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बस! बहुत हुआ, अब और नहीं

भारत के सामने ऐसे में दो रास्ते हैं। एक रास्ता तो सीधा पाकिस्तान को उसी के लहजे में जवाब देना है। इसमें भारत शक्ति परीक्षण के जरिए पाकिस्तान से निपटने में सक्षम तो है लेकिन भारत को इस बात का जरूर ध्यान रखना होगा कि उसके पड़ोस में अन्य देश उसके कितने हितैषी हैं। अन्तरराष्ट्रीय जगत क्या उसे ऐसा करने देगा। दूसरा रास्ता कूटनीतिक तरीका है। कनपटी पर बंदूक रख कर गले में दोस्ती का हाथ डालने वाले से कूटनीतिक तरीकों से निपटना ही बेहतर इलाज होगा, लेकिन यह भारत के लिए कितना आसान होगा, कहना मुश्किल है।

संसद पर हमला, मुंबई पर हमला, भारतीय सैनिक का अपहरण कर उसका सिर कलम करना, सीमा पर गश्त कर रहे भारतीय सैनिकों की हत्या करना, आतंकवादियों की घुसपैठ, भारत में हिंसात्मक गतिविधियों के लिए आतंकियों को पालना-पोसना आदि पाकिस्तान की अन्तहीन करतूतों की सूची की केवल एक झलक मात्र है। पाकिस्तान अपनी हरकतों से बाज आता दिखाई नहीं देता। अब वक्त आ गया है कि पाकिस्तान को स्पष्ट रूप से पूरी सख्ती के साथ उसकी भाषा में समझा दिया जाए कि..”बहुत हो गया, बस अब और नहीं…..भारत की सहनशीलता को उसकी कमजोरी समझना उसकी भूल होगी…..”

कोई देश यदि अपना पड़ोस बदलने की क्षमता रखता तो इस धरती का नक्शा यह नहीं होता, जो आज है। पाकिस्तान हो या बांग्लादेश अथवा चीन, भारत के सभी पड़ोसियों को यह बात अच्छी तरह से पता है। यही कारण है कि भारत का कोई भी पड़ोसी देश भारत के प्रति अपना रवैया बदलने की बात तो छोड़ो, उस तरफ सोचता तक नहीं है। चीन तो लगातार भारतीय सीमा का अतिक्रमण कर ही रहा है, पाकिस्तान की ओर से हो रही घुसपैठ और उसकी धरती से चलाई जा रही आतंकवादी घटनाओं में कहीं कोई कमी दिखाई नहीं देती। हालांकि नवाज शरीफ ने पाकिस्तान में सत्ता संभालते ही भारत के साथ दोस्ताना संबंधों की बात कही थी। नवाज की बात पर भारत को विश्वास कम ही था। पाकिस्तान की ओर से इस बात की पुष्टि करने में भी देर नहीं लगी। सीमा पर पाकिस्तानी सेना की उच्छृंखल वारदातों ने इसकी साफतौर पर पुष्टि कर दी कि पाकिस्तान के हुकमरान सोचते कुछ हैं, कहते कुछ हैं और करते कुछ हैं। अफगानिस्तान के जलालाबाद में भारतीय काउंसलेट जनरल के बाहर भीषण हमला करना, पाकिस्तान की सेना द्वारा एक भारतीय सैनिक का सिर काट देना या जम्मू-कश्मीर के पुंछ सेक्टर में भारतीय सीमा में घुस कर पांच सैनिकों की हत्या करना, नवाज के भारत की ओर दोस्ती का हाथ बढ़ाने के लक्षण तो नहीं है। ये सब तो पाकिस्तान की उद्दंड नीति वाला रवैया ही बताते हैं। मुंबई और संसद पर पाकिस्तान द्वारा पाले-पोसे गए आतंकवादियों के हमले भारत के इस पड़ोसी के संबंधों की पराकाष्ठा दिखा चुके हैं। भारत से संबंध दोस्ताना बनाने का संकल्प लेने वाले नवाज शरीफ भी तो आखिर कट्टरपंथी गुटों के समर्थन से ही चुनाव जीत कर आए हैं। ऐसे में नवाज पाकिस्तानी सेना और आतंकवादी संगठनों की सांठगांठ से भारतीय कश्मीर में हिंसा का माहौल और उग्र करने की रणनीति पर काम कर रहे हों तो उसमें किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए। पाकिस्तानी सेना की नीति आज सबको पता है कि तालिबानी जब अफगानिस्तान की लड़ाई से खाली हो जाएंगे तब वे कश्मीर में काम आएंगे।

भारत में सीमा पार से हो रही आतंकवादी वारदातों को यह कह कर नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए कि पाकिस्तानी सेना पर वहां की सरकार का काई नियन्त्रण नहीं है। हर वारदात के बाद प्रत्येक भारतीय का खून खौलता है, लेकिन सरकार के रवैये के बाद खून खौल कर शान्त हो जाता है। संसद पर हमले के बाद वाजपेयी सरकार ने भारतीय सेना को सीमा पर सावधान कर दिया था। लेकिन छह महीने बाद भारतीय सेना बगैर कोई गोली बरसाए वापस बैरकों में चली गई। देश अब तक नहीं समझ पाया है कि जब अमेरिका 18 हजार मील दूर आकर 9/11 के आतंकवादी हमले का बदला ले सकता है और कुख्यात आतंकवादी ओसामा को मौत के घाट उतार सकता है तो भारत अपनी सीमा के पार से आने वाले आतंकवादियों से अपनी रक्षा क्यों नहीं कर सकता। सीमा पर पांच भारतीय सैनिकों को मौत के घाट उतारने की पाकिस्तान की करतूत पर भारत में सरकार और विपक्ष का एक स्वर न उठना इस बात का जवाब है कि भारत हमेशा आतंकवादियों के हमलों के बाद बेबस क्यों हो जाता है। सरकार ने इतनी बड़ी वारदात को तूल न देने की नीति अपनाई। रक्षा मंत्री ए.के. एंटॉनी ने संसद में अपने बयान में यह कहने की बजाय कि हमलावर पाकिस्तानी सैनिक थे, एंटॉनी ने कहा कि हमलावर पाकिस्तान की सेना की वर्दी पहने हुए थे। जबकि रक्षा मंत्रालय का कहना था कि हमलावरों के साथ पाकिस्तान के सैनिक भी थे। कुछ भी हो, सीमा पर भारतीय सैनिकों की हत्या करने वाले चाहे आतंकवादी थे या उनके साथ पाकिस्तान के सैनिक भी थे, इस वारदात से पाकिस्तान अपनी जिम्मेदारी से पल्ला नहीं छुड़ा सकता। इस वारदात को लेकर संसद में जबरदस्त हंगामा हुआ और संसद के दोनों सदनों को भंग कर देना पड़ा। शहीदों के परिवारों ने भी मांग की कि पाकिस्तान को अच्छी तरह सबक सिखाया जाना जरूरी है और जब तक पाकिस्तान को सबक नहीं सिखाया जाता, तब तक वे मुआवजा नहीं लेंगे।

यहां सवाल यह उठता है कि पाकिस्तान को किस तरह से सबक सिखाया जाए। एक तरीका तो अमेरिका वाला रास्ता है। खुला खेल फर्रूखाबादी। यानी पाकिस्तान पर सीधा हमला। हालांकि भारत के साथ सीधे युद्ध में पाकिस्तान दो बार मुंह की खा चुका है, लेकिन यदि भारत को यही कुछ करना था तो तब क्यों नहीं किया जब वाजपेयी सरकार ने सीमा पर सेनाएं भेज दी थीं। उस वक्त छह महीने तक बंदूकें तैनात कर सेनाओं को वापस बैरेक में क्यों भेज दिया गया। यदि दोनों वारदातों को देखें तो मुम्बई पर हमला हो या संसद पर हमला, दोनों बार भारत पर ही हमला था।

भारत जानता है कि जब पाकिस्तान को युद्ध में शिकस्त दी थी तो वह समय दूसरा था। आज दोनों देश परमाणु अस्त्रों से लैस हैं। एक ओर से भी उठाया गया कोई कदम कितना नाशवान हो सकता है, इसकी केवल कल्पना ही की जा सकती है। इसी को देखते हुए भारत पर जबर्दस्त अन्तरराष्ट्रीय दबाव आ जाता है।

वैसे भी इतिहास गवाह है कि पाकिस्तान में किसी का भी शासन रहा हो, भारत से यदि अन्तरराष्ट्रीय दबाव में पाकिस्तानी हुक्मरानों की ओर से बातचीत का रास्ता अपनाने की कोशिश की गई तो किसी न किसी बड़ी आतंकवादी घटना से उसे पटरी से उतार दिया गया। ऐसा होने पर भी पाकिस्तान की लोकतान्त्रिक सरकारों की ओर से कोई परवाह नहीं की गई। नवाज शरीफ ने जब भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को लाहौर वार्ता के लिए आमंत्रित किया था तो उस समय के पाकिस्तान के सेना प्रमुख परवेज मुशर्रफ ने करगिल युद्ध करा दिया। इस सब के बावजूद वही मुशर्रफ जब राष्ट्रपति बन गए तो वाजपेयी ने मुशर्रफ को आगरा में बातचीत के लिए बुलाया। उसी साल अमेरिका पर 9/11 का आतंकवादी हमला नहीं हुआ होता तो करगिल करवाने वाले मुशर्रफ का रवैया भारत के प्रति कभी नहीं बदलता।

पुंछ सेक्टर में पांच भारतीय सैनिकों की हत्या के बाद संसद में विपक्ष की यह मांग पूरी तरह से जायज मानी जाएगी कि सरकार पाकिस्तान के खिलाफ फौरन जवाबी कार्रवाही करे। लेकिन सरकार की मजबूरी है कि वह कोई भी कदम उठाने से पहले उसके सभी प्रकार के परिणामों पर पहले विचार कर ले। भारत चाहता तो करगिल युद्ध में नियंत्रण रेखा पार कर सकता था। लेकिन उसने ऐसा नहीं किया। उसी का परिणाम था कि पाकिस्तान की धरती का उपयोग भारत के खिलाफ न होने देने का वादा मुशर्रफ को लिखित रूप से देना पड़ा था।

पाकिस्तान चाहता है कि अफगानिस्तान में अपनी कठपुतली सरकार बनाने के लिए भारत को अफगानिस्तान के मोर्चे से दूर कर दे। जलालाबाद में भारतीय कांसुलेट के बाहर भीषण हमला करने को इसी नजरिए से देखा जा सकता है।

 श्रीकान्त शर्मा

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