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रामबन में लाशों पर राजनीति

कश्मीर घाटी में उमर की नैशनल कान्फे्रंस का मुकाबला मुफ्ती मोहम्मद सईद की पी डी पी से होने वाला है। शायद इसीलिये वे बन्दूक उठाने वाले नौजवानों के बड़े सवालों से अपने आप को जोड़ रहे हैं और उसमें पाकिस्तान को भी शामिल करना चाहते हैं। जम्मू कश्मीर में बड़े सवालों से जुडऩे की पहली शर्त यही है कि केन्द्रीय सुरक्षा बलों और सेना को खलनायक के तौर पर पेश किया जाये। वही उमर अब्दुल्ला कर रहे हैं।

जम्मू-कश्मीर के रामबन जिले के धर्म-गूल-संगलदान क्षेत्र में पिछले दिनों 17 जुलाई को सीमा सुरक्षा बल और स्थानीय लोगों का टकराव हुआ, जिसमें चार लोगों की मृत्यु हो गई और कुछ लोग घायल हुए। इस स्थानीय विवाद के आधार पर पूरी कश्मीर घाटी में कफ्र्यू लगाना पड़ा और अनेक स्थानों पर दंगा फसाद हुआ। अमरनाथ की यात्रा रोक देनी पड़ी और तीर्थ यात्रियों की बसों पर पथराव हुआ। सीमा सुरक्षा बल के जवानों पर आरोप था कि उन्होंने मुसलमानों के मजहबी ग्रन्थ कुरान शरीफ का अपमान किया है। अब धीरे धीरे इस पूरे कांड के पीछे का षड्यंत्र सामने आ रहा है, लेकिन षड्यंत्रकारी अब भी पर्दे के पीछे सुरक्षित हैं और सरकार की इच्छा भी उन्हें बेनक़ाब करने की नहीं लगती। पूरे कांड को समझने के लिए यहां के भूगोल को समझना होगा।

रामबन जिला का गूल-धर्म-संगलदान क्षेत्र रियासी जिले की सीमा से लगा हुआ है। यहां तक का क्षेत्र मोटे तौर पर हिन्दू बहुल क्षेत्र माना जाता है। बनिहाल से कटरा तक जो रेलवे लाईन बिछाई जा रही है, उसी में यह क्षेत्र पड़ता है। सीमा सुरक्षा बल की 76वीं बटालियन रामबन में तैनात है। बल का शिविर इस क्षेत्र के धर्म गांव में है। इस गांव में एक मस्जिद भी है, जिसके पास अच्छी-खासी जमीन है। इस क्षेत्र से रेलवे लाईन निकल रही है, इसलिए यहां की जमीन की कीमतें आसमान छूने लगी हैं। आसमान छूती कीमतों के कारण यह मस्जिद वानी और शान, दो समुदायों के बीच विवाद का कारण बन गई है। फिलहाल इस मस्जिद पर शान परिवार का नियंत्रण है। लेकिन इलाके का वानी परिवार भी इस पर नियंत्रण के लिए काफी अरसे से प्रयत्नशील है।

इस इलाके में वानियों के 30-35 परिवार हैं। लेकिन वानियों का एजाज अहमद पुलिस में नौकरी करता है और संयोग से इस समय संगलदान की चौकी पर ही एसएचओ है। वानी गूल के कांग्रेसी विधायक एजाज अहमद खान के समर्थक हैं, जो इस समय प्रदेश सरकार में राजस्व राज्य मंत्री हैं। इसलिए मस्जिद पर नियंत्रण को लेकर वानियों का पलड़ा भारी पड़ता जा रहा था। लेकिन शान परिवार को भी हल्का नहीं माना जा सकता। यह परिवार भी इलाके में रसूखदार माना जाता है। यह राजनैतिक परिवार है। लेकिन इस परिवार का संबंध नेशनल कॉन्फ्रेंस और मुफ्ती मोहम्मद सैयद की पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी से है। इस क्षेत्र में एनसी और पीडीपी में आपस में दल-बदल होता रहता है। मंजूर अहमद शान का भाई शमशान अहमद नेशनल कॉन्फ्रेंस का नेता है।

शान परिवार की शमशाद बानो ने कांग्रेस नेता एजाज अहमद खान के खिलाफ 2008 का चुनाव पीडीपी के टिकट पर लड़ा था और उसे 2937 मत मिले थे। शमशाद का भाई मंजूर अहमद शान इस क्षेत्र के प्रमुख सामाजिक-राजनैतिक रुप से अग्रणी लोगों में से था। वह अपने स्वभाव और व्यवहार के कारण इलाके में लोकप्रिय भी था। पढ़ा लिखा नौजवान था और राजकीय सेवा में सहायक प्रोफेसर था। ऐसी चर्चा थी कि यदि शान परिवार की ओर से वह आगामी चुनाव लड़ता है तो वर्तमान कांग्रेसी विधायक अहमद खान को कड़ी टक्कर दे सकता था। लेकिन वानियों की चिन्ता और थी। यदि मंजूर अहमद शान राजनीति में स्थापित हो जाता है तो वानियों के लिए भविष्य में मस्जिद पर नियंत्रण करना मुश्किल हो जाएगा।
जब शान और वानी परिवार मस्जिद पर नियंत्रण की योजना को लेकर अपनी-अपनी रणनीति बना रहे थे, तब आतंकवादी तत्व एक अलग योजना पर काम कर रहे थे। धर्म गांव से सीमा सुरक्षा बल का शिविर कैसे हटाया जाये? सीमा सुरक्षा बल की उपस्थिति से इलाके के हिन्दु आश्वस्त रहते हैं। यह तभी हो सकता है, यदि किसी बहाने सीमा सुरक्षा बल से किसी बात को लेकर स्थानीय लोगों की तकरार हो जाए। इसके लिये जुलाई महस से बेहतर समय और क्या हो सकता है? क्योंकि एक ओर रमजान का महीना होता है और दूसरी ओर अमरनाथ की यात्रा इसी रास्ते से गुजरती है। ऐसे समय में चिंगारी लगाना आसान है।

बुधवार की शाम को लगभग सात बजे डवाल के मुस्तफा का बेटा, मोहम्मद अब्दुल लतीफ धर्म गांव में सीमा सुरक्षा बल के शिविर के बाहर संदिग्ध अवस्था में घूम रहा था। लतीफ संगलदान गांव में एक छोटी मोटी दुकान चलाता था। लेकिन आजीविका के लिए रात्रि को धर्म गांव में काजी शबीर अहमद के मदरसे में रात्रि चौकीदार का काम भी करता है। सीमा सुरक्षा बल के सिपाहियों ने उससे पूछताछ की तो उसने गाली गलौज करना शुरु कर दिया। सीमा सुरक्षा बल का कहना है कि इसके बावजूद हमने उसे जाने दिया। लेकिन संभावना यही है कि सीमा सुरक्षा बलबल के जवानों ने उसकी पिटाई के बाद ही उसे जाने दिया होगा। उसके बाद के घटनाक्रम की पूरी पटकथा षड्यंत्रकारियों ने शायद पहले ही लिख रखी थी।

उसका पहला हिस्सा था कि लतीफ को अपने साथ दुव्र्यवहार की कथा को किस प्रकार सुनाना है। लतीफ के अनुसार वह मदरसे में अकेला था और नमाज अदा कर रहा था कि सीमा सुरक्षा बल के तीन-चार सिपाही मदरसे में दाखिल हुए और कहने लगे कि यहां आतंकवादी छिपे हए हैं, बताओ कहां हैं? लतीफ के कथानानुसार, उसके इस आरोप का खंडन करने के बाद सिपाही ग़ुस्से में आ गए और उन्होंने वहां रखे कुरान शरीफ को फाड़ दिया। उसके बाद उसकी पिटाई शुरु कर दी। लतीफ के चीखने चिल्लाने की आवाज सुन कर कुछ लोग आ गए और सीमा सुरक्षा बल के सिपाही वहां से चुपचाप चले गये।

लेकिन प्रश्न यह है कि शिविर के बाहर सीमा सुरक्षा बल के साथ तू-तू मैं-मैं की घटना को लतीफ मदरसे तक खींच कर क्यों ले आया? या फिर जिन लोगों ने पूरी कहानी में लतीफ को यह भूमिका दी , उन्होंने घटना तो सीमा सुरक्षा बल के शिविर के बाहर घटित करवाई और बाद में उस कथा को सुनाने के लिये मदरसा क्यों फिट कर दिया? शायद इसलिए कि यदि घटना को शिविर तक ही सीमित रखा जाता तो कुरान शरीफ को फाडऩे की घटना को जोडऩा सम्भव नहीं था। तब पूछा जा सकता था कि दुकान बन्द करके जब लतीफ मदरसे में रात को चौकीदार की ड्यूटी करने के लिए आ रहा था तो वह हाथ में क़ुरान शरीफ लेकर क्यों घूम रहा था? ऐसी स्थिति में सीमा सुरक्षा बल द्वारा कुरान शरीफ फाडऩे की घटना विश्वसनीय दिखाई नहीं देती। इसलिए घटनास्थल मदरसे में बदलना जरुरी हो गया होगा। यह ठीक है कि लतीफ की इस कहानी में भी बहुत कमजोर कडिय़ां हैं। यदि सीमा सुरक्षा बल को सूचना मिलती है कि किसी स्थान पर उग्रवादी छिपे हैं तो उनको पकडऩे के लिए बल के तीन-चार सिपाही जाकर दरवाजे नहीं खटखटाते।

आतंकवादी कोई बकरी का बच्चा नहीं है, जिसे पकडऩे के लिए बल के सिपाही रस्सी लेकर जाते हैं और उन्हें पकड़ कर ले आते हैं। इसके लिए सुरक्षा बल बाकायदा घेराबन्दी करते हैं। लेकिन लतीफ की मानें तो बल के सिपाही रस्सी लेकर ही आतंकवादियों को ढूंढ रहे थे। इस पर कोई विश्वास नहीं करेगा। यदि आतंकवादियों की तलाश की कहानी अविश्वसनीय है तो सीमा सुरक्षा बल के चार सिपाही मदरसे में क्या सिर्फ कुरान शरीफ फाडऩे के लिए गए? इस पर कोई विश्वास नहीं करेगा। यह कहानी, पटकथा लिखने वाले की दिमाग़ी हालत का संकेत देती है। परन्तु शायद षड्यंत्र रचने वाले जानते थे कि पटकथा लेखक को साहित्य में नाम नहीं कमाना है, बल्कि सीमा सुरक्षा बल के खिलाफ दंगा भड़काना है। उसके लिए क़ुरान शरीफ फाडऩे की कथा से असरदार कथा और कोई नहीं हो सकती थी। जैसा षड्यंत्रकारियों ने सोचा वैसा हुआ भी।

लतीफ ने इस पूरे मामले में अपनी भूमिका का एक हिस्सा निभा दिया था। अब दूसरे हिस्से की बारी थी। उसका ख़ुलासा भी लतीफ ख़ुद ही करता है। उसने मदरसे में जाकर सबसे पहले संगलदान के स्टेशन हाउस ऑफीसर एजाज अहमद वानी को फोन पर सूचित किया। लतीफ का ही कहना है कि उसने तुरन्त गांवों के लोगों को भी बुला लिया। इतना ही नहीं लतीफ के अनुसार उसने गांव की मस्जिद के इमाम को और क्षेत्र के प्रमुख लोगों को बुला लिया। मदरसे से बीएसएफ के शिविर की दूरी लगभग एक किलोमीटर है और बीच में एक नाला और पुल भी आता है।

लतीफ के प्रयासों से लगभग तीन-चार सौ लोगों की भीड़ मदरसे के बाहर एकत्रित हो गई। तहसीलदार बशीरुल्ल हसन भी वहां पहुंच गया। एसपी जावेद मट्टू अपने दफ्तर से निरन्तर तहसीलदार के सम्पर्क में रहा। जब मामला काफी गर्म हो गया, तब तहसीलदार ने एसपी की सलाह पर लोगों से कहा कि धर्म गांव से सीमा सुरक्षा बल का शिविर दूसरे दिन हटा लिया जाएगा और लोगों को वापिस भेज दिया। प्रश्न है कि प्रशासनिक तंत्र का सबसे छोटे स्तर का एक अदना सा अधिकारी तहसीलदार, आखिर सीमा सुरक्षा बल का शिविर हटा लेने की बात किसके कहने पर कर रहा था? लोग तो कुरान शरीफ के तथाकथित अपमान को लेकर सीमा सुरक्षा बल के तथाकथित उत्तरदायी अधिकारियों को दंडित करने की मांग कर रहे थे। सीमा सुरक्षा बल का शिविर हटाने का षडयंत्र तो आतंकवादियों का हो सकता था। लेकिन तहसीलदार ने सीमा सुरक्षा बल के शिविर को ही धर्म गांव से हटा लेने की बात कह कर एक प्रकार से प्रदर्शनकारियों को संकेत दे दिया कि दूसरे दिन वे शिविर हटाने की मांग करें। इस पूरी बातचीत के दौरान तहसीलदार, पुलिस अधीक्षक जावेद मट्टू के सम्पर्क में था।

उधर वानी समूह के लोग भी जानते थे कि कल के प्रदर्शन में शान परिवार के लोग भी जरुर हिस्सा लेंगे। क्योंकि राजनैतिक रुप से सरगर्म शान परिवार इस मौके पर विरोध प्रदर्शन की अवहेलना कर राजनैतिक आत्महत्या नहीं कर सकता था। और ठीक ऐसा ही हुआ।

दूसरे दिन सुबह छह बजे ही लोग एक बार फिर से घटनास्थल पर एकत्रित हो गए। तहसीलदार और एसपी के साथ वे सीमा सुरक्षा बल के शिविर स्थल पर पहुंचे। दोनों अधिकारी बातचीत करने के लिए अन्दर चले गए। लगभग दो हजार लोगों की भीड़ ने सीमा सुरक्षा बल के शिविर को घेरा रखा था। इतने कम समय में इतनी ज्यादा भीड़ किसी सक्रिय संगठन के बिना एकत्रित नहीं हो सकती। आखिर किन लोगों ने रातों-रात लोगों को धर्म गांव में लाने की व्यवस्था की? कांग्रेस नेता और राज्य का राजस्व राज्य मंत्री एजाज अहमद खान का करीबी और संगलदान का एस.एच.ओ वानी पूरी तरह तैयार था। भीड़ उत्तेजित हो रही थी।

उसने शिविर पर पथराव शुरु कर दिया। सीमा सुरक्षा बल का वहां हथियारों का जखीरा था। शान परिवार का प्रो. मंजूर अहमद शान लोगों को शान्त करने की कोशिश कर रहा था। मंजूर का आम लोगों पर प्रभाव था। वह इस क्षेत्र का भविष्य का नेता हो सकता था। उससे वानियों की सारी योजना चौपट हो जाती। उधर यदि मंजूर की कोशिशों से लोग शान्त हो जाते तो अहमद लतीफ को मोहरा बनाकर बुना गया उग्रवादियों का पूरा षड्यंत्र ही फेल हो जाता। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, ठीक उसी समय एसएचओ एजाज अहमद वानी ने प्वाइंट ब्लैंक रेंज से गोली चला कर शान परिवार के कुल दीपक मंजूर अहमद शान की हत्या कर दी। गोली चलने पर भीड़ ने यही समझा कि सीमा सुरक्षा बल ने गोली चलाई। लोगों ने शिविर पर आक्रमण कर दिया। शिविर के हथियारों पर जरुर षड्यंत्र करने वालों ने नजर रखी हुई होगी और वे इसी मौके की तलाश कर रहे होंगे। सुरक्षा बल ने भी लोगों को भगाने के लिए गोली चला दी, जिससे तीन लोग मारे गए। पुलिस अधीक्षक जावेद मट्टू का कहना है कि पुलिस ने गोली नहीं चलाई, बल्कि सीमा सुरक्षा बल के जवानों ने ही चलाई थी। यदि तर्क के लिए मान लिया जाए कि जावेद सच बोल रहे हैं तो इसका सीधा अर्थ है कि एसएचओ वानी ने मौके पर उपस्थित पुलिस अधीक्षक की अनुमति के बिना ही मंजूर अहमद शान पर गोली चला दी। लेकिन हो सकता है कि मट्टू को वानी के गोली चलाने का पता हो, लेकिन वे जानबूझकर सीमा सुरक्षा बल को बदनाम करने के लिए गलत बयानी कर रहे हों। मट्टू की ओर शक की सुई इसलिए भी जाती है, क्योंकि उनका अब तक का पुलिस रिकॉर्ड दागदार ही रहा है। इससे पहले वे 2009 में शोपियां बलात्कार और हत्या मामले में हत्या के सबूत मिटाने के आरोपों में जेल भी जा चुके हैं। उस समय भी केन्द्रीय पुलिस बलों को बदनाम करने के लिए इन पुलिस अधिकारियों पर असली हत्यारों को बचाने के आरोप लगे थे। रामबन में तैनाती से पहले वे 2012 में कारगिल में पुलिस अधीक्षक थे। इन्हीं के कार्यकाल में जंसकार घाटी में 26 बौद्धों को मतान्तरित करके उन्हें मुसलमान बनाया गया था, जिसके विरोध में वहां जनान्दोलन हुआ था। तब भी पुलिस पर आरोप लगा था कि वह दोषियों को पकडऩे की बजाय मुसलमानों की नाजायज मदद कर रही है। मट्टू को रामबन में पुलिस का चार्ज संभाले अभी कुछ दिन ही हुए हैं। लेकिन आते ही उन्होंने केन्द्रीय पुलिस बलों के खिलाफ जनाक्रोश भड़काने के लिए मीडिया तक में कहना शुरु कर दिया कि यदि मेरे साथी मुझे खींच न लेते, तो मैं भी सीमा सुरक्षा बल की गोली का शिकार हो जाता। इससे आम लोगों को शक हो रहा है कि मट्टू हत्या के आरोपी वानी को बचाने की कोशिश कर रहे हैं। इसका अर्थ हुआ कि एजाज अहमद वानी, शान परिवार के मंजूर अहमद को मारने के षड्यंत्र में भागीदार रहा होगा और मट्टू भी इसको जानते होंगे।

एसएचओ एजाज अहमद वानी और उसके साथियों ने सोचा होगा कि भीड़ पर जब गोली चलेगी तो सभी उसके लिए सीमा सुरक्षा बल को ही दोषी ठहराएंगे। शान परिवार भी अपने बेटे की मृत्यु के लिये सीमा सुरक्षा बल को दोषी मान लेगा। एक बार फिर घाटी में केन्द्रीय सुरक्षा बलों के खिलाफ लोगों को भड़काया जा सकेगा और यह सिद्ध किया जा सकेगा कि केन्द्रीय सुरक्षा बल कश्मीरी मुसलमानों की हत्या कर रहा है। षड्यंत्रकारी योजनानुसार घाटी में केन्द्रीय सुरक्षा बलों के खिलाफ जनभावनाओं को भड़काने में तो कामयाब रहे लेकिन शान परिवार अपने बेटे की हत्या में वानियों के षड्यंत्र को समझ गया था। मंजूर अहमद शान के चचेरे भाई और पीडीपी के नेता इम्तियाज हुसैन शान के अनुसार उसके भाई की हत्या वानी ने की है।

लेकिन इसके बावजूद यह मानना पड़ेगा कि आतंकी षड्यंत्रकारी अपने कुछ उद्देश्यों में कामयाब हो गए।

1. केन्द्र सरकार ने धर्म गांव से सीमा सुरक्षा बल का शिविर हटाने का निर्णय किया है।

2. रामबन के हिन्दू जिलाधिकारी श्याम मीणा को हटा दिया गया और उनकी जगह मोहम्मद हुसैन मलिक को जिलाधिकारी बना दिया गया।

3. आतंकवादी इस घटना की आड़ में घाटी में मुसलमानों को केन्द्रीय सुरक्षा बलों के खिलाफ भड़काने में कामयाब रहे। लेकिन इसको इस घटना से निरपेक्ष होकर भी देखा जा सकता है। क्योंकि फिलहाल घाटी में स्थिति यह है कि आतंकवादी जब चाहें, किसी भी बहाने एक दो दिन के लिए घाटी के गिने चुने हिस्सों में बंद करवा सकते हैं।

षड्यंत्रकारी अपनी योजना के दूसरे हिस्से में असफल हुये हैं यह तब और भी अच्छी तरह स्पष्ट हो गया जब रामबन के नये जिलाधीश मोहम्मद हुसैन मलिक ने शान्ति स्थापना के लिये क्षेत्र के लोगों की बैठक बुलाई तो वहां लोगों ने स्पष्ट कह दिया कि वे इस बात को मानने के लिये तैयार नहीं हैं कि सीमा सुरक्षा बल की गोलीबारी से मंजूर अहमद शान की मौत हुई। लोग पुलिस अधीक्षक की इस बात से भी सहमत नहीं थे कि पुलिस ने गोली नहीं चलाई। पुलिस अधीक्षक यह भी चिल्लाते रहे कि सीमा सुरक्षा बल ने अचानक गोली चलाई कि वे ख़ुद भी मरते मरते बचे। लेकिन लोग इन गप्पों पर विश्वास करने के लिये तैयार नहीं थे और स्पष्ट मांग कर रहे थे कि राज्य पुलिस ने पहले गोली चलाई और इसके लिये एस एच ओ एजाज अहमद वानी को गिरफ्तार किया जाये।

हिंदुओं के बाद अब शिया निशाने पर
जम्मू-कश्मीर राज्य की कश्मीर घाटी में मुस्लिम कट्टरपंथियों का पहला शिकार कश्मीरी हिन्दु हुए थे, जिन्हें अपना घरबार छोड़कर घाटी से कूच करना पड़ा था। पांच लाख के लगभग कश्मीरी हिन्दु अभी भी देश में इधर उधर भटक रहे हैं और उनके घाटी में वापिस जाने की परिस्थितियां निर्मित नहीं हो रहीं। मुस्लिम कट्टरपंथियों ने उनके सामने दो ही विकल्प रखे थे, या तो घाटी छोड़ दो या फिर इस्लाम स्वीकार कर लो। कट्टरपंथी कश्मीर घाटी में निजाम-ए-मुस्तफा स्थापित करना चाहते हैं और निजाम-ए-मुस्तफा की पहली शर्त ही यह है कि वहां किसी दूसरे सम्प्रदाय का व्यक्ति नहीं रह सकता। घाटी में निजाम-ए-मुस्तफा फाजिल होता देख कर कश्मीरी हिन्दुओं ने वहां से चले जाना ही श्रेयस्कर समझा, क्योंकि दूसरा विकल्प मौत ही था। दुर्भाग्य से सरकार भी शायद, ‘हिज्ब-ए-फकत हिज्बुल्लाह’ वालों के साथ हो गई थी।

लगता था मुसलमानों का यह अभियान घाटी से हिन्दुओं को निकाल कर समाप्त हो जाएगा। लेकिन अब घाटी का शिया समुदाय भी सुन्नी मुसलमानों के निशाने पर आ गया है। वैसे तो कश्मीर घाटी में सुन्नियों के मुकाबले शिया समुदाय अल्पमत में है, लेकिन अनेक स्थानों पर उनकी संख्या पर्याप्त है। घाटी का बडगाम जिला ऐसा ही है। श्रीनगर में भी शिया समुदाय की बस्तियां हैं। पिछले दिनों बडगाम में दो युवकों में किसी मामूली बात को लेकर आपस में कहा सुनी हो गई। दुर्भाग्य से इनमें से एक युवक शिया समुदाय का था। इसका खामियाजा अनेक गांवों के शिया समुदाय के लोगों को सामूहिक रुप से भुगतना पड़ा। जगह-जगह मुसलमानों ने शिया समुदाय के घरों और दुकानों पर हमले शुरु कर दिए। अनेकों लोग घायल हुए और करोड़ों की सम्पत्ति नष्ट हो गई। आज शिया समुदाय घाटी में खुद को असुरक्षित महसूस करने लगा है।

शिया समुदाय और सुन्नी मुसलमानों का यह झगड़ा आज का नहीं बल्कि बहुत पुराना है। इसकी शुरुआत 7वीं शताब्दी में हो गई थी, जब मुसलमानों ने कर्बला के स्थान पर इमाम हुसैन को उनके तमाम सम्बंधियों सहित, बेरहमी से हत्या कर दी थी। इतना ही नहीं दुधमुंहे बच्चों को भी नहीं बख्शा था। यह नरसंहार मोहर्रम महीने के 10वें दिन हुआ था। इमाम हुसैन हजरत मोहम्मद की बेटी फातिमा के सुपुत्र थे। उस लड़ाई में हुसैन की सहायता करते हुये मोहियाल ब्राह्मण भी कट्टर मुसलमानों के खिलाफ लड़े थे। ब्राह्मण सेनापति राहिब दत्त के सातों बेटे इस लडाई में शहीद हो गए थे। शिया समुदाय का भारत के प्रति लगाव तभी से बना हुआ है। मोहियाल ब्राह्मणों का उदगम पेशावर के आसपास माना जाता है। ब्राह्मणों में मोहियाल योद्धा माने जाते हैं। जम्मू-कश्मीर के पुंछ में आज भी मोहियाल ब्राह्मणों के घर हैं। इमाम हुसैन के पक्ष में लडऩे के कारण मोहियाल ब्राह्मणों को हुसैनी ब्राह्मण भी कहा जाता है। ईरान और इराक दोनों ही शिया बहुसंख्यक देश हैं। दरअसल ईरान पर भी मुसलमानों ने 7वीं शताब्दी में ही आक्रमण करके उसे ग़ुलाम बना लिया था और जल्दी ही उसे मतांतरित कर दिया। शारीरिक रुप से तो ईरानी पराजित हो गए, लेकिन मानसिक रुप से उन्होंने पराजय स्वीकार नहीं की। बाद में मुसलमानों द्वारा हुसैन का परिवार समेत वध कर देने की घटना के बाद, ईरानियों को अपने अपमान का बदला लेने का अवसर मिल गया और वे अरब मुसलमानों के खिलाफ शिया समुदाय के रुप में संगठित होने लगे। उन्होंने अपने इस्लाम पूर्व इतिहास को छोडऩे से इंकार कर दिया। उन्होंने नवरोज इत्यादि ईरानी उत्सव मनाने प्रारम्भ कर दिए और कुरुष महान के गीत गाने शुरु कर दिए। तब से शुरू हुआ ईरानियों और अरबों का युद्ध, अब भी किसी रुप में चलता ही रहता है और दुनिया भर में शिया समुदाय कट्टर सुन्नी मुसलमानों के ग़ुस्से का शिकार होता रहता है। शिया समुदाय इमाम हुसैन की शहादत के दिन को याद करते हुए, उस दिन सुन्नियों ने जो अत्याचार किए थे, उसकी निन्दा करते हैं तो मुसलमान समाज आज भी उत्तेजित हो जाता है। आम तौर पर इस दिन शिया समाज एक बार फिर सुन्नी मुसलमानों के हमले का शिकार होता है।

पाकिस्तान ने जब से अपने आप को इस्लामी गणतंत्र घोषित किया है , तभी से वहां का शिया समुदाय इस्लामी कट्टरपंथियों के निशाने पर है। शिया समाज के पूजा स्थलों पर आक्रमण वहां आम बात हो गई है। इन आक्रमणों में अब तक हजारों शिया मारे जा चुके हैं। जम्मू-कश्मीर का गिलगित और बल्तिस्तान तो है ही शिया बहुसंख्यक इलाका। वहां पिछले दो दशकों से पंजाब व खैबर पख्तूनखवा से मुसलमानों को लाकर बसाया जा रहा है, ताकि शिया समुदाय अल्पसंख्यक हो जाए। वहां शिया समुदाय के लोगों की हत्याओं का सिलसिला बदस्तूर जारी है। भारत सरकार ने अपने इन नागरिकों के साथ हो रहे अन्याय के बारे में पाकिस्तान से कभी विरोध प्रकट नहीं किया। अब कट्टरपंथी सुन्नी मुसलमानों ने यही खेल कश्मीर घाटी में भी शुरु कर दिया है। शिया समुदाय का दोष इतना ही है कि वह कश्मीर घाटी में पाकिस्तान द्वारा की जा रही भारत विरोधी गतिविधियों का समर्थक नहीं है। शिया समाज सदा से ही भारत समर्थक रहा है।

बडगाम में जो शिया समुदाय पर आक्रमण हुआ है, उसे इसी व्यापक पृष्ठभूमि में देखा जाना चाहिए। बेमिना गांव के ख़ुमैनी चौक पर हुआ झगड़ा, रातों रात गांव गांव में फैल गया और शिया इबादतगाह भी इसके शिकार हए। इससे पहले 2011 में भी एक लड़की की आपत्तिजनक तस्वीरें सेलफोन पर डाले जाने से बडगाम का शिया समुदाय, सुन्नी मुसलमानों के ग़ुस्से का शिकार हुआ था। दरअसल बडगाम में पिछले कुछ अरसे से हिज्बुल मुजाहिदीन, तबलीगी जमात और बहावी संगठनों का काम तेज़ी से बढ़ा है। इन संगठनों के प्रचार से मुसलमानों में कट्टरपंथ का विस्तार हुआ है। कश्मीर में इस्लाम के अरबीकरण की प्रक्रिया तेज हुई है। जिसके परिणामस्वरूप मुसलमानों में शिया समुदाय के प्रति ग़ुस्सा बढ़ा है। स्पष्ट है कि जिस तेजी से बडगाम के दर्जनों गांवों में शिया समुदाय पर हमले हुए, उसमें जरुर कट्टरपंथी मुसलमानों के संगठित गिरोहों का हाथ रहा होगा। कश्मीर के शिया समुदाय को पाकिस्तान का विरोध करने की जो सजा मिल रही है, वह निश्चय ही निंदनीय है। लेकिन सबसे ज्यादा ताज्जुब तो इस बात का है कि मानवाधिकारों की माला जपने वाले जो संगठन, बाटला हाउस कांड में शहजाद को उम्र कैद दिए जाने पर हलकान हो रहे हैं, वे बडगाम में फातिमा बीबी की हत्या पर मौन साध गए हैं। क्या केवल इसलिए की वह अल्पसंख्यक शिया समुदाय की थी? उस बेचारी का तो कोई दोष भी नहीं था। वह अपने घर का समान बचाने में लगी थी कि कट्टरपंथी मुसलमानों ने उस के सिर पर लोहे की छड़ें मार दी। अब दिग्विजय सिंह चुप क्यों हैं? क्या केवल इसलिये कि फातिमा की मौत पर मर्सिया पढऩे से मुसलमानों के वोट चले जाने का डर है?

राजस्व राज्य मंत्री के समर्थक शोर मचाते हुये वानी के समर्थन में बैठक का बहिष्कार करते हुये भी निकल गये, लेकिन तब भी रामबन के लोग पुलिस के षड्यंत्र को बेनकाब करते हुये वानी को गिरफ्तार करने की मांग करते रहे। लोगों कहना है कि पुलिस अधिकारी ऐआज अहमद वानी दरअसल लम्बे समय से मंजूर अहमद शान से बदला लेना चाहता था। उसने ठीक मौका देख कर उसे ठिकाने लगा दिया।

लेकिन एक और प्रश्न इस पूरे षड्यंत्र में अनुत्तरित है। इस पूरे कांड में प्रदेश में मिल कर सरकार चला रही नेशनल कांफ्रेंस और कांग्रेस की भूमिका क्या है? आतंकवादी संगठनों का हित प्रदेश के लोगों को केन्द्रीय सुरक्षा बलों के खिलाफ भड़काना है ताकि पाकिस्तान का हित सध सके। राज्य सरकार और केन्द्र सरकार ने इस पूरे कांड की जांच के अलग अलग आदेश दिये हैं। लेकिन उमर अब्दुल्ला ने न तो उस जाँच रपट के आने की चिन्ता की जो उन्होंने इस कांड की जाँच के लिये स्वयं स्थापित की थी और न ही उस जाँच की रपट आने की प्रतीक्षा की जो केन्द्रीय सरकार ने स्थापित की है। इन दोनों जाँच रपटों के आने से पहले ही उमर अब्दुल्ला ने आनन फ़ानन में अपने मंत्रिमंडल की बैठक बुला कर केन्द्रीय सुरक्षा बलों की निन्दा का कड़ा प्रस्ताव पारित किया।

उमर अब्दुल्ला ने कहा कि लगता है केन्द्र ने 2008 और 2010 की घटनाओं से भी कुछ नहीं सीखा। हम यह सहन नहीं करेंगे कि केन्द्रीय सुरक्षा बल निहत्थे प्रदर्शनकारियों पर गोलियां चलाए। लेकिन लगता है कि उमर ने 2008 और 2010 की घटनाओं से सबक सीख लिया है और पैसा लेकर सुरक्षा बलों पर पत्थर फेंकने वाले लगभग नौ सौ नौजवानों को राज्य पुलिस में ही भर्ती कर लिया है। बाकी उन्होंने सुधरे हुए आतंकवादियों और बिगडै़ल आतंकवादियों की पहचान की कला भी सीख ली है। इसलिए अब वे तथाकथित सुधरे आतंकवादियों को सरकारी खर्चे पर बसा रहे हैं। यह शायद पहला अवसर है जब किसी राज्य सरकार के मंत्रिमंडल ने केन्द्र के खिलाफ बाकायदा प्रस्ताव पारित किया हो। इस प्रस्ताव के पारित होने से उत्साहित होकर पाकिस्तान ने कश्मीर में केन्द्रीय बलों द्वारा संहार हो रहा है, ऐसे बयान जारी किए। उमर अब्दुल्ला अपने दादा के वक्त की परंपरा से इतना तो सीख ही लिया है कि जम्मू कश्मीर में सत्ता पर काबिज रहने के लिए, घाटी में बादल फटने के लिए भी केन्द्रीय सुरक्षा बलों और सेना को उत्तरदायी ठहराना है। इससे दोनों काम आसान हो जाते हैं। केन्द्र सरकार नेशनल कॉन्फ्रेंस से डरी रहती है और इधर राज्य में सत्ता बनी रहती है। नेशनल कॉन्फ्रेंस यही व्यवहार रामबन कांड के सिलसिले में कर रही है।

नेशनल कॉन्फ्रेंस का यह व्यवहार फिर भी समझा जा सकता है, क्योंकि कुछ दिन पहले ही जब प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जम्मू कश्मीर में आए थे, तब उमर अब्दुल्ला ने उनकी हाजिरी में ही स्पष्ट कर दिया था कि कश्मीर घाटी में नौजवान केन्द्र से कोई आर्थिक पैकेज पाने के लिए बन्दूक नहीं उठा रहे हैं, बल्कि उनके सवाल बड़े हैं। इन बड़े सवालों में उमर पाकिस्तान को भी शामिल करना चाहते हैं। आने वाले चुनावों में कश्मीर घाटी में उमर की नेशनल कॉन्फ्रेंस का मुकाबला मुफ्ती मोहम्मद सैयद की पीडीपी से होने वाला है। शायद इसीलिए वे बन्दूक उठाने वाले नौजवानों के बड़े सवालों से अपने आप को जोड़ रहे हैं और उसमें पाकिस्तान को भी शामिल करना चाह रहे हैं। जम्मू कश्मीर में बड़े सवालों से जुडऩे की पहली शर्त यही है कि केन्द्रीय सुरक्षा बलों और सेना को खलनायक के तौर पर पेश किया जाए। वही उमर अब्दुल्ला कर रहे हैं।

लेकिन सोनिया कांग्रेस का व्यवहार इस पूरे कांड में समझ से परे है। केन्द्रीय गृह मंत्री सुशील कुमार शिन्दे के बयानों से लगता है कि वे भी सीमा सुरक्षा बल को राज्य में खलनायक ही मानते हैं। जब रामबन के लोग गोली कांड के लिए राज्य पुलिस को उत्तरदायी मान कर, वानी की गिरफ्तारी की मांग कर इस पूरे षडयंत्र को असफल बनाने में लगे हैं, उस समय शिन्दे धर्म गांव से सीमा सुरक्षा बल का शिविर हटा कर, आतंकवादियों के षड्यंत्र को कामयाब कर रहे हैं। राज्य मंत्रिमंडल की हिस्सेदारी में कांग्रेस भी है और वही मंत्रिमंडल केन्द्रीय सुरक्षा बलों को खलनायक बताता हुआ प्रस्ताव पारित कर रहा है। कांग्रेस इतना तो जानती है कि ऐसे खेल, खेल कर नेशनल कॉन्फ्रेंस और पीडीपी तो वोट हासिल कर सकती हैं, लेकिन कांग्रेस के हाथ इससे कुछ लगने वाला नहीं है। अलबत्ता जम्मू में उसे नुकसान जरुर हो सकता है। फिर आखिर कांग्रेस राज्य में यह खतरनाक खेल किसके इशारे पर खेल रही है और उसका उद्देश्य क्या है? जब किसी दिन देश में आतंकवाद के रहस्यों की गहराई से जांच होगी, तो ऐसे अनेक रहस्य खुलेंगे। लेकिन फिलहाल रामबन कांड में पांच प्रश्नों की जांच करना जरुरी है।

1 कुरान शरीफ के अपमान के तथाकथित आरोप के नाम पर लोगों को भड़काने वाला मोहम्मद अब्दुल लतीफ कौन है और उसके पीछे किन लोगों का हाथ है?

2 लतीफ ने सीमा सुरक्षा बलों के जवानों से त-तू मैं-मैं करने से पहले और उसके तुरंत बाद किन-किन लोगों से सम्पर्क किया ?

3 वीरवार, 18 जुलाई को प्रात: चार बजे से लेकर सात बजे तक कौन लोग थे, जो इस पूरे क्षेत्र में भीड़ को लाने की व्यवस्था में जुटे थे?

4 पुलिस अधीक्षक जावेद मट्टू का इस कांड से कुछ दिन पहले ही कारगिल से रामबन में तबादला किसके कहने पर किया गया ?

5 संगलदान के स्टेशन हाउस ऑफीसर एजाज अहमद वानी ने बुधवार रात्रि 11 बजे से लेकर वीरवार सुबह 9 बजे तक किन-किन लोगों से बातचीत की?

रामबन कांड के षड्यंत्र की तह तक जाने के लिए इन प्रश्नों का उत्तर खोजना जरुरी है। लेकिन रामबन के लोगों को डर है कि सरकारी जांच इसी बात पर खत्म हो जाएगी कि सीमा सुरक्षा बल ने गोली क्यों चलाई। अलबत्ता लाशों पर राजनीति की रोटियां सेंकने का काम शुरु हो गया है और यह लंबे समय तक चलेगा।

 

डॉ. कुलदीप चन्द अग्निहोत्री

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