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एलियंस के अंतरिक्षयान कहीं हमारे सौरमंडल में तो नहीं

वैज्ञानिकों के दल का मानना है कि एक रहस्यमय और विनाशकारी घटना ने मंगल के ऑक्सीजन से भरपूर वायुमंडल को छिन्न-भिन्न कर दिया।

पारलौकिक सभ्यताओं ने अपने अंतरिक्षयान हमारे सौरमंडल में भेज दिए हैं और इनकी तकनीक इतनी उन्नत है कि मनुष्य इन्हें देख नहीं सकते। यह दावा एडिनबरा यूनिवर्सिटी के शोधकत्र्ताओं ने किया है। रिसर्चरों के मुताबिक ये यान रोबोटिक हो सकते हैं और वे शायद अपनी दूसरी प्रतियां तैयार करने में भी सक्षम हैं। यानी एक यान अपने जैसा दूसरा यान बना सकता है। यूनिवर्सिटी के दो गणितज्ञों, डंकन फोर्गन और आर्वेन निकल्सन ने जर्नल ऑफ एस्ट्रोबायोलॉजी में प्रकाशित अपने रिसर्च पेपर में एलियन अंतरिक्षयानों के हमारे सौरमंडल में विचरने की संभावनाओं का विश्लेषण किया है।

अंतरिक्ष में लंबी यात्राएं करने के लिए अंतरिक्षयानों की गति बहुत तेज होनी चाहिए। पेपर में यह संभावना व्यक्त की गई है कि एलियन सभ्यताएं अपने यानों को गति देने के लिए तारों के गुरुत्वाकर्षण का इस्तेमाल कर रही हैं। इसे स्लिंगशॉट (गुलैल) तकनीक कहा जाता है। मनुष्य भी अपने अंतरिक्षयानों को गति देने के लिए इसी तरह की तकनीक का इस्तेमाल करता है। मसलन नासा के वोएजर यान स्लिंगशॉट तकनीक का प्रयोग करते हैं लेकिन वे तारों के बजाय ग्रहों के गुरुत्वाकर्षण की मदद लेते हैं। रिसर्चरों का यह भी मानना है कि एलियन अंतरिक्षयानों के बेड़े अंतरिक्ष में लंबी यात्राओं के दौरान धूल और गैस से अपने नए संस्करण बनाने में सक्षम हो सकते हैं। रिसर्चरों के मुताबिक अंतरिक्षयानों के निर्माण में दक्ष एलियन सभ्यताएं लाखों वर्षों से हमारी मिल्की वे (आकाशगंगा) में मौजूद हैं।

रिसर्चरों द्वारा की गई गणनाओं के अनुसार एलियन अंतरिक्षयान को एक करोड़ वर्ष के भीतर हमारी आकाशगंगा के प्रत्येक कोने का अन्वेषण करने के लिए प्रकाश की गति के सिर्फ दसवें हिस्से के बराबर रफ्तार से उडऩा होगा। वैज्ञानिकों का निष्कर्ष है कि आत्म-निर्माण में सक्षम अंतरिक्षयानों का बेड़ा तुलनात्मक दृष्टि से बहुत कम समय में आकाशगंगा की पड़ताल कर सकता है। नई रिसर्च एक अन्य वैज्ञानिक, जैकब हक मिसरा के कथन से मेल खाती है। हक-मिसरा ने 2011 में दावा किया था कि एलियन अंतरिक्षयान पहले से ही हमारे सौरमंडल में मौजूद हैं जिनके बारे में हमें कोई जानकारी नहीं है क्योंकि हमने उन्हें खोजने के लिए अभी तक कोई गंभीर प्रयास नहीं किया है।

इस बीच, भारतीय मूल के एक वैज्ञानिक और उनके सहयोगियों ने पता लगाया है कि अतीत में मंगल ग्रह की परिस्थितियां जीवन के अनुकूल थीं। उनका कहना है कि लाल ग्रह चार अरब वर्ष पहले तक जीवन से सराबोर रहा होगा। मंगल के वायुमंडल के बारे में क्यूरिऑसिटी रोवर द्वारा प्रेषित आंकड़ों के अध्ययन करने के बाद रिसर्चरों ने निष्कर्ष निकाला है कि चार अरब साल पहले मंगल अपने वायुमंडल से ऑक्सीजन गवां बैठा था। ऐसा शायद प्लूटो के आकार के पिंड से उसकी भयानक टक्कर की वजह से हुआ था। मिशीगन यूनिवर्सिटी में अंतरिक्ष विज्ञान के प्रोफेसर सुशील अत्रेय का कहना है कि क्यूरिऑसिटी के आंकड़े इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि मंगल का वायुमंडल बहुत घना था। आज के ठंडे और शुष्क ग्रह की तुलना में मंगल गर्म और जलयुक्त था।

वैज्ञानिकों के दल का मानना है कि एक रहस्यमय और विनाशकारी घटना ने मंगल के ऑक्सीजन से भरपूर वायुमंडल को छिन्न भिन्न कर दिया। ऑक्सीजन से वंचित होने के बाद वायुमंडल में सिर्फ कार्बन डाइऑक्साइड ही रह गई थी। प्रो.अत्रेय के अनुसार वैज्ञानिकों की टीम ने मंगल की हवा में मौजूद विभिन्न गैसों और आइसोटोप की नापजोख की है। आइसोटोप एक ही रासायनिक तत्व का दूसरा रूप होता है जिसमें न्यूट्रोन कणों की संख्या अलग-अलग होती है। मसलन कार्बन-12, कार्बन का एक प्रमुख आइसोटोप है जबकि कार्बन-13 ज्यादा भारी और स्थिर आइसोटोप है। उसमें एक न्यूट्रोन ज्यादा होता है।

वैज्ञानिकों ने मंगल के वायुमंडल में मौजूद कार्बनडाइऑक्साइड में कार्बन और ऑक्सीजन के हल्के और भारी आइसोटोप के अनुपात का विश्लेषण किया। क्यूरिऑसिटी के आंकड़ों के अध्ययन से पता चलता है कि मंगल के वर्तमान पतले वायुमंडल में कार्बन और ऑक्सीजन के भारी आइसोटोप की मात्रा ग्रह निर्माण में प्रयुक्त कच्चे माल में तत्वों के अनुपात की तुलना में बहुत ज्यादा है। यह न सिर्फ मंगल के मूल वायुमंडल के खोने का पक्का सबूत है बल्कि इससे इस बात का भी सुराग मिलता है कि यह क्षति कैसे हुई? वैज्ञानिकों का ख्याल है कि मंगल के वायुमंडल की क्षति ऊपर से हुई। निचले वायुमंडल के जमीन के साथ क्रिया करने की वजह से ऐसा नहीं हुआ।

 

मुकुल व्यास

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