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बाबा भैरवनाथ

किलकारी भैरव के नाम से प्रसिद्ध इस मंदिर में प्रसाद के रुप में शराब चढ़ाई जाती है। किलकारी भैरवनाथ मंदिर के 500 मीटर दूर भैरवनाथ का एक दूसरा मंदिर स्थित है, जिसे दूधिया भैरवनाथ के नाम से जाना जाता है। यहां भक्त अपनी मनोकामना की पूर्ति के लिए भैरवनाथ पर दूधाभिषेक कर, मनोकामना की प्राप्ति के लिए वरदान मांगते हैं। किसी जमाने में यमुना इस मंदिर के निकट से होकर गुजरा करती थी। उज्जैन को महाकाल की नगरी के तौर पर जाना जाता है। महाकाल भैरव का दूसरा नाम है। उज्जैन और वाराणसी के बाद बाबा भैरवनाथ का तीसरा प्राचीन मंदिर दिल्ली के पुराना किला के पास स्थित है। पुराना किले की चहरदीवारी से लगे इस मंदिर के बारे में मान्यता है कि इसकी स्थापना पांडवों ने की थी। किलकारी भैरव के नाम से प्रसिद्ध इस मंदिर में प्रसाद के रुप में शराब चढ़ाई जाती है। किलकारी भैरवनाथ मंदिर के 500 मीटर दूर भैरवनाथ का एक दूसरा मंदिर स्थित है, जिसे दूधिया भैरवनाथ के नाम से जाना जाता है। यहां भक्त अपनी मनोकामना की पूर्ति के लिए भैरवनाथ पर दूधाभिषेक कर, मनोकामना की प्राप्ति के लिए वरदान मांगते हैं। किसी जमाने में यमुना इस मंदिर के निकट से होकर गुजरा करती थी। लेकिन समय के बीतने के साथ ही यमुना का प्रवाह यहां से काफी दूर हो गया है।

भैरवनाथ को ग्राम देवता के रुप में पूजा जाता है। दूधिया भैरवनाथ मंदिर के महंत गोपीनाथ के अनुसार – ”कौरवों से अलग राज्य इंद्रप्रस्थ बसाने के बाद, पांडवों ने भैरवनाथ की स्थापना ग्राम देवता के रुप में की थी। मिट्टी की पिंडी से बने भैरवनाथ पर, श्रीकृष्ण के आदेशानुसार कुंती ने अपना दूध चढ़ाकर पांडवों की रक्षा के लिए आशीष मांगा था। तब से यह मंदिर दूधिया भैरवनाथ के रुप में विख्यात है। यह विश्व का पहला मंदिर है, जहां भैरवनाथ पर दूध का अभिषेक किया जाता है।’’ मान्यता के अनुसार, पुराना किला पांडवों द्वारा इंद्रप्रस्थ बसाने के बाद बनवाया गया राजमहल था, जहां दुर्योधन को पानी और फर्श में अंतर न कर, गिर जाने के कारण, द्रौपदी ने दुर्योधन को ‘अंधा का बेटा अंधा होता है’ कहा था।

महाभारत का युद्ध खत्म होने के बाद युधिष्ठिर ने सवा गज लंबी नीलम से बनी शिवलिंग की स्थापना कर यज्ञ कराया था। असुरों के प्रकोप के कारण यह यज्ञ पूरा नहीं हो पाता था। तब श्रीकृष्ण के आदेश पर भीम ने भैरवनाथ को हस्तिनापुर आने का आग्रह किया। भैरवनाथ ने भीम के कंधे पर बैठकर आने की शर्त रखी। भीम इसके लिए तैयार हो गए। हस्तिनापुर आने के दौरान रास्ते में भीम, भ्रम की स्थिति में भैरवनाथ को इंद्रप्रस्थ के पास अवस्थित कर दिए। बाद में भैरवनाथ ने अपना वचन याद दिलाते हुए कहा कि अब मैं यहां से कहीं अन्यत्र नहीं जा सकता। भीम ने भैरवनाथ से असुरों के तांडव की कहानी बताई। भैरवनाथ ने इसके लिए आश्वस्त कर भीम को हस्तिनापुर भेज दिया। असुरों के उत्पात के दौरान भीम ने भैरवनाथ को याद किया और भैरवनाथ ने भीषण गर्जना कर असुरों को खदेड़ दिया। भैरवनाथ से पास पहुंचकर असुर क्षमा-याचना करने लगे और मदिरा आदि का अभिषेक कर उन्हें प्रसन्न किया। तब से किलकारी भैरवनाथ पर मदिरा चढ़ाने का रिवाज चल पड़ा।तंत्रसाधना में भगवान शंकर के रुद्र के एक रुप का वर्णन भैरवनाथ के रुप में मिलता है। तंत्रालोक मे भैरव शब्द की व्युत्पत्ति, ‘बिभात धारयति पुष्णाति रचयतीति भैरव:’ के रुप में दी गई है। इसका अर्थ है, जो देव सृष्टि की रचना, पालन और संहार करने वाले हैं, वही भैरव हैं। शिवपुराण में भगवान शंकर के पूर्णता का उल्लेख भैरवनाथ रुप में किया गया है। ज्योतिषशास्त्र की ‘लाल पुस्तक’ के अनुसार भैरवनाथ की आराधना करने से शनि के प्रकोप का शमन होता है। गुरूग्रंथ साहिब में भी भगवान भैरवनाथ की महिमा का वर्णन है। उनके लिए गुरूग्रंथ साहिब में 31 राग हैं।
मंदिर में प्रवेश करते ही भक्तों की लंबी कतारें लगी रहती हैं। खासतौर पर रविवार का दिन भैरवनाथ के पूजन का सबसे उत्तम दिन माना जाता है। भक्त अपने हाथों में फूल, माला, धूप, अगरबत्ती लेकर भगवान भैरवनाथ से मनोकामना पूर्ति के लिए उनके दर्शन करने के लिए कतारबद्ध खड़े रहते हैं। वकार लंबे रास्ते पर चलते हुए मंदिर के बाह्य दरवाजे पर भैरवनाथ के कई रुपों को प्रसन्न करने के लिए तेल और कई अन्य सामग्रियों से विधिवत पूजन करते हैं। उसके बाद मुख्य मंदिर में प्रवेश करते हैं, जहां भैरवनाथ का विशाल मुखमुद्रा की मूर्ति स्थापित की गई है। यहां शराब अथवा अन्य प्रसादों को चढ़ाकर भक्त आगे की तरफ बढ़ जाते हैं। जहां भगवान शंकर, पार्वती और गणेश की मूर्ति सहित भगवान राम, सीता, हनुमान आदि की मूर्ति स्थित है।दूधिया भैरव के विशाल प्रांगण में प्रवेश करते ही एक विशाल शिवलिंग स्थापित है, जिसके चारों तरफ नंदी, गणेश, पार्वती और शंकर भगवान की प्रतिमाएं बनी हुई हैं। प्रवेशद्वार के दायीं तरफ भैरवनाथ की विशाल प्रतिमा बनी है। बगल में भगवान राम, सीता और हनुमान की मूर्ति स्थित है। यहां भक्तगण शिवलिंग के साथ अन्य देवताओं की प्रतिमूर्तियों पर दूधाभिषेक कर पूजा-अर्चना करते हैं।
मंदिर के बाहर निकलते ही भिखारी-भतों की लंबी कतारें लगी होती है, जो भैरवनाथ के प्रसाद को पाने के लिए लालायित रहते हैं। हालांकि इस मंदिर में शराब पीने पर प्रतिबंध है लेकिन भिखारियों के गिलासों में प्रसाद के रुप में शराब आसानी से देखी जा सकती है। सरकारी आदेश होने के बावजूद शराब के चढावे और भिखारियों में इसके वितरण पर किलकारी भैरवनाथ के महंत दीनानाथ ने इसे भक्तों की श्रद्धा का मामला बताया।कुछ ही दूरी पर स्थित दूधिया भैरवनाथ में भी भक्तों का तांता लगा करता है लेकिन किलकारी भैरव की अपेक्षा यहां भीड़ कम देखने को मिलती है। मंदिर में अथाह चढ़ावे के बावजूद भक्तों के लिए किसी तरह की सुविधा नहीं है। मंदिर प्रांगण से लेकर बाहर तक कचरों का अंबार लगा रहता है। लेकिन मंदिर प्रशासन ना ही किसी तरह की साफ-सफाई पर ध्यान देता है और न ही प्रशासन ने इसके लिए कोई व्यवस्था की है। नि:शुल्क जुता-चप्पल रखने के नाम पर भी मंदिर के बाहर लगे स्टॉल पर भक्तों से मनमानी रकम वसूली जाती है। इन तमाम असुविधाओं के बावजूद, भैरवनाथ का मंदिर अपने भक्तों की मनोकामना पूर्ण करने के लिए ख्यात है।

 

सुधीर गहलोत

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