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देश में, जाति आधारित राजनीति को समाप्त करने का समय आ गया है!

यह सच है कि अल्पसंख्यक वर्ग को उंचा उठाने के लिए केन्द्र सरकार व राज्य सरकार द्वारा अनेक स्कीमों को लागू किया गया है, लेकिन फिर भी देश में अभी भी अल्पसंख्यकों के हालात में उम्मीद से कम ही सुधार हुआ है। उनके बच्चों को आज भी उचित शिक्षा नहीं मिल रही है इसलिए खास तौर पर इन जातियों में बेरोजगारी बढ़ रही है, जिसके फलस्वरूप आपराधिक और राष्ट्र विरोधी गतिविधियों में उनकी भागीदारी बढ़ रही है।

लखनऊ बैन्च की इल्हाबाद हाईकोर्ट ने हाल ही में राजकीय पक्षों को नोटिस देकर जाति आधारित रैली निकालने पर अंकुश लगाया है, जिसका विरोध अखिलेश यादव और मायावती ने जमकर किया क्योंकि वे जानते थे की यूपी में विभिन्न जातियों को लॉलीपॉप दिये बिना चुनाव जीतना आसान नहीं है। लेकिन हाईकोर्ट ने सही निर्णय लिया, अब वो समय आ गया है जबकि राजनीति में जाति आधारित मुद्दे को नहीं उठाना चाहिये। इलाहाबाद होईकोर्ट के इस फैसले पर राष्ट्रीय स्तर पर अनेक सेमीनार व वर्कशॉप वगैरह का आयोजन करके बुद्धिजीवियों को एक डीबेट या वार्तालाप शुरु करना चाहिये। मुसलमान, दलित और आदिवासियों के उत्कर्ष के नाम पर केवल कागजों पर राजनीति चल रही है और राजकीय पक्ष उसका लाभ उठाते आये हैं। राजकीय पक्षों की इस चाल को देशवासी बहुत अच्छी तरह से जानते हैं, इसलिए बुद्धिजीवियों को आगे आकर पिछड़ी जाति के लोगों को जागृत करने की कोशिश करनी चाहिये।

यह सच है कि अल्पसंख्यक वर्ग को ऊंचा उठाने के लिए केन्द्र सरकार व राज्य सरकार द्वारा अनेक स्कीमों को लागू किया गया है, लेकिन फिर भी देश में अभी भी अल्पसंख्यकों के हालात में उम्मीद से कम ही सुधार हुआ है। उनके बच्चों को आज भी उचित शिक्षा नहीं मिल रही है इसलिए खास तौर पर इन जातियों में बेरोजगारी बढ़ रही है, जिसके फलस्वरूप आपराधिक और राष्ट्र विरोधी गतिविधियों में उनकी भागीदारी बढ़ रही है। सरकार और सभी राजनीतिक दलों की सामूहिक जिम्मेदारी है कि वे उन्हें मुख्यधारा में लाने का प्रयास करें। एक रिपोर्ट के अनुसार, केरल में एक चौथाई वर्ग यानि 25 प्रतिशत लोग मुस्लिम है, पश्चिम बंगाल में 30 प्रतिशत मुस्लिम बसते है, असाम का हर चौथा व्यक्ति मुस्लिम है, उत्तर प्रदेश में करीब 3 करोड़ मुसलमान रहते है, बिहार में 1.5 करोड़ मुसलमान हैं और कर्णाटक में हर नौंवा घर मुसलमान का है, यह भी सच है कि, इस गठबंधन भरे युग में, राजनीतिक पक्ष मुसलमानों को अनदेखा करने की भूल नहीं कर सकते। किसी भी पार्टी के लिए फिर वो कांग्रेस हो या भाजपा, अल्पसंख्यक समुदाय के समर्थन के बिना देश पर राज करने के लिए अपनी बहुमत साबित करना मुश्किल है, लेकिन उन्हें लुभाने की कोशिश में देश को कितना नुकसान भुगतना पड़ेगा इस बात का अंदाज शायद राजनेताओं को नहीं है।

वर्तमान में, उत्तर प्रदेश में सपा की सत्ता है, इससे पहले बसपा ने देश के सबसे बड़े राज्य पर शासन किया है। राजनीतिक पंडित भी बहुत अच्छी तरह से जानते हैं कि उत्तर प्रदेश में अपनी साख जमाये बिना लोकप्रिय नेता भी प्रधानमंत्री कार्यालय में अपनी सीट पक्की नहीं कर सकते, सिवाय के सोनिया माता जी का आशीर्वाद उन पर हो।

गुजरात में अल्पसंख्यक समुदाय के साथ हुए अन्याय के लिए जो लोग नरेन्द्र मोदी को जिम्मेदार मान रहे है, या उन पर लांछन लगा रहे है, उन्हें पता चलना चाहिये कि गुजरात में मुसलमानों की आर्थिक और सामाजिक हालात दोनों तरह से देश के अन्य राज्यों की तुलना में अधिक बेहतर हैं। सच्चर कमेटी की रिपोर्ट के अनुसार ग्रामीण गुजरात में मुसलमानों की प्रति माह, प्रति व्यक्ति की आय 668 रुपये है, जो सामान्य ग्रामीण हिन्दू की प्रति माह, प्रति व्यक्ति की आय से 24 रूपये अधिक है (644 रूपये) और 141 रूपये अधिक है ग्रामीण गुजरात में अनुसूचित जातियों की प्रति व्यक्ति आय (527 रूपये) की तुलना में, इतना ही नहीं ग्रामीण गुजरात के अन्य पिछड़े वर्ग (594 रूपये) की तुलना में भी अल्पसंख्यक मुसलमानों की आय 74 रूपये अधिक है और भारत के ग्रामीण मुसलमानों की प्रति माह प्रति व्यक्ति आय (553 रूपये) के

मुकाबले गुजरात के ग्रामीण मुस्लिम का आय 115 रूपये अधिक है। जबकि शहरी गुजरात के मुसलमानों की प्रति व्यक्ति आय 875 रूपये है जो 71 रूपये अधिक है, भारत के अन्य शहरी मुसलमानों की प्रति व्यक्ति आय 804 रूपये है। प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने 2005 में सच्चर कमिटी को भारत के मुस्लिम समुदाय के नवीनतम सामाजिक, आर्थिक और शैक्षिक परिस्थिति पर एक रिपोर्ट तैयार करने का कमीशन नियुक्त किया था। भारत मानव विकास की रिपोर्ट के अनुसार गुजरात में मुस्लिम परिवारों को पेयजल सुविधा के बेहतर स्रोत उपलब्ध है। पूरे गुजरात में (93.1. पर्सेंट) पेयजल की खपत दी जाती है तो मुस्लिम विस्तार में उससे 4.6त्न अधिक यानि (97.7 पर्सेंट) पेयजल दिया जाता है और भारत के अन्य मुस्लिम घरेलू विस्तारों में (92.8 पर्सेंट) के मुकाबले (4.9 पर्सेंट) अधिक गुजरात के मुस्लिम परिवारों को पीने का पानी दिया जाता है।
गुजरात में मुसलमानों की साक्षरता दर 73.5 प्रतिशत है जो राष्ट्रीय औसत साक्षरता दर (64.8 पर्सेंट) की तुलना में 8.7 प्रतिशत अधिक है।

इसके अलावा मोदी सरकार ने सागरखेडु योजना के अंतर्गत गुजरात के तटीय बेल्ट के व्यापक विकास के लिए 11,000 करोड़ रूपये खर्च किये है, जिसका अधिकांश लाभ भी मुस्लिम मछुआरों को मिला है। इस वर्ष और भी अधिक विकास के लिए सरकार ने 21,000 करोड़ रूपये खर्च करने का प्रावधान रखा है।

विभिन्न अवसरों पर विपक्षी दलों के अधिकांश नेताओं ने भी इस बात को स्वीकार किया है कि गुजरात भारत के अन्य राज्यों की तुलना में अधिक प्रगति कर रहा है। पूरे देश में अपनी चुनावी रैली के दौरान श्री नरेन्द्र मोदी निश्चित रूप से गुजरात के मुसलमानों की स्थिति की वास्तविक तस्वीर दिखायेंगे। गुजरात के मुसलमान यदि अच्छा प्रदर्शन कर सकते हैं तो फिर देश के अन्य हिस्सों में क्यों नहीं?

इस वर्ष वित्त मंत्री पी.चिदम्बरम ने 3,511 करोड़ रूपये अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय के लिए आबंटित किये हैं, जो पिछले वर्ष की तुलना में 12 प्रतिशत अधिक है। बढ़ी हुई राशि पिछले वर्ष मंत्रालय द्वारा हाथ धरे अधूरे प्रोजेक्टो को पूरा करने के लिए दी गई है। इससे पता चलता है कि कांग्रेस सरकार अल्पसंख्यक वोट बैंक को आकर्षित करने के लिए केवल खोखली घोषणाएं करती हैं। अल्पसंख्यक समुदाय के लिए अधिक धन राशि आबंटन किये जाने के बाद भी भारतीय स्तर पर वे अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों की तरह अन्य गरीब वर्गों की तुलना में आर्थिक रूप से पिछड़े हुए है। लेकिन गुजरात में स्थिति इससे बिल्कुल विपरीत है, वे (मुसलमान) अन्य पिछड़े वर्गों की तुलना में अधिक बेहतर स्थिति में है।

उत्तर प्रदेश में मायावती सरकार के शासन के दौरान उन्होंने जनसंख्या के प्रतिशत के अनुसार मुसलमानों को आरक्षण देने की मांग की थी। 1995 में पहली बार मुख्यमंत्री बनने के बाद, मायावती ने सार्वजनिक सेवाओं के लिए अन्य पिछड़ा वर्ग के अंतर्गत मुसलमानों को प्रमाण पत्र (ओबीसी) श्रेणी में जारी करने का प्रावधान रखा था। युपी में मुसलमानों सहित आर्थिक व सामाजिक रूप से पिछड़े वर्गों के 38 प्रतिशत लोगों को ओबीसी कोटे का लाभ मिल रहा है। उनकी सरकार मुस्लिम छात्रों को छात्रवृत्ति देती है और उन्होंने कांशीराम उर्दू, अरबी, फारसी युनिवर्सिटी की स्थापना की है। इसके अलावा मुस्लिम लड़कियों को पढने के लिए प्रोत्साहित करने के लिए उन्होंने सावित्रीबाई फूले स्किम लागू की है जिसके अंतर्गत हरेक 11 वीं कक्षा में पढऩे वाली लड़की को 25,00 रूपये नकद व साईकिल दी जाती है।

उत्तर प्रदेश में अखिलेश सरकार 2013-14 के दौरान अल्पसंख्यकों की बहुलता वाले इलाकों में विकास कार्यक्रमों पर 1,800 करोड़ रुपये खर्च करेगा। अल्पसंख्यक समुदाय के लोग भी अन्य अग्रिम जाति के लोगों के साथ कदम से कदम मिलाकर शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार के क्षेत्र में आगे बढऩा चाहते हैं। केन्द्र सरकार और उत्तर प्रदेश की सरकार उनका वास्तविक जरूरतों को पूरा न करके केवल अपने वोट बैंक का ध्यान रखते हुए उनके लिए सब्सिडी उपलब्ध करवाती है। अब जाति आधारित राजनीति को समाप्त करने का समय आ गया है। मतदाताओं को ध्यान से आगामी आम चुनाव 2014 के दौरान पूरे देश के हित में अपने उम्मीदवार और पार्टी को चुनना होगा।

 

संगीता शुक्ला

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