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मुसलमानों को नहीं, मामला है रेत माफिया को खुश करने का!

आज तथ्य चीख-चीख कर पुकार रहे हैं कि दुर्गा शक्ति नागपाल ने दीवार नहीं ढहाई। ऐसा वक्फ बोर्ड का कहना है। वक्फ बोर्ड कहता है कि यदि दुर्गा शक्ति नागपाल एक वर्ष और इस क्षेत्र में रहतीं तो खनन माफिया जेल में होता और उन्हें कब्र वाली जगह मिल गई होती। वक्फ बोड ने दुर्गा शक्ति नागपाल की प्रशंसा करते हुए कहा कि वास्तव में तो वक्फ बोर्ड की जमीन, जिसमें कब्रगाह भी है, उसे जबरन दखल कर लिया गया था।

उत्तर प्रदेश सरकार ने 27 जुलाई 2013 को एक युवा बहादुर आईएएस अधिकारी दुर्गा शक्ति नागपाल को निलम्बित कर दिया। कारण दिया गया कि उसने कादलपुर गांव में अवैध निर्माणाधीन मस्जिद की दीवार को ढहा दिया। लोगों में सुगबुगाहट थी कि असली कारण यह नहीं था। कारण था-दुर्गा शक्ति नागपाल ने अवैध रेत खनन माफिया पर कानूनी शिकंजा कसा था। यह उनके पास उसकी कानूनी शक्ति का इस्तेमाल नहीं बल्कि उसकी हिमाकत थी कि उसने इतने शक्तिशाली लोगों के खिलाफ कदम उठाने के बारे कुछ सोचा कैसे। यह लोगों का अनुमान था। पर वहां के डी.एम., स्थानीय इंटेलिजेंस तथा वक्फ बोर्ड की रिपोर्टों ने इस अनुमान को सच्चाई का जामा पहना दिया। उनका कहना था कि मस्जिद की दीवार ढहवाने में इस युवा आईएएस अधिकारी का कोई हाथ नहीं था। यह इस बात से भी साबित हो जाता है कि समाजवादी पार्टी के नेता नरेन्द्र भाटी माईक पर जनता को संबोधित करते हुए कह रहे थे कि कैसे उन्होंने मुलायम सिंह यादव तथा मुख्यमंत्री से बात कर मात्र 41 मिनट में आईएएस साहिबा को निलम्बित करवा दिया। उन्होंने इस अधिकारी के लिए अप्रिय शब्द भी कहे जो उनकी नारी विरोधी छवि को सामने लाते हैं।

बहस करने के लिए यदि एक बार मान भी लें कि दुर्गा शक्ति नागपाल ने वही किया था जिसका आरोप उन पर लगाया गया है। तब भी उन्होंने कानून की ओर से कुछ गलत नहीं किया था। सर्वोच्च न्यायालय ने 2009 में एक मुकदमे में कहा था–‘एक अंतरिम व्यवस्था के अन्तर्गत हम निर्देश देते हैं कि आज के बाद से सार्वजनिक रास्तों पर, पब्लिक पाक्र्स में या दूसरे सार्वजनिक रास्तों पर मंदिर, मस्जिद, चर्च या गुरूद्वारा के नाम पर कोई अवैध निर्माण नहीं होगा। न ही इस प्रकार का कोई आदेश निर्गत किया जा सकेगा। अपने आदेश का पालन कराने के लिए हम डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट, डिप्टी कमिशनर जो जिलों के प्रभारी हैं, को आदेश देते हैं कि वे हमारे निर्देशों का पालन करवाएं। उन्हें निर्देश दिया जाता है कि वे चार हफ्तों के अन्दर संबंधित मुख्य सचिव या प्रशासक (केन्द्र शासित प्रदेश) को अपनी रिपोर्ट भेजेंगे तथा वे लोग इस अदालत को आज से 8 हफ्तों के अन्दर अपनी रिपोर्ट भेजेंगे।’ यदि दुर्गा शक्ति नागपाल ऐसा नहीं करतीं तो उन्हें सर्वोच्च न्यायालय की अवमानना का दोषी पाया गया होता।

सर्वोच्च न्यायालय ने 2013 की 18 जनवरी को भी सड़कों, फुटपाथों तथा साईडवेज पर फ्रेश निर्माण किए जाने पर भी रोक लगा दी है। ये निर्माण चाहें तो धार्मिक स्थलों के हों या ‘पब्लिक फिगर्स’ की मूर्तियों के हों। सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति आर.एस. लोढ़ा तथा एस.जे. मुखोपाध्याय की खण्डपीठ ने कहा है कि ‘धार्मिक निर्माण के नाम पर अवैध निर्माण नहीं होंगे। कभी-कभी स्थानीय नेता लोगों के दबाव के सामने ऐसा करते हैं और अधिकारियों को उनके सामने चुप हो जाना पड़ता है।’

सर्वोच्च न्यायालय ने 10 मई 2011 को भी कहा था–‘जहां तक अवैध निर्माण के ऊपर कार्यवाही का सवाल है तो वहां मंदिर-मस्जिद में कोई अन्तर या भेदभाव नहीं किया जाएगा।’

जब वक्फ बोर्ड ने कहा था कि मस्जिद उसकी संपत्ति है और उसे ढहाने के सवाल उस पर छोड़ दिया जाए, तो न्यायमूर्ति दलबीर भंडारी, वी.एस. सिरपुरकर तथा दीपक वर्मा की पीठ ने कहा था कि–‘ऐसा नहीं हो सकता। हम अवैध निर्माण के सवाल पर मंदिर-मस्जिद में भेदभाव नहीं कर सकते। गुजरात उच्च न्यायालय का 2006 में आदेश आया था कि 1200 मंदिर तथा 260 इस्लामिक श्राईन जो सार्वजनिक स्थलों पर बने हैं, उन्हें ढ़हा दिया जाए। सर्वोच्च न्यायालय ने इसी फैसले पर अपनी मुहर लगा दी थी।

आज तथ्य चीख-चीख कर पुकार रहे हैं कि दुर्गा शक्ति नागपाल ने दीवार नहीं ढहाई। ऐसा वक्फ बोर्ड का कहना है। वक्फ बोर्ड कहता है कि यदि दुर्गा शक्ति नागपाल एक वर्ष और इस क्षेत्र में रहतीं तो खनन माफिया जेल में होता और उन्हें कब्र वाली जगह मिल गई होती। वक्फ कमेटी ने दुर्गा शक्ति नागपाल की प्रशंसा करते हुए कहा कि वास्तव में तो वक्फ बोर्ड की जमीन, जिसमें कब्रगाह भी है, उसे जबरन दखल कर लिया गया था। दुर्गा शक्ति नागपाल तो सिर्फ वह जमीन देखने के लिए आई थीं। कमेटी ने दुर्गा शक्ति नागपाल की पुन: बहाली की मांग उत्तर प्रदेश सरकार से की है।

यह मामला दरअसल मुसलमानों को खुश करने का भी नहीं है। बल्कि यह तो रेत माफियाओं को खुश करने और उसके साथ अरबों के व्यापार को साझा करने की सांठगांठ का मामला है।

उत्तर प्रदेश की लखनऊ बैंच ने इस मामले में पडऩे से इन्कार कर दिया हैं। हालांकि उसने इस मामले में दुर्गा शक्ति नागपाल की तारीफ की है। कारण बताया गया कि दुर्गा शक्ति नागपाल ने बैंच के समक्ष कोई याचिका दायर नहीं की है। उसे खुद याचिका दायर करनी चाहिए। अदालत ने आगे कहा कि अवैध खनन से इकोलॉजिकल बैलेंस गड़बड़ हो रहा है। नदी की धारा बदलना भी चिन्तनीय है। उन्होंने उत्तर प्रदेश के एडिशनल एडवोकेट जनरल से यह बताने के लिए कहा है कि वह बताएं कि इन मामलों में कितने लोग गिरफ्तार हुए। कितने डंपर पकड़े गए। दुर्गा शक्ति नागपाल के हटने के बाद अवैध खनन पर कितनी एफ आई.आर. फाइल की गईं।

इस मामले में पूरे देश में आंदोलन अपने शीर्ष पर है कि ईमानदार और बहादुर अधिकारियों की रक्षा की जाए। पर उत्तर प्रदेश सरकार इस विषय पर इस कदर अड़ी हुई है कि वह कहती है कि ‘हमें आई.ए.एस. तथा आई.पी.एस. अधिकारी नहीं चाहिए। हम अपने राज्य के अधिकारियों से ही काम चला लेंगे।’

सोनिया गांधी ने दुर्गा शक्ति नागपाल को न्याय देने की वकालत की है। सोनिया गांधी की इस सहानुभूति पर उनसे सवाल पूछा जा रहा है कि वह आज तो दुर्गा शक्ति नागपाल को न्याय दिलाने की बात कर रही हैं लेकिन ‘खेमका’ के मामले के वक्त वह चुप क्यों रहीं। उस वक्त वह कहां थीं। ‘खेमका’ भी तो एक ईमानदार अधिकारी था। असल में राजनीतिक दल अपने-अपने अधिकारी चाहते हैं। वे ‘पिक एंड चूज’ की नीति अपनाते हैं।

देश के लिए यह एक शर्मनाक स्थिति है। नेताओं को इससे ऊपर उठना होगा और उन्हें देश के हित में ही सोचना होगा कि देश के लिए क्या ठीक है।

डीएम के रिपोर्ट के अनुसार- एसपी ने उन्हें टेलिफोन कर कहा कि घटनास्थल पर एसडीएम को भेजा दें, क्योंकि वहां सांप्रदायिक तनाव है। वहां एसडीएम दोपहर 1 बजे जाती हैं और 2 बजे वापस लौट आती हैं, क्योंकि शाम को उन्हें एक विदाई समारोह में जाना था। इतने कम समय में मस्जिद को गिराया नहीं जा सकता। एक सब इंस्पेक्टर द्वारा गोपनीय रिपोर्ट पेश की गई थी, जिसमें कहा गया है कि कदलपुर में एसडीएम दुर्गा शक्ति द्वारा मस्जिद गिरा दी गई है।

इस तरह एक पुलिसकर्मी के माध्यम से एक आईएएस अधिकारी को फंसाया गया। बाद में यह रिपोर्ट गलत पायी गई। हालांकि उस स्थान पर दुर्गा शक्ति के बजाय दूसरे जगह के एसडीएम वहां पहुंचे थे। उच्चतम न्यायालय में भी एक जनहित याचिका यह कहते हुए दायर की गई है कि दुर्गा शक्ति का निलंबन असंवैधानिक है।

(लेखिका सर्वोच्च न्यायालय में अधिवक्ता और कई पुस्तकों की लेखिका हैं।)

कमलेश जैन

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