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बिहारी बाबू को कौन कहे ‘खामोश’?

बिहारी बाबू बाज नहीं आने वाले। पार्टी की धारा के खिलाफ बयान दे-देकर पूरे नेतृत्व के नाक के दम कर चुके शत्रुघ्न सिन्हा ने ऐसे वक्त में नीतीश कुमार की तारीफ कर डाली, जब केवल बिहार भाजपा ही नहीं बल्कि पूरा भाजपा-संघ परिवार बिहार के मुख्यमंत्री का नाम भी सुनने को तैयार नहीं। पटना की खबर तो यह है कि सिन्हा ने नीतीश बाबू से लंबी मुलाकात की। वह भी अकेले में। और बस, उसके बाद से ही ‘नमो नमो’ के मंत्र का जाप करने के बजाय नीतीश कुमार को पीएम मैटेरियल घोषित कर दिया। अब सवाल है कि अब तक जिस बिहारी बाबू को कुछ भी कहने की छूट थी। उन पर नकेल कौन कसे? और कसने के बाद अगर वह जदयू का दामन थाम लें तो नुकसान किसका? भाई, जब मुकाबला एक दूसरे के विकेट झटकने का है, तो अपना विकेट इतनी आसानी से कौन गिरने देगा?
भुलक्कड़ प्रवक्ता
भाजपा की नव नियुक्त तेज-तर्रार प्रवक्ता मिनाक्षी लेखी अपने भूलने की आदत से परेशान हैं। उनकी इस आदत से पार्टी कवर करने वाले पत्रकार भी परेशान हैं। जरा सोचिए, अगर पार्टी से जुड़ी जानकारी देते-देते प्रवक्ता अपने नेताओं का नाम ही भूल जाए तो कोई क्या करे? केंद्रीय प्रवक्ता मीनाक्षी लेखी हाल ही में अपनी प्रेस वार्ता के दौरान पार्टी के बड़े केंद्रीय नेताओं के नाम भूल गईं। मीनाक्षी से कुछ न कुछ जनकारी पाने को आतुर रिपोर्टरों को उनके भुलक्कड़पन से खासी चिढ़ हुई। कुछ ने तो उन पर जानबूझकर नाम न बताने का आरोप भी मढ़ दिया। अब नई प्रवक्ता के साथ कुछ तो मुरव्वत बरतनी चाहिए। लेकिन मीनाक्षी जी, अगर आपकी यह आदत कुछ दिन और रह गई तो मामला कहीं गड़बड़ न हो जाए।
रोजा तो है, मगर इफ्तार पार्टी नहीं
दिल्ली के नेताओं, पत्रकारों, नौकरशहों के लिए रमजान का पाक महीना फीका रहा। रोजेदारों ने तो हर साल की तरह रोजा रखा, मगर बिना रोजे के हाई-पावर इफ्तार पार्टियों का मजा लेने वाले लोगों को निराशा हाथ लगी। दरअसल, उत्तराखंड में हुई तबाही के चलते ज्यादातर बड़ी हस्तियों ने इस साल इफ्तार पार्टी नहीं दी। प्रधानमंत्री ने पार्टी न देने का एलान किया, तो बाकी लोगों को भी ऐसा ही करना पड़ा। अक्सर मेल-मुलाकात का फायदा उठाने के लिए पार्टियों का बेसब्री से इंतजार करने वाले दिल्लीवासियों को राहत मिली, तो बस मुख्यमंत्री शीला दीक्षित और इस्राइल दूतावास की इफ्तारी दावत से।
संघ के दरवाजे सुषमा
आरएसएस के कर्ता-धर्ता नहीं चाहते कि एक बार नरेंद्र मोदी के नाम का एलान हो जाने के बाद कोई भी विरोधी स्वर उठे। लिहाजा, कोशिश की जा रही है कि जो मन से मोदी को स्वीकार नहीं कर रहे उन्हें हर हाल में समय रहते समझा-बुझा लिया जाए। शायद इसीलिए पिछले हफ्ते संघ और भाजपा के आला नेताओं के बीच हुई समन्वय बैठक से पहले लालकृष्ण आडवाणी की करीबी और सम-समय पर मोदी के नेतृत्व को चुनौती देने वाली सुषमा स्वराज को केशव कुंज बुलाकर लंबी चर्चा की गई। मुलाकात में संघ के नंबर-दो भैयाजी जोशी समेत अन्य बड़े अधिकारी मौजूद थे। वे सब मिलकर सुषमा के विचार बदल पाए या नहीं, यह तो आने वाले समय में पता चल ही जाएगा। अलबत्ता, संघ के आकाओं से मिलकर सुषमा समन्वय बैठक में शामिल हो गईं। यही क्या कम है? वर्ना आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी तो दूर ही रह गए।
गिरगिट नेता
आईएएस अधिकारी दुर्गा शक्ति नागपाल के निलंबन पर सत्ताधारी पार्टी के एक नेता टीवी चैनलों पर अपना चेहरा दिखाकर आईएएस अधिकारियों को बार-बार उनकी हदों में रहना बता रहे हैं। कह रहे हंै कि यही आईएएस को उन्होंने खुद एक गै-आईएएस के पैर छूते देखा है। कह रहे हैं कि निलंबन क्यों गलत बात नहीं है। आईएएस कोई खुदा तो नहीं है। इन ही महोदय के खिलाफ इसी आईएएस लाबी के एक अधिकारी ने जांच की थी और इनके मंत्री पद पर रहने के दौरान इनकी करतूतों की जांच शासन को सौंप दी गई थी तब इन्होंने झट से पाला बदल दिया था और दूसरी पार्टी के नेता के कदमों में जाकर कहा था ‘मैं अब तक कहां भटक रहा था मुझे खुद नहीं मालूम अब जिदंगी भर आपके साथ ही रहूंगा।’ लेकिन जैसे ही उनकी सत्ता गयी वह पुराने दल में फिर वापस आ गए और मुखिया से कहा, ‘कि नेताजी मुझ से गलती हो गयी थी कि आपको छोडकऱ चला गया था।’

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