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पहले भी शिकार हुए हैं ईमानदार अधिकारी

भ्रष्टाचार के चलते उत्तर प्रदेश के आईएएस अफसरों में विभाजन रेखा करीब दो दशक पहले खिंच गई थी। खुद आईएएस अधिकारियों ने ही नब्बे के दशक में अपने उन साथियों की सूची तैयार की थी, जो उनकी नजर में महाभ्रष्ट थे। आईएएस अफसरों की ये मुहिम काफी चर्चित रही थी। बिना किसी का नाम लिए यदि सीधी भाषा में कहा जाए तो जो सूची बनी थी, वह सचमुच भ्रष्टाचार के पुरोधाओं की ही थी।

दुर्गा शक्ति नागपाल, यह नाम पिछले एक पखवाड़े से पूरे देश में छाया हुआ है। भला हो सभी तरह के मीडिया (प्रिंट, विजुअल और सोशल) का, जिसने दुर्गा शक्ति नागपाल को रानी लक्ष्मीबाई की श्रेणी में ला खड़ा किया है। मूलत: पंजाब कैडर की युवा आईएएस अधिकारी दुर्गा शक्ति नागपाल ने एक लंबे समय बाद उत्तर प्रदेश की नौकरशाही और राजनेताओं को इस बात का अहसास कराया कि कानून नाम की भी कोई ‘चीज’ इस देश में है। यह अलग बात है कि बदले में उन्हें निलंबित कर दिया गया। उनकी वजह से केन्द्र और उत्तर प्रदेश सरकार आमने-सामने हैं। नौकरशाही का एक वर्ग भी उनके साथ है। मीडिया उनकी वकालत कर रहा है और सोशल मीडिया ने तो उन्हें दुर्गा का ही अवतार निरुपित कर दिया है।

दुर्गा के निलंबन के इस मामले को छोड़ दें तो उत्तर प्रदेश में नौकरशाही देश के अन्य राज्यों से अलग रही है। देश के सबसे बड़े इस प्रदेश में आईएएस और आईपीएस अधिकारी खुलेआम खेमों में बंटे रहे हैं। वरिष्ठ अफसरों की राजनैतिक दलों से नजदीकी और खुलकर दल विशेष के साथ खड़े होने के हजारों उदाहरण उत्तर प्रदेश में मौजूद हैं।

हालांकि इस तरह के मामले देश के हर राज्य में देखने को मिल जाएंगे, लेकिन इसकी परंपरा उत्तर प्रदेश ने ही कायम की है। अफसरों को प्रताडि़त करने के मामले भी उत्तर प्रदेश में ज्यादा उठे हैं, जबकि इक्का-दुक्का घटनाएं हर राज्य में हुई हैं। उत्तर प्रदेश की बात करें, तो यहां नौकरशाही स्पष्ट तौर पर दो खेमों में बंटी है। एक वह खेमा है, जो खुद को ईमानदार बताता है और दूसरा वह है, जो इस खेमे की नजर में ‘महाभ्रष्ट’ है।

भ्रष्टाचार के चलते उत्तर प्रदेश के आईएएस अफसरों में विभाजन रेखा करीब दो दशक पहले खिंच गई थी। खुद आईएएस अधिकारियों ने ही नब्बे के दशक में अपने उन साथियों की सूची तैयार की थी, जो उनकी नजर में महाभ्रष्ट थे। आईएएस अफसरों की ये मुहिम काफी चर्चित रही थी। बिना किसी का नाम लिए यदि सीधी भाषा में कहा जाए, तो जो सूची बनी थी, वह सचमुच भ्रष्टाचार के पुरोधाओं की ही थी। इस सूची में शामिल ज्यादातर अफसर या तो विभिन्न जांच एजेंसियों के छापों का शिकार हुए और अदालतों के चक्कर काटते नजर आए या फिर उन्होंने किसी न किसी राजनीतिक दल का दामन थाम लिया।

दुर्गा का निलंबन असंवैधानिक: ओम प्रकाश गुप्ता
दुर्गाशक्ति नागपाल का निलंबन, अवैध एवं बदनियति से की गई कार्रवाई है। सर्वप्रथम, स्वाभाविक न्याय के सिद्धांत के तहत उन्हें एक अवसर दिया जाना चाहिए था, जो कि नहीं दिया गया। दूसरा, उन पर आरोप लगाया गया है कि उन्होंने मस्जिद की निर्माणाधीन दीवार गिरवा दी, जबकि स्थानीय मुसलमानों ने खुद कहा है कि वो दीवार गांव के लोगों ने गिराई है। अत: यह आरोप मूलत: गलत है कि मस्जिद की दीवार दुर्गा ने गिरवाई।

तीसरा, यह स्पष्ट है कि मस्जिद सरकारी जमीन पर बिना किसी अनुमति की बनाई जा रही थी। अत: उच्चतम न्यायालय के निर्देशानुसार इस दीवार को गिराना, किसी भी तरह गैर-कानूनी काम नहीं है। और, यदि दुर्गाशक्ति ने ही दीवार गिरवाई थी, तो यह उनका वैधानिक कार्य था। इसके लिए उन्हें निलंबित नहीं किया जा सकता।

(लेखक पूर्व राजदूत एवं 1971 बैच के आईएफएस अधिकारी रह चुके हैं।)

अगर प्रदेश का इतिहास देखें तो उत्तर प्रदेश में नौकरशाही के राजनीतिकरण की प्रक्रिया कांग्रेस के सत्ता से बाहर होने के बाद शुरू हुई। 1989 के अंत में जब मुलायम सिंह उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने, उसके बाद नौकरशाही में जातिवाद और गुटबाजी खुलकर उभरी।

मुलायम के पहले कार्यकाल में एक जाति और एक संप्रदाय के अफसरों को खासी तरजीह दी गयी। इसका परिणाम यह हुआ कि महत्व मिलने से उत्साहित इन अफसरों ने प्रशासनिक परंपराओं को ताक पर रखकर सत्तारूढ़ दल के साथ खुद को जोड़ा। कहा तो यह भी जाता है कि सरकार में शामिल मंत्रियों से ज्यादा दबदबा उन अफसरों का रहा, जो मुख्यमंत्री के कृपापात्र थे। हालांकि बाद में ये अफसर कानूनी चक्करों में फंसकर जेलों तक भी पहुंचे। लेकिन इनसे किसी ने कोई सबक नहीं लिया। इस तरह के अफसरों की सूची बहुत लंबी है।

बसपा सुप्रीमो मायावती ने इस परंपरा को और आगे बढ़ाया। उन्होंने भी एक वर्ग और एक संप्रदाय के अफसरों को तरजीह दी। दूसरे वर्ग के अफसरों को जमकर प्रताडि़त किया गया। वास्तविकता तो यह है कि मायावती की सरकार उनके विश्वस्त नौकरशाह ही चलाते थे। मंत्री तो सिर्फ नाम के ही थे। मायावती ने तो देश की मान्य प्रशासनिक परंपरा ही बदल डाली थी। उन्होंने तो एक गैर-आईएएस अधिकारी को अपना कैबिनेट सचिव तक बना दिया था। बाद में न्यायालय के आदेश के बाद उन्हें अपना फैसला बदलना पड़ा, लेकिन मायावती के सत्ता में रहने तक उस अफसर का दबदबा कायम रहा।

खुद को ‘सरकार’ का वफादार साबित करने के चक्कर में प्रदेश के आला अफसर मुख्यमंत्री के चरणों में झुकते और यहां तक कि उनके जूते भी साफ करते नजर आए।

दरअसल उत्तर प्रदेश में प्रशासनिक मानदंड और परंपराएं गए जमाने की बात हो गई हंै। अधिकारी या तो सत्तारूढ़ दल के सदस्य की तरह काम करते हैं, या फिर हर दो महीने पर एक तबादले के लिए तैयार रहते हैं। कई अफसरों को तो एक सप्ताह में तीन से चार बार स्थानांतरित करने के उदाहरण मौजूद हैं।

भयमुक्त वातावरण का निर्माण जरूरी: संजय भूसरेड्डी
नौकरशाहों से राजनेताओं के टकराव की कहानियां अकसर उठती रहती हैं। इस विषय पर ऑल इंडिया आईएएस एसोसिएशन के सचिव तथा मत्स्य एवं पशुपालन विभाग, भारत सरकार में संयुक्त सचिव संजय भूसरेड्डी से उदय इंडिया के वरिष्ठ संवाददाता नीलाभ कृष्ण की खास बातचीत के अंश :

दुर्गा शक्ति मामले में आपका क्या कहना है?
हम व्यवस्था में बदलाव की बात कर रहे है। हम संस्थागत प्रणाली में बदलाव क साथ साथ कायदे-कानून में व्भी बदलाव चाहते है। अफसरों को जनता के बीच कार्यक्रमों के निष्पादन के लिए एक भयमुक्त वातावरण का निर्माण भी जरुरी है, जिसके लिए हमें नियमो में आज के दौर के हिसाब से बदलाव करना होगा।

दुर्गा शक्ति के बचाव के लिए आप क्या कर रहे हैं?
गत एक अगस्त को हमारा एक प्रतिनिधिमंडल प्रशिक्षण एवं कार्मिक विभाग के राज्यमंत्री से मिला और उन्हें पूरी घटना की जानकारी उपलब्ध करवाई। अखिल भारतीय सेवा (अनुशासन एवं अपील) अधिनियम 1969 के भाग-2 के अनुसार सरकार किसी भी अधिकारी को निलंबित करने से पहले समुचित प्रक्रिया का पालन करेगी । हमारा बस इतना ही कहना है की इस मामले में भी स्समुचित प्रक्रिया का अनुपालन हो।

आजकल आईएएस अफसर कुछ ज्यादा ही राजनितिक शिकार हो रहे हैं, आपका क्या कहना है?
सारे रिकाड्र्स इसी तरफ इशारा करते है। पिछले 20 सालो में उत्तर प्रदेश में 104 अफसरों को निलंबित किया जा चूका है, जो की कैडर का 25 प्रतिशत है। हमने नागपाल और दुसरे निलंबनो का मामला इसलिए उठाया की, ऐसे कार्य दुसरे राज्यों के लिए गलत उदहारण पेश कर रहे थे।

इस परिस्थिति से कैसे बचाव करेंगे आप?
देखिये, अब तो ये मामला सक्षम प्राधिकारियों के सम्मुख है। मुझे बताया गया है कि मामला उच्च न्यायालय और उच्चतम न्यायालय के पास भी पहुंच गया है, तो हम उनके फैसले के आने का इंतजार करेंगे कानून क अनुसार भारतीय सरकार, सामने आये नए सबूतों के आधार पर, या फिर संबंधित अधिकारी द्वारा संशोधन अपील करने पर, हस्तकक्षेप कर सकती है। ऐसे मामलो में भारतीय सरकार का फैसला ही मान्य होता है। अब ऐसे फैसले आने में सरकारी व्यवस्था में थोड़ा समय लगता है, इसलिए थोड़ा इंतजार करना ही मुनासिब है।

दुर्गा शक्ति नागपाल नई हैं, और उत्तर प्रदेश की परंपराओं से वाकिफ नहीं हैं। इसलिए उन्होंने वह फैसला लिया, जो उनके निलंबन की वजह बना। दुर्गा ने शायद अपने उन साथियों को नहीं देखा, जो सार्वजनिक रूप से प्रदेश के मुख्यमंत्री के पिता और चाचाओं के पांव छूते हैं। न ही उन्हें यह समझ में आया कि उत्तर प्रदेश में इस समय एक कौम को ‘सुपर क्लास’ में रखा गया है।

वास्तविकता यह है कि एक धार्मिकस्थल की दीवार की आड़ में निलंबित की गई दुर्गा रेत के ढेर में दबी है। उन्होंने अवैध रेत के खनन पर रोक लगाने की कोशिश करके प्रदेश में सत्तारूढ़ दल के मुखिया के करीबी रेत माफिया के हितों पर चोट कर दी । यह व्यक्ति समय-समय पर अपनी निष्ठा और दल बदलता रहा है। अफसर और नेता उसकी जेब में रहे हैं। फिलहाल ‘लक्ष्मी’ उसकी सवारी है। अपनी इस कमाई से वह खुलकर ‘जकात’ (गरीबों को दिया जाने वाला दान) निकालता है। इसी जकात ने युवा दुर्गा को ग्रेटर नोएडा से हटाने के बजाय निलंबित कराया है।

सूत्रों की मानें तो रेत माफिया यह संदेश देना चाहता था कि करोड़ों के उसके दैनिक धंधे पर किसी की तिरछी नजर नहीं पडऩी चाहिए। अब जो अफसर आएगा, उन्हें उसकी धुन पर ही नाचना पड़ेगा। हिस्सा लो और मौज करो या फिर रोको और निलंबित हो – यही बताना चाहता था माफिया। उसने बता दिया और राज्य सरकार ने साबित कर दिया।

एक कड़वी बात यह है कि देश की प्रशासनिक व्यवस्था की रीढ़ मानी जाने वाली नौकरशाही ने अपनी रीढ़ की हड्डी निकाल कर रख दी है। केन्द्र हो या राज्य, कांग्रेस-भाजपा हो या सपा-बसपा, सभी दलों में यह परंपरा बन गयी है कि नौकरशाही को अपने इशारे पर नचाओ।

केन्द्र और राज्यों में प्रमुख पदों पर बैठे अफसरों की सूची यह साबित भी कर रही है। किसी को ऊपर लाने के लिए चार वरिष्ठ अफसर हटाए गए हैं और किसी के लिए रास्ता ही अलग बनाया गया है। यह परंपरा ही हो गयी है। दुर्गाशक्ति इसे समझ नहीं सकी। इस वजह से पहली पोस्टिंग में ही निलंबित हो गयीं। अब यह समय बताएगा कि क्या वह भी आने वाले दिनों में इसी धार में बहती नजर आएंगी।

 

अरूण रघुनाथ

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