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विश्वासघात

मैं नहीं चाहता कि कोई सपने में भी इस बात को सोचे कि उनके साथ विश्वासघात हुआ है। जनता बड़ी घुन्नी है बंधु! आप पता लगाइए कि कहीं वह ऐसा सचमुच तो नहीं सोच रही है।

आदमी चोरी करे, डाका डाले, रिश्वत ले, राहजनी करे या रंगदारी करे, सब माफ है, लेकिन आदमी विश्वासघात करे, यह बिल्कुल भी बर्दाश्त नहीं। और यह विश्वासघात अगर प्रधानमंत्री पद का ख्वाब देखने वाले किसी मुंगेरीलाल के हसीन सपनों के साथ हुआ हो, तो कतई बर्दाश्त नहीं। इसका बदला लिया जाएगा और बदला लेने कोई मुंगेरीलाल नहीं आएगा, बल्कि प्रदेश की जनता ही बदला लेगी। जनता जागरुक ही नहीं होती, वह अपने नेताओं के हथकंडे पुलिस के डंडे और मुस्टंडे देख-देखकर बड़ी घुन्नी हो गई है। वह जनता है। सब जानती है। उसका काम ही सब जानना है और उसे सब दिखता है। शरीर के ऊपर भी और अंदर भी। उसे सब दिखता है कि सुशासन बाबू कितने जमीन के अंदर खड़े हैं, और कितने बाहर। वह उखाड़ फेंकेगी। उसकी जय-जयकारों में मत जाइए। वह दिखावा है। वह अंदर ही अंदर सुलग रही है कि उसके जनादेश का अपमान हुआ है, उसे जोर जबरदस्ती से हड़प लिया गया है। वह बदला लेगी। यह आदमी 1974 के उस आंदोलन की उपज है, जिसने लोहे की औरत को उखाड़ फेंका था। लौह ललना का टूट गया था मजबूत पलना। सन एकदम सफाचट। साफ। सूपड़ा साफ। आज तो उनमें उनके अनुयाइयों में कोई लोहा ही नहीं रह गया है। पर देखो यह आदमी उनके ही बहकावे में आ गया, जिनका सूपड़ा साफ होने वाला है।

यह आदमी गैर कांग्रेसवाद-गैर कांग्रेसवाद का मंत्रजाप करते हुए कांग्रेस की गोद में जा बैठा है। कैसा अनर्थ है! जनता बड़ी घुन्नी है। चुप है। वह यह तक प्रगट नहीं होने दे रही है कि वह बदला लेगी। इस सुशासन बाबू का दिनदहाड़े इस महीन दाढ़ीवाले ने अपहरण कर लिया है। वह बदला लेगी। वह विश्वासघात करनेवालों को सबक सिखाएगी। और यह दूर बैठा हुआ दाढ़ीवाला यह बात जानता है। वह देश की नब्ज पकड़े बैठा रहता है, भले ही बैठे-बैठे उसे कब्ज हो गया हो। वैचारिक कब्ज। राजनैतिक कब्ज। पर वह सब्जबाग दिखाता है। उसे पता है कि जनता भी सब देख रही है और सब जानती है। वह बदला लेगी। वह उखाड़ फेंकेगी। जरूरत ही नहीं पड़ेगी, उसे उखाडऩे की। यह सुदर्शन -सुशासन बाबू खुद अपनी दाढ़ी के बाल नोचने लगेंगे। धैर्य रखिए और जुट जाइए। एकजुट। एकदम। गांव-गांव और बूथ-बूथ तक जाइए और लोगों को बताइए कि मैं कौन हूं। कहां से आया हूं। मैंने अपने प्रदेश के लिए क्या काम किया है। क्या कुर्बानी दी है और कैसे एक ही दिन में मैं हाल ही में उत्तराखंड की तबाही के बीच फंसे अपने प्रदेश के लोगों को छांट-छांटकर वापस लाया हूं। मैं क्या नहीं कर सकता?

वैसे तो जनता सब जानती है मगर आजकल वह जरा घुन्नी हो गई है। हो सकता है कि वह मेरी सफेद करीने से कटी हुई दाढ़ी की प्रशंसा करती मिले, मगर वक्त आने पर मेरी ही हजामत बना देना। ऐसा न हो कि सभी दाढ़ी वाले देखते रह जाएं और कभी-कभी दाढ़ी रखने वाला क्लीन शेव बालक कुर्सी पर जा बैठे। आप लोगों को इन सारे खतरों से अवगत कराइए और बातइए कि यह बंदा जनता की सेवा करने के लिए तमाम कब्ज के बावजूद कसमसा रहा है। यह कि आप लोगों को नर्वस नहीं होना है। इस बंदे पर विश्वास करके जुट जाना है। बाकी तो मुझे पूरा यकीन है कि देश की जनता अपनी ऐतिहासिक जिम्मेदारी को पूरा करेगी। वह जाएगी भी कहां? केन्द्र को वह उखाड़ फेंकेगी और इस उपकेन्द्र को भी, जिसमें जनादेश का जबरन अपहरण हुआ है। जहां वोट लूटे जाते थे वहां जनादेश को लूट लिया गया है।

उन्हें यही बताना है कि उनके साथ घोर विश्वासघात हुआ है। यह कदापि नहीं कहना कि मेरे साथ या मेरी पार्टी के साथ विश्वासघात हुआ है। सिर्फ यही कहना है कि आपके साथ विश्वासघात हुआ है और देश को अगर कोई दाढ़ी ही फिर चाहिए तो यह बंदा हाजिर है। उन्हें मेरी नहीं, मेरी दाढ़ी की महिमा बताइए और पार्टी के पितृपुरूष का नाम भी जुबान पर मत लाइए। मैं नहीं चाहता कि कोई सपने में भी इस बात को सोचे कि उनके साथ विश्वासघात हुआ है। जनता बड़ी घुन्नी है बंधु! आप पता लगाइए कि कहीं वह ऐसा सचमुच तो नहीं सोच रही है। उसे बता दीजिए कि इस सोच को हमारे यहां बर्दाश्त नहीं किया जाता।

 

मधुसूदन आनंद

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