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अंधेर नगरी, चौपट राजा

दुर्गा शक्ति नागपाल को सस्पेंड करने के सरकारी कारण को देखें तो आज तक किसी नेता ने इस बात पर टिप्पणी नहीं की कि जिस मस्जिद की दीवार को गिराने के कारण उन्हें हटाया गया वह मस्जिद गैर कानूनी थी कि नहीं। अगर ये सरकारी जमीन पर बन रही थी, तो इसे गिराने के लिए कहना क्या गलत था ?

दुर्गा शक्ति नागपाल पर एक तरफ तो कांग्रेस के प्रवक्ता कहते हैं ‘मस्जिद की दीवार को गिराना ठीक नहीं था’ और दूसरी तरफ सोनिया गांधी प्रधानमंत्री को चिठ्ठी लिखती हैं। लगता है कि जनता को इन्होंने निरा उल्लू समझा हुआ है। अगर इस मामले में सोनिया वाकई गंभीर होतीं, तो वे कार्मिक मामलों के मंत्री वी. नारायण सामी को बुलातीं और इस ईमानदार अफसर के मामले में तुरंत केंद्र से हस्तक्षेप करने को कहतीं। प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर उसे मीडिया में देने का उद्देश्य इस मामले में जनता के आक्रोश को शांत करना भर है।

दुर्गा शक्ति नागपाल को सस्पेंड करने के सरकारी कारण को देखें, तो आज तक किसी नेता ने इस बात पर टिप्पणी नहीं की कि जिस मस्जिद की दीवार को गिराने के कारण उन्हें हटाया गया वह मस्जिद गैर-कानूनी थी, कि नहीं। अगर यह सरकारी जमीन पर बन रही थी, तो इसे गिराने के लिए कहना क्या गलत था? ऐसा उच्चतम न्यायालय का आदेश है। अगर कोई भी सरकारी जमीन पर अतिक्रमण करता है? तो क्या अफसर को चुप रहना चाहिए? ऐसा नहीं कि सिर्फ मस्जिद के मामले में ही उन्होंने ऐसा किया। खबर है कि कुछ दिन पहले एक मंदिर के मामले में भी उन्होंने यही कदम उठाया था। सवाल है कि अखिलेश यादव सरकार ने तब उन्हें सस्पेंड क्यों नहीं किया? क्या अब अफसरों को नागरिक का महजब देखकर फैसले करने चाहिए?

अब से कोई 130 साल पहले जब सन् 1881 में भारतेंदु हरिश्चंद्र ने अपना नाटक ‘अंधेर नगरी चौपट राजा, टके सेर भाजी टके सेर खाजा’ लिखा था, तो वह अंग्रेजी कुशासन और अन्यायपूर्ण व्यवस्था का मजाक उड़ा रहे थे। मगर किसे मालूम था कि भारत की आजादी के 63 साल बाद के हुक्मरानों पर भी वह कितना सही और सटीक बैठेगा! सोचिए एक ईमानदार आई ए एस अफसर को इसलिए हटाया जाता है, क्योंकि वह अवैध रूप से नदी से रेत की खुदाई कर रहे ठेकेदारों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करता है। ये ठेकेदार बिना टैक्स दिए चोरी कर रहे थे। बहाना लगाया जाता है एक धार्मिक स्थल की दीवार गिराने का, जो खुद भी गैरकानूनी तौर पर सरकारी जमीन पर कब्जा करके बनाई गई थी।

मामला इतना साफ है कि इसमें जांच की भी जरूरत नहीं। मुख्यमंत्री, प्रधानमंत्री और यू पी ए की अध्यक्ष सोनिया गांधी, सब जानते हैं कि असलियत क्या है। मगर सुनवाई, रिपोर्ट मंगाने, सुलह-सफाई और चिठ्ठी का एक ड्रामा खेला जा रहा है ताकि ईमानदार अफसर लगातार अपमानित हों, उसका स्वाभिमान टूटे। जान लीजिए, ये कार्रवाई सिर्फ दुर्गा शक्ति नागपाल के खिलाफ नहीं है, बल्कि उन सब अफसरों के खिलाफ है, जो निष्ठा के साथ अपने संवैधानिक कर्तव्यों का निर्वहन कर रहे हैं। इसके बहाने उन्हें बताया गया है कि उन्हें देश में ‘कानून का शासन’ नहीं लागू करना, बल्कि हुक्मरानों और उनके चंपूओं के हर सही गलत आदेश का पालन करना है। देश की लूट में उन्हें मदद करना है। नहीं तो, जैसा कि समाजवादी पार्टी के एक स्थानीय नेता ने दावा किया कि कुछ मिनटों में उन्हें उनकी औकात दिखा दी जाएगी। कांग्रेस पार्टी ने 1970 के दशक, श्रीमती इंदिरा गांधी के काल में प्रतिबद्ध न्यायपालिका और प्रतिबद्ध नौकरशाही का सिद्धांत दिया था। आज एक बार फिर समय है कि स्पष्ट किया जाए कि यह प्रतिबद्धता किसके लिए होनी चाहिए। संविधान और कानून के शासन के लिए, या फिर राज काज करने वाले नेताओं के लिए। गठबंधन राजनीति और क्षेत्रीय दलों के बढ़ते प्रभुत्व के इस दौर में राष्ट्रीय दलों जैसे कांग्रेस और बीजेपी की जिम्मेदारी बढ़ जाती है कि वे वोट बैंक की राजनीति से ऊपर उठकर व्यापक राष्ट्र हित में सोचें।

दुर्गा शक्ति नागपाल प्रकरण ने देश को मौका दिया है कि अफसरशाही की भूमिका, अधिकार और उत्तरदायित्व एक बार फिर परिभाषित किए जाएं। देश में अब तक कई प्रशासनिक सुधार आयोग भी गठित किए गए हैं। जरूरत है कि बंद सरकारी बस्तों में पड़ी, उनकी रिपोर्टों को खंगाला जाए और प्रशासनिक सुधार लागू किए जाएं। ताकि ईमानदार अफसर निर्भीक होकर अपने संवैधानिक दायित्वों का पालन कर सकें और छुटभय्ये नेता निहित स्वार्थों के लिए ‘अंधेर नगरी’ के ‘चौपट राजा’ की तरह व्यवहार न कर सकें।

 

उमेश उपाध्याय

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