभीरता से विचार नहीं किया गया। भरे बाजार में ड्यूटी कर रहे किसी नौजवान सिपाही पर अचानक कोई पर्दानशीन महिला खौलता पानी या तेल फेंककर चली जाए या फिर महिला हथियार लेकर बाजार में पहुंचे और आतंकी उस हथियार से जवान को मारकर भीड़ में शामिल हो जाए। आम आदमी की सुरक्षा के लिए हाईवे की सुरक्षा में तैनात जवान को पीछे से कोई गोली मार जाए।

जवान भी मनुष्य हैं और उन्हें भी सम्मान के साथ जीने का अधिकार है, यह मानकर उन्हें रहने के लिए मूलभूत सुविधाएं मुहैया कराई जाएं। 10 से 12 घंटे खड़े रहकर ड्यूटी करने वाले और अपने परिवारों से महीनों अलग रहने वाले जवानों को मनोरंजन के बेहतर साधन उपलब्ध कराये। उनकी समय पर काउंसिलिंग हो। उन्हें यह अहसास कराया जाए कि उनका काम बेहद संवेदनशील है तथा वे एक बड़ी जिम्मेवारी निभा रहे हैं। वह व्यवस्था का एक अहम हिस्सा हैं। सरकार कहती है कि हर अद्र्धसैनिक बल में इस तरह की व्यवस्थाएं की गई हैं।

लेकिन वास्तविकता यह है कि ये सब मुख्यालयों तक ही सीमित है। जहां ये जवान तैनात हैं और जहां ये काम कर रहे हैं, वहां के हालात बिल्कुल विपरीत है। यही वजह है कि आए दिन जवानों द्वारा आत्महत्या या साथियों की हत्या की खबरें आती रहती हैं। जवानों द्वारा अपने अधिकारियों की हत्या के भी मामले सामने आते रहे हैं। इन हालात में सरकारों को इस बात की व्यवस्था करनी करनी होगी कि चारों ओर विपरीत हालात में भी जवान कैसे अपने मनोबल को कायम रखें। उन्हें मनोवैज्ञानिक रुप से ऐसे हालात के लिए प्रशिक्षित कराना होगा और उनके काम की समय सीमा तय करनी होगी। नकारात्मक माहौल के बीच काम करने का प्रशिक्षण भी जरुरी है।

क्योंकि आज के जवान न केवल पद की योग्यता से ज्यादा योग्यता रखते हैं, बल्कि उनका मानसिक स्तर भी काफी ऊंचा होता है। ऐसे में अमानवीय व्यवहार, हालात और घृणा का पात्र बनाया जाना उन पर विपरीत असर डालता है। परिणामस्वरुप उनके हथियार जान लेने पर उतर आते हैं।

 

अरूण रघुनाथ

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