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ऐसे बनी देविका रानी और अशोक कुमार की जोड़ी

सन् 1940 में हिमांशु राय की मृत्यु के बाद देविका रानी ने बॉम्बे टॉकीज की कमान अपने हाथों में ले ली और पांच साल बाद सन् 1945 में बॉम्बे टॉकीज से अलग भी हो गई। इन पांच सालों में उन्होंने कई सफल फिल्मों का निर्माण किया। इनमें कुछ हैं: पुनर्मिलन, बंधन, कंगन, झूला, वसंत और किस्मत।

हिमांशु राय की देखरेख में मलाड में बॉम्बे टॉकीज का स्टूडियो आधुनिकतम साजो-सामान से सज्जित था। बैल एंड हावेल कंपनी के कैमरे, आर.सी.ए.ध्वनि प्रणाली और श्रेष्ठ तकनीशियन। निर्देशक फ्रांज ऑस्टन और विदेशी तकनीशियनों के साथ यह करार था कि पांच वर्षों में वे यहां के लोगों को प्रशिक्षित कर देंगे।

जर्मनी में नाजी प्रभुत्व के बाद वहां की स्थितियां इन तकनीशियनों के अनुकूल नहीं रह गई थीं। भारत में इन्हें न सिर्फ काम मिल रहा था बल्कि अगले पांच साल तक काम मिलते रहने की आश्वस्ति भी थी।

भारत में बॉम्बे टॉकीज की पहली फिल्म जवानी की हवा सन् 1935 में बनकर तैयार हो गई थी। फिल्म में एक लड़की अनचाहे विवाह से बचने के लिए घर से भाग जाती है। पूरी फिल्म की शूटिंग रेलगाड़ी में की गई थी। नायक थे नजमुल हुसैन। दो नायिकाएं थीं, देविका रानी और चंद्रप्रभा। संगीत निर्देशक सरस्वती देवी। सरस्वती देवी और चंद्रप्रभा दोनों पारसी बहनें थीं। उस समय का पारसी समाज एंग्लोइंडियनों की तरह उदार नहीं हुआ था और उसे यह अच्छा नहीं लगा कि इस तरह की फिल्म में पारसी लड़कियां काम कर रही हैं। लेकिन विवाद जल्द ही सुलझ गया। जवानी की हवा की पटकथा लिखी थी निरंजन पाल ने और निदेशक थे फ्रांज ऑस्टन। हिमांशु राय तो निर्माता थे ही।

अगले साल सन् 1936 में बॉम्बे टॉकीज की फिल्म बनी जीवन नैया। नायिका इस बार भी देविका रानी थी। नायक की भूमिका नजमुल हुसैन को ही निभानी थी लेकिन इस बीच एक अप्रिय विवाद उठ खड़ा हुआ और रातों रात फिल्म से नजमुल को निकाल दिया गया। फिल्म फ्लोर पर जाने के लिए तैयार थी। नायक की तलाश के लिए ज्यादा दूर नहीं जाना पड़ा, स्टूडियो की प्रयोगशाला में सहायक अशोक कुमार गांगुली चेहरे-मोहरे से हीरो लगता था। उसे इस काम के लिए तैयार किया गया। और इस तरह अशोक कुमार का फिल्मों में आगमन हुआ।

देविका रानी और अशोक कुमार की जोड़ी दर्शकों को पसंद आ गई और इस जोड़ी ने बॉम्बे टॉकीज को एक के बाद एक कई उल्लेखनीय फिल्में दीं। इनमें सबसे महत्वपूर्ण थी, अछूत कन्या। नाम से ही जाहिर है, यह छूआछूत की कुप्रथा के खिलाफ थीं इसमें देविका रानी ने एक दलित लड़की कस्तूरी की भूमिका निभाई है। अशोक कुमार ब्राह्मण परिवार के बेटे प्रताप बने हैं। दोनों के माता-पिता उनकी भावनाओं के खिलाफ अलग-अलग जगह दोनों की शादी करा देते हैं। कस्तूरी का का पति मनु पहले से ही विवाहित है। मनु की पहली पत्नी कजरी और प्रताप की पत्नी मीरा दोनों ही कस्तूरी को रास्ते से हटाने की कोशिश में लगी रहती हैं। एक दिन मेले में कस्तूरी को यह कहकर प्रताप के पास भेज दिया जाता है कि प्रताप मुसीबत में है। इधर मनु से कहा जाता है कि कस्तूरी प्रताप के साथ भाग गई है। मनु उन्हें ढूंढने निकलता है और वे दोनों मेले से वापस आ रहे हैं। रेलवे क्रॉसिंग पर वह इन्हें देख लेता है। मनु और प्रताप के बीच गरमा गरमी हो जाती है और दोनों लड़ते-लड़ते रेलवे लाइन पर आ जाते हैं। उन्हें बचाने की कोशिश में कस्तूरी ट्रेन के नीचे आ जाती है। उस जगह पर एक पत्थर लगाया जाता है, जिस पर लिखा है – ‘उसने अपनी जान दी, दूसरों की जान बचाने के लिए’। इसी पत्थर के क्लोज अप से फिल्म शुरू होती है और इसी पर खत्म होती है। पूरी फिल्म फ्लैश बैक में चलती है।

इस फिल्म का महत्व इस बात से समझा जा सकता है कि जिस दौर में ज्यादातर पौराणिक विषयों पर फिल्में बनाना ही टिकट खिड़की पर सफलता की गारंटी माना जाता था, उस समय हिमांशु राय ने इस तरह की क्रांतिकारी सामाजिक फिल्म बनाई। छुआछूत की समस्या को लेकर फिल्म बनाना और भी जोखिम का काम था। अखबार हिंदू ने इसे देविका रानी की तब तक की श्रेष्ठ फिल्म बताया था।

25 अगस्त 1936 को मुम्बई में मौजूद कांग्रेस कार्यकारिणी के कुछ सदस्यों ने रॉक्सी सिनेमा में एक विशेष शो में अछूत कन्या देखी थी। इनमें पंडित जवाहरलाल नेहरू, सरदार वल्लभभाई पटेल, आचार्य नरेंद्र देव, और सरोजिनी नायडू भी शामिल थे।

हिमांशु राय ने इसके बाद भी इस जोड़ी के साथ सामाजिक समस्याओं को लेकर फिल्में बनाना जारी रखा। उनकी अगली फिल्म थी जन्मभूमि। यह ग्रामोद्धार को लेकर बनाई गई थी। आदिवासियों की समस्या को लेकर इज्जत बनाई। लेकिन ये दोनों फिल्में असफल रहीं। एक पौराणिक फिल्म सावित्री बनाई, वह भी नहीं चल सकी।

सन् 1933 से 1943 तक देविका रानी ने सोलह फिल्मों में काम किया इनमें उनके नायक हिमांशु राय, नजमुल हुसैन, अशोक कुमार, किशोर साहू, राम शुक्ल और जयराज थे। 1941 में अशोक कुमार के साथ देविका रानी की अंतिम फिल्म आई ‘अनजान’ जिसके निर्देशक अमिय चक्रवर्ती थे। 1943 में नायिका के रूप में देविका रानी की अंतिम फिल्म ‘हमारी बात’ रिलीज हुई थी।

सन् 1940 में हिमांशु राय की मृत्यु के बाद देविका रानी ने बॉम्बे टॉकीज की कमान अपने हाथों में ले ली और पांच साल बाद सन् 1945 में बॉम्बे टॉकीज से अलग भी हो गई। इन पांच सालों में उन्होंने कई सफल फिल्मों का निर्माण किया। इनमें कुछ हैं: पुनर्मिलन, बंधन, कंगन, झूला, वसंत और किस्मत। किस्मत ने तो कोलकाता के एक सिनेमाघर में चार वर्ष लगातार चलकर एक नया रिकार्ड बनाया।

बॉम्बे टॉकीज छोडऩे का फैसला देविका रानी ने बड़े भारी मन से लिया था। वह बताती हैं, ‘पैसा कमाना बॉम्बे टॉकीज का एकमात्र लक्ष्य नहीं था। हिमांशु राय ने यह जरूर सिखाया था कि अगर फिल्मों को अपने पैरों पर खड़ा होना है तो उन्हें व्यावसायिक दृष्टि से आकर्षक होना चाहिए। लेकिन यह सफलता कलात्मक मूल्यों की बलि देकर हासिल नहीं की जानी चाहिए। जिस पल मुझे लगा कि मैं इन मूल्यों की रक्षा नहीं कर सकती, उसी पल मैंने बॉम्बे टॉकीज छोडऩे और फिल्म निर्माण से निवृत होने का फैसला ले लिया।’

बॉम्बे टॉकीज छोडऩे के बाद देविका रानी ने रूसी मूल के चित्रकार व्यातोस्लाव रोरिख से विवाह कर लिया और दोनों कुल्लू, हिमाचल प्रदेश में रहने लगे। 8 मार्च 1994 को बंगलौर में देविका रानी का निधन हुआ।

 

सुरेश उनियाल

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