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सहज है मोतियाबिंद का इलाज

मोतियाबिंद आंखों की एक बीमारी है। इस बीमारी के कारण आंखों में मौजूद प्राकृतिक लैंस धुंधला हो जाता है और मोतियाबिंद से ग्रस्त व्यक्ति को दिखाई देने में कठिनाई होती है। उसे अस्पष्ट दिखाई देता है। मोतियाबिंद के पूरी तरह से पक जाने पर उस आंख से बिल्कुल भी दिखाई नहीं देता, जिस आंख में मोतियाबिंद की बीमारी होती है। यह बीमारी लगभग 50-60वर्ष की आयु में होती है।

प्रभावित व्यक्ति को धुंधला दिखने लगता है। उसे ऐसा लगता है जैसे वह धुंध में देख रहा हो। चश्मा लगाने से भी उसे साफ दिखाई नहीं देता। चश्मे का नम्बर भी जल्दी-जल्दी बदलता है। उसे रोश्नी के चारों ओर रंगीन किरणें दिखती है। जिस आंख में मोतियाबिंद उतर रहा हो, उस आंख से उसे एक वस्तु अनेक दिखाई देती है। जैसे उसे चांद चार-पांच दिखाई देते हैं।

ऑपरेशन कराने में रोगी जितना विलम्ब करता है, ऑपरेशन में उतनी ही दिक्कतें बढ़ जाती हैं। अत्याधिक सफेद मोतियाबिंद पकने से ग्रसित आंख में काला मोतिया भी आने की आशंका रहती है, जो दृष्टि के लिए बहुत हानिकारक होता है।

ऑपरेशन से पहले की सावधानियां: ऑपरेशन से पूर्व मधुमेह, उच्च रक्तचाप, किसी दवा से एलर्जी, दमा, हृदय रोग आदि का ध्यान रखना आवश्यक है। यदि इस प्रकार की बीमारी हो तो उसका ईलाज नियमित रूप से कराना चाहिए। इस बात का भी ध्यान रखना चाहिए कि जिस आंख का ऑपरेशन कराना है, उसके आसपास किसी प्रकार का इंफेक्शन नहीं होना चाहिए। थोड़ी सी भी लापरवाही घातक सिद्ध हो सकती है।

यह ध्यान रखना आवश्यक है कि मोतियाबिंद का उपचार केवल और केवल शल्य चिकित्सा है। ऑपरेशन से पूर्व अगर व्यक्ति का दृष्टिपटल यानी रेटिना ठीक है तो सफल शल्य चिकित्सा के उपरांत नेत्र ज्योति सामान्य हो जाती है। आधुनिक मशीनों ने आजकल शल्य चिकित्सा को बहुत आसान कर दिया है। पहले की तरह अब शल्य चिकित्सा के बाद टांके नहीं लगाए जाते। इतना ही नहीं, आपरेशन के बाद अस्पताल में भी दिन भर भर्ती रहना पड़ता है।

आजकल प्रमुख तौर पर ”फैकोइमलसीफिकेशन’’ तकनीक से शल्य चिकित्सा की जाती है। शल्य चिकित्सा के दूसरे दिन से ही व्यक्ति को साफ दिखने लगता है। वह 8-10 दिन में ही अपना रोजमर्रा का कार्य सावधानी से कर सकता है।

मोतियाबिंद का ऑपरेशन लेजर किरणों से भी किया जाता है। ऑपरेशन के वक्त कोशिश की जाती है कि मरीज को ऐसा लैंस लगाया जाए जिससे मरीज की दूर की दृष्टि अच्छी रहे। नजदीक की दृष्टि के लिए वह चश्मा लगा सकता है। लेकिन इस बात की आशंका भी होती है कि ऑपरेशन के बाद भी दिखाई कम देने लगे। इसका प्रमुख कारण कैप्सुलर बैग की पिछली सतह पर लैंस का रखा जाना है। इस कारण वह मोटी हो जाती है। इसका उपचार येग लेजर द्वारा सहजता से किया जाता है। इसके उपरात व्यक्ति को फिर से साफ दिखाई देने लगता है। इसके अतिरिक्त भी अन्य कारण हो सकते हैं जिससे ऑपरेशन के बाद व्यक्ति को कम दिखाई देने लगे। लेकिन वह सब सहजता से दवाइयों द्वारा ठीक हो जाता है।

 

डॉ. एन. एल. वैश्य

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