ब्रेकिंग न्यूज़ 

ईश्वर के सर्वथा अधीन मानने पर लौकिक प्रयोजनों के लिए प्रयास भी संभव नहीं रहेंगे। जब खाना बनाते हो तब खाना खाने को मिलता है। स्वयं को सर्वथा अधीन मानो तो बैठे रहो कि जब भगवान को खाना खिलाना होगा, तब वह खाना पका देंगे। हम क्यों बनाएं? अत: लौकिक पुरूषार्थ भी व्यर्थ हो जाएगा। इसलिए यह अनुभव सिद्ध है कि हम कुछ करने में एक हद तक स्वतंत्र हैं। चाहकर कोशिश कर सकते हैं।

परमेश्वर व जीव के बीच संबंध के बारे में महाराजजी स्वामीश्री गोविन्दा नन्दजी के आशीर्वाद से प्राप्त पूज्य अनन्त श्री स्वामी महेशानन्द गिरी जी द्वारा 2003 में दिए एक प्रवचन के अनुसार कुछ लोगों ने मान लिया है कि मनुष्य एक यंत्र की तरह है, जो स्वयं कुछ नहीं करता। अत: पाप-पुण्य का सारा दोष परमेश्वर का है। जीव बेचारा क्या करे? ईश्वर जैसा करवाता है, वह वैसा कर देता है। ऐसे लोग कहते हैं मनुष्य तो कुछ नहीं कर सकता। बस, परमात्मा जैसा कराता है, मनुष्य वैसा ही करता है। किसी जीव का कोई दोष नहीं है, जैसी नियति होती है, वैसा होता है। अत: ईश्वर करूणाहीन भी है, क्योंकि लोगों से पाप करा कर तद्नुरूप फल देता है। और फल भोगना पड़ता है जीव को। यह अन्याय है। वह करूणाहीन भी है, क्योंकि अधिकतर लोगों को उसने दुखी बनाया है। परमेश्वर पर यह दोष आ जाता है। जीव से कर्म कराया ईश्वर ने।

इन शंकाओं का समाधान व्यासजी ने किया-

”कृतप्रयत्नापेक्षस्तु विहित प्रतिषिद्वावैथ्र्यादिभ्य:’’

भगवान वेदव्यास कहते हैं कि ईश्वर जोर-जबरदस्ती से कुछ नहीं कराता। जीव जो करने का प्रयास करता है, उसकी सामथ्र्य ईश्वर उसे दे देता है। यही उसका कराना है। जीव जब कर्म कर लेता है, तब तद्नुसार ईश्वर फल देता है। जो जिस कार्य को करने के लिए लिए तैयार हुआ, उसे तद्नुकूल परिस्थिति दे देता है। बस, परमेश्वर इतना ही करता है। यदि ऐसा नहीं मानते तो शास्त्रों में विधान क्यों किया कि आदमी को ऐसा करना चाहिए। पुरूष यह करे। यह न करे। स्त्री यह करे। यह न करे। शास्त्रों में करने और प्रतिषेध का विधान बताया गया है। नियम तभी किसी को बताया जा सकता है, जब वह उसे कर सके। जिस कार्य को मनुष्य नहीं कर सकता हो, तो उसे करने के लिए कहने का कोई मतलब नहीं है। इसलिए भगवान वेदव्यास जी ने निर्णय दिया कि जीव यंत्र की तरह सर्वदा पराधीन नहीं है। प्रयत्न जीव करता है। सामथ्र्य ईश्वर से पाता है। उसका फल ईश्वर देता है। चेष्टा जीव ने की। उसके अनुसार धर्म और अधर्म उसके अपने किए हुए हैं। उनकी अपेक्षा से, जिसने धर्म किया, उससे अच्छी प्रवृत्ति कराता है। जिसने अधर्म किया उससे बुरी प्रवृत्ति कराता है। इसलिए उक्त दोष प्राप्त नहीं होते हैं।

कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती

लहरों से डर कर नौका पार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती!!
नन्हीं चींटी जब दाना लेकर चलती है,
चढ़ती दीवारों पर सौ बार फिसलती है!!
मन का विश्वास रगों में साहस भरता है,
चढ़कर गिरना, गिरकर चढऩा, न अखरता है!!
आखिर उसकी मेहनत बेकार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती!!
डुबकियां सिंधु में गोताखोर लगाता है,
जा-जाकर खाली हाथ लौटकर आता है!!
मिलते नहीं सहज मोती गहरे पानी में,
बढ़ता दुगना उत्साह इसी हैरानी में!!
मुट्ठी उसकी खाली हर बार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती!!
असफलता एक चुनौती है, उसे स्वीकार करो,
क्या कमी रह गई, देखो और सुधार करो!!
जब तक न सफल हो, नींद चैन की त्यागो तुम,
संघर्ष का मैदान छोड़ कर, न भागो तुम!!
कुछ किए बिना ही जय-जयकार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

जीव के अपने किए हुए धर्माधर्म के प्रयत्न अलग-अलग हैं। जीव ने जैसा धर्माधर्म किया उसके लिए जो चेष्टा की, उसके कारण विषमता है, जो जीव के अपने कर्मों के कारण ही है। उसके अनुसार फल देने के कारण ईश्वर अलग-अलग फल देता हुआ दिखता है। किसी को अच्छा, तो किसी को बुरा। लेकिन उस भेद का कारण ईश्वर नहीं है कि उस पर वैषम्य का दोष मढ़ा जाए। यहां भाष्यकार स्वामी शंकराचार्यजी दृष्टांत देते हैं कि ”पर्जन्यवत’’ यानी बादल व सूर्य की तरह ईश्वर निमित्त मात्र है। जिस प्रकार पानी बरसता है। कोई छोटा पौधा पैदा होता है, तो कोई बड़ा पेड़ पैदा होता है। कोई गेहूं, तो कोई धान। कोई बबूल, तो कोई नीम और तो कोई आम का पेड़। बादल ने इन पर भिन्न पानी बरसाया हो, ऐसा नहीं है। बादल ने तो सब को एक जैसे जल से भिगोया है और सब पर एक जैसा ही बरसा है। पेड़-पौधों के गुणों की विषमता का कारण है उनके बीज। एक खेत में बबूल, मूंग, नीम, या आम बोया है तो बबूल के पेड़ में से कांटा निकलेगा। तो क्या यह मान कर चला जाए कि बादल ने बबूल के पेड़ को किसी प्रकार का खास पानी दिया है और सूर्य ने उसे अलग प्रकार का प्रकाश दिया है, जिससे उसमें कांटा निकल आया। दूसरी ओर मूंग, नीम या आम के पेड़ों को बादलों से भिन्न प्रकार का जल मिला और सूर्य से भिन्न प्रकार का प्रकाश मिला जिससे उनमें अलग-अलग प्रकार के फल निकले हैं।

ऐसा नहीं है। सभी प्रकार के पेड़-पौधों पर बादल एक जैसे बरसे और सूर्य ने सभी को एक ही प्रकार का प्रकाश दिया। फलों के गुणों की भिन्नता होने का कारण उनके बीज हैं, जिनसे वे पेड़-पौधे बने हैं। नीम का बीज है, तो नीम के पेड़ पर लगी निंबोली का स्वाद आम के पेड़ पर लगे फल के स्वाद से भिन्न होगा। बबूल के पेड़ से कांटे निकलेंगे।

दूसरी ओर यदि बादल बरसें ही नहीं, और सूर्य निकल कर अपनी किरणों के प्रकाश की चादर उस खेत पर डाले ही नहीं, तो न आम पैदा होगा, न बबूल और न नीम। इसलिए यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि बीज ने पेड़ बना दिया। क्योंकि यदि केवल बीज ही पेड़ बना सकता होता तो बिना बादल या प्रकाश के भी बीज से पेड़ बन सकता था। इसलिए बादल और सूर्य की कारणता तो निश्चित है, पर कौन-कौन से फल होंगे, यह बीजों पर निर्भर करेगा। यदि बरसात और सूर्य का प्रकाश न मिले तो वृक्ष, पुष्प, पौधे आदि की भिन्नता भी नहीं होगी। सारे ठूंठ के ठूंठ खड़े रहेंगे। इसी प्रकार जीव के द्वारा किए गए धर्माधर्म के प्रयासों के अनुसार ही ईश्वर शुभ-अशुभ फल देता है।

अत: ईश्वर कराता है, फल देता है। जीव करता है। इन बातों में कोई विरोधाभास नहीं है। ईश्वर-इच्छा के बगैर कोई पत्ता भी नहीं हिल सकता। इसमें कोई दो राय नहीं हो सकती। यह बिल्कुल सही है। जिस प्रकार से जल के बगैर कोई पौधा नहीं उग सकता। अपने किए अनुसार होता है। यह भी ठीक है। जैसे बीज के अनुसार पौधा पैदा होता है, विभिन्नता बीज के गुणों पर निर्भर करती है। उसी प्रकार जीव के कर्म पर ही जीव की भिन्नता निर्भर करती है।

भाष्यकार भगवान प्रश्न उठाते हैं कि यदि जीव का किया हुआ प्रयत्न है, तो फिर जीव को पराधीन कहना बनता नहीं है!

इसका जवाब भी वह स्वयं ही देते हैं-यह दोष नहीं है।

”परायत्रेपि हि कर्तृत्वे करोत्येव जीव:,

कुर्वन्तं हि तमीश्वर: कारयति।’’

ऐसे समझ लो अगर हमारी आंख नहीं हो तो हम न भगवान की मूर्ति के दर्शन कर सकते हैं और न ही अन्य कुछ अच्छी-बुरी कुछ भी वस्तु देख सकते हैं। कोई कहे कि आंख है, इसलिए हम गंदी चीजें देखते हैं। न भगवान ने हमें आंखें दी होतीं और न हम गंदी चीजें देखते। इसका अर्थ हुआ कि गंदी व गलत चीजों को देखने के कारण जो बुरे संस्कार पड़ते हैं, तो इन सबका कारण परमेश्वर है। यह तो मानने लायक बात नहीं है। परमेश्वर ने जो आंखें दी हैं, उनके बगैर हम कुछ नहीं देख सकते थे, न अच्छा और न बुरा। ईश्वर द्वारा दी गई आंखें अब हमारी हैं। उनसे हम जो देखना चाहें, देख सकते हैं। आंखों को हम किधर लगाते हैं और किसके लिए लगाते हैं, यह हमारे ऊपर निर्भर करता है। यद्यपि हमारे अर्थात् करने वाला जीव ही है, परमेश्वर नहीं।

”कुर्वन्तं हि तमीश्वर: कारयति’’

जीव जब अपने संस्कारों के द्वारा करता है, तब ईश्वर उसे सारी सहायता देकर करवा देता है। प्रयत्न हमने किया, आगे परमेश्वर उसके लिए सारा इंतजाम कर देते हैं। हमने अच्छा प्रयत्न किया या बुरा, यह निर्भर करता है कि हमने पूर्व में कैसे प्रयत्नों के संस्कार एकत्र किए हैं। पहले किए प्रयत्नों के संस्कार ही आगे प्रयत्न कराते हैं। संसार प्रवाह अनादि है। अत: हर प्रयत्न से पूर्व भी प्रयत्न था ही, उसके संस्कारानुसार अगला प्रयत्न हो जाता है। ऐसा नहीं है कि जीव किसी दिन पैदा हुआ और उसके बाद उसने कर्म करना शुरू किया। यदि ऐसा होता तब प्रश्न होता कि पहली बार जीव से परमेश्वर ने कैसे कर्म करवाया। किन्तु संसार अनादि है। जीव भी अनादि है। इसलिए हमेशा से ही कर्म करता रहा है। जैसा यह करता रहा है, वैसा ही परमेश्वर इसको हमेशा से फल देते आ रहे हैं।

ईश्वर के सर्वथा अधीन मानने पर लौकिक प्रयोजनों के लिए प्रयास भी संभव नहीं रहेंगे। जब खाना बनाते हो तब खाना खाने को मिलता है। स्वयं को सर्वथा अधीन मानो तो बैठे रहो कि जब भगवान को खाना खिलाना होगा, तब वह खाना पका देंगे। हम क्यों बनाएं? अत: लौकिक पुरूषार्थ भी व्यर्थ हो जाएगा। इसलिए यह अनुभव सिद्ध है कि हम कुछ करने में एक हद तक स्वतंत्र हैं। चाहकर कोशिश कर सकते हैं।

इसी प्रकार से कई चीजों में देश कारण होता है। किसी देश में कोई काम हो सकता है, किसी देश में नहीं। रेगिस्तान के बालू के टीलों में चावल पैदा करना चाहो तो कैसे हो सकता है? इसी प्रकार से पानी की बहुलता वाले स्थानों पर यदि हम बाजरा पैदा करना चाहें तो कहां से, कैसे कर सकते हैं। कोई कहे कि परमेश्वर स्वतन्त्र है, बिना पानी के चावल उगा देगा। पर ऐसा कहीं देखने में आता है क्या? इसी तरह से सूर्य का उगना व छिपना। बीमारी के लिए दवाई खाते हैं, तो बीमारी जाती है। नहीं खाते हैं, तो बीमारी नहीं जाती है। इसलिए देश, काल और लौकिक निमित्त भी अपेक्षित है। उनके अनुसार ही ईश्वर कार्य करता है। यदि ऐसा मानेंगे तो लौकिक व्यवहार असम्भव हो जाएगा।

इस प्रकार भगवान वेदव्यास ने बता दिया कि मनुष्य खुद अपने पहले किए अनुसार प्रवृत्ति करता है, भगवान उसे सामथ्र्य देता है। जब वह कर्म कर लेता है, तब उसके किए हुए कर्मों के अनुसार कर्मफल देता है। परमेश्वर के दिए साधनों के बिना तो जीव कुछ कर नहीं सकता। यह बात बिल्कुल ठीक है। लेकिन मनुष्य साधनों का प्रयोग कहां करता है, इसकी तरफ हमेशा

ध्यान रखना चाहिए अन्यथा सारी गड़बड़ी हो जाएगी।

यदि हम यह मान लेते हैं कि अपने प्रयत्न से आदमी नहीं करता तो हमेशा किसी न किसी दूसरे आदमी या चीज पर दोष डालने की प्रवृत्ति रूक नहीं सकती। लोग कहते हैं कि हमारे यहां झीलें, नदियां और शहरों में इतनी गंदगी हो गई है, परन्तु सरकार कुछ नहीं करती। सवाल यह है कि सरकार कुछ नहीं कर रही है, पर जो सरकार पर दोष मढऩे वाले हैं, वे लोग झीलों, नदियों व घरों के आसपास कचरा डाल कर वहां गंदगी फैलाते क्यों हैं? सवाल यह करना चाहिए कि कारणता मेरे में कहां है? मैं अपना प्रयत्न कर जिस चीज को ठीक कर सकता हूं, उसे ठीक करूं। दूसरा क्या करेगा, इसका विचार करने से काम नहीं चलेगा। ठीक इसी प्रकार अपने कल्याण के लिए खुद प्रयत्न करना चाहिए। कई बार कोई व्यक्ति महीनों से सत्संग में नहीं जाता। तब महाराज श्री पूछते हैं–”बहुत दिनों आए क्यों नहीं?’’ वह जवाब देता है–”महाराज, आपने डोर ही नहीं खींची।’’ थोड़ी देर बाद कहता है–”मैं जा रहा हूं।’’ महाराज श्री कहते हैं–”हम थोड़े ही डोर पकड़े बैठे हैं।’’ दो-चार मिनट बैठने के बाद फिर कहता है–”महाराज जी, अब जाएं?’’ महाराज श्री कहते हैं–”हम डोरी पकड़े बैठे हैं। इसलिए आप नहीं जा सकते।’’ तब वह बोलता है–”महाराज जी, देर हो गई है। अब तो जाना ही पड़ेगा।’’

इसी प्रकार तीर्थों पर जाने के लिए कहता रहता है कि चि_ी नहीं आई। ऐसे ही परमेश्वर के मार्ग में हर आदमी दुनिया भर के कारण बता देता है कि इस-इस कारण भजन नहीं कर पाया। यदि जीव एक बार समझ ले कि करना मेरे हाथ में है तो वह निश्चित रूप से अपने मार्ग को तय करने में सफल हो जाएगा। नारायण!!!नारायण!!!नारायण!!!

гугл индексация сайтаполигон ооо

Leave a Reply

Your email address will not be published.