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नौकरशाही और राजनैतिक नेतृत्व

प्रश्न तो बहुत से हैं। बेचारी अकेली नागपाल किस किस का उत्तर दे ? शायद कुछ लोगों ने समझा होगा कि अखिलेश यादव भी युवा हैं, शायद उन्हें भी ईमानदारी और आदर्शवाद की बीमारी हो और वह नागपाल के ईमानदारी अभियान का समर्थन करेंगे। दुर्गा शक्ति को भी शायद यह भ्रम रहा हो। लेकिन जो लोग मुलायम सिंह या उसी की तर्ज पर बनी पारिवारिक पार्टियों के चरित्र को जानते हैं, वे समझते हैं कि इस प्रकार की पार्टियों के पारिवारिक मुखिया अपने बच्चों में और चाहे हजार अवगुण बर्दाश्त करते हैं, लेकिन ईमानदारी या आदर्वाद आदि की बीमारी को सहन नहीं करते।

भारत के संविधान में राजनैतिक नेतृत्व को विधानपालिका और नौकरशाही को कार्यपालिका कहा गया है। यह विभाजन मोटे तौर पर ही स्वीकारना चाहिये। इसकी सूक्ष्म व्याख्या की शायद यहां जरुरत नहीं है। संक्षेप में भाव यह है कि विधानपालिका राज्य की नीति तय करेगी और नौकरशाही अथवा कार्यपालिका उसे व्यावहारिक स्तर पर लागू करेगी। उदाहरण के लिये विधानपालिका ने मानों तय किया है कि प्रदेश के व्यापक हितों को देखते हुये नदियों में से रेत और बजरी निकालने की अनुमति नहीं है। जो ऐसा करेगा, उसे नियमानुसार दंडित किया जायेगा। अब नौकरशाही का काम शुरु होता है। जो इस नियमका उल्लंघन करे, उसे पकडऩा और उसे दंडित करना। यह भी कहा जाता है कि नौकरशाही को अपना काम पूरी ईमानदारी और बिना किसी भय के करना चाहिये। नौकरशाही बिना भय के काम करे, इसे सुनिश्चित करने के लिये ही भारत के संविधान निर्माताओं ने, उनकी सुरक्षा के प्रावधान संविधान में ही जोड़ दिये। दुनिया के और किसी देश में ऐसा नहीं है। लेकिन अपने यहाँ सारी व्यवस्था पुख़्ता है।

इसी पुखता प्रबन्ध व्यवस्था के धोखे में कुछ लोग कई बार फंस जाते हैं और उनके साथ वही होता है जो अभी उत्त प्रदेश में दुर्गा शक्ति नागपाल के साथ हो रहा है। दुर्गा शक्ति भारतीय प्रशासनिक सेवा कैडर की हैं और दुर्घटना घटित होने के समय नोयडा में उप मंडल अधिकारी ( सिविल) के पद पर तैनात थीं। नागपाल की उम्र अभी ज़्यादा नहीं है। वे युवा हैं। इस उम्र में कुछ लोगों को ईमानदारी और आदर्शवाद की धुन सवार हो जाती है। वैसे सिद्धान्त के तौर पर यह धुन बुरी नहीं है लेकिन आज की कारपोरेट संस्कृति में इस धुन से ख़तरे पैदा होने लगे हैं। वैसे ही जैसे कभी राम नाम की धुन दिल को सुकून देती थी लेकिन आजकल लोग बाग उसे निगम बोध घाट में ही सुनने के आदी हो गये हैं। वक़्त वक़्त की बात है। वैसे तो नये युग में ईमानदारी और आदर्शवाद को लाद कर सभी जगह ‘आ बैल मुझे मार’ को चरितार्थ करना है, लेकिन कुछ जोन इस भार को लेकर चलने वालों के लिये अतिरिक्त खतरनाक माने जाते हैं। उदाहरण के लिये हरियाणा, बिहार और उत्तर प्रदेश इत्यादि। वैसे उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह की पार्टी ने अभी तक सरकारी कार्यालयों में इस प्रकार के सूचना पट नहीं लगवाये कि ईमानदारी और आदर्शवादिता का अतिरिक्त बोझ ढोने वाले कर्मचारी कार्य करते समय अतिरिक्त सावधानी का प्रयोग करें। लेकिन पुराने छँटे हुये नौकरशाह बिना लिखे ही सब सावधानियां को रट्टा लगाये हुये हैं। वैसे भी सावधानी वाला अतिरिक्त बोझ ढोने की उनकी आदत भी नहीं है। पर बेचारी दुर्गा शक्ति क्या करे? उसने नोएडा में खनन माफिय़ा पर शिकंजा कस दिया। ज़ाहिर है पार्टी को ग़ुस्सा आता। सब लोग अपने अपने काम में अपने अपने नियमें के अनुसार लगे हैं। खनन माफिय़ा के अपने नियम हैं। वह उनके अनुसार अरबों के धंधे में लगा है। उसे इसी मेहनत की कमाई से सभी राजनैतिक दलों को चन्दा देना होता है। यदि वह चन्दा ही न दे तब तो देश की राजनीति ही ठप्प हो जाये। भला बिना राजनीति के देश चल सकता है? इसलिये मापिुया के आगे देश को चलाने का सवाल है। इस राष्ट्रीय काम में जब बाक़ी सब लोग सहयोग कर रहे हैं तो तुम यह देश विरोधी हरकत क्यों करती हो? माफिय़ा की चलती मशीन में क़ानून की फच्चर! बाक़ी पुराने छँटे हुये नौकरशाह भी तो बैठे हैं। उन्हें भी भगवान ने दो आँखें दीं हैं। वे चुप हैं तो तुम ही क्यों चिल्ला रही हो?

प्रश्न तो बहुत से हैं। बेचारी अकेली नागपाल किस किस का उत्तर दे ? शायद कुछ लोगों ने समझा होगा कि अखिलेश यादव भी युवा हैं, शायद उन्हें भी ईमानदारी और आदर्शवाद की बीमारी हो और वह नागपाल के ईमानदारी अभियान का समर्थन करेंगे। दुर्गा शक्ति को भी शायद यह भ्रम रहा हो। लेकिन जो लोग मुलायम सिंह या उसी की तर्ज पर बनी पारिवारिक पार्टियों के चरित्र को जानते हैं, वे समझते हैं कि इस प्रकार की पार्टियों के पारिवारिक मुखिया अपने बच्चों में और चाहे हजार अवगुण बर्दाश्त करते हैं, लेकिन ईमानदारी या आदर्वाद आदि की बीमारी को सहन नहीं करते। कुनबा बड़ा होता है। दरबार में दूर दूर के चाचे ताऊ जमे होते हैं, बीमार काया लेकर कोई कुनबे का भरण पोषण कैसे कर पायेगा? इसलिये उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश सिंह यादव ने दुर्गा शक्ति को पहले हल्ले में ही निपटा दिया। ईमानदारी और आदर्शवादिता वैसे तो छूत की बीमारी नहीं है, इसलिये इसका दूसरे अफ़सरों में फैलने का खतरा तो बिल्कुल नहीं था, लेकिन बीमारी तो आखिर बीमारी है, देखा देखी कुछ दूसरे युवा अधिकारियों में लग जाती तो इसे संभालना मुश्किल हो जाता। सरकार चलाना आखऱि कोई हंसी खेल तो है नहीं। यह भी हो सकता था कि दुर्गा शक्ति नागपाल का उदाहरण देखकर उन अधिकारियों के भी ईमानदारी के कीटाणु जाग जाते, जिन्होंने प्रयास पूर्वक मन मसोस कर उन्हें अभी तक दबा रखा था। अखिलेश बाबू अमेरिका से पढ़ कर आये हैं। इसलिये अंग्रेजी तो जानते ही हैं। निप दी इविल इन दी वड। वैसे सुखी अखिलेश जैसे लोग ही रहते हैं। वे अंग्रेजी भी जानते हैं। इसलिये आधुनिक और प्रतिगामी हैं और माफिय़ा की भाषा भी समझते बूझते हैं। बहुभाषी होने का यही सुख है।
परन्तु लोकतंत्र लोकलाज से चलता है। इतना तो मुलायम सिंह और उनके फरजंद भी जानते हैं। इसलिये दुर्गा शक्ति नागपाल को निलम्बित करने के लिये सरकार ने उसका माफिय़ा के खिलाफ अभियान नहीं बताया। इससे सरकार की किरकरी होती। किरकरी वाली सरकार मजा नहीं देती। अत: सरकार ने दुर्गा को निलम्बित करने के लिये पंचतंत्र की कहानी नुमा किस्से का सहारा लिया। यह कहा कि एक गांव में लोग मस्जिद बना रहे थे , नागपाल ने उसकी दीवार गिरवा दी। इससे मजहबी दंगा भड़क सकता था। यह अलग बात है कि वह मस्जिद सरकारी जमीन पर बन रही थी। उच्चतम न्यायालय बार बार आदेश दे रहा है कि सरकारी जमीन पर बने मज़हबी स्थल गिरा दिये जायें। बैसे डी एम ने अपनी जाँच में कहा है कि दीवार नागपाल ने नहीं गिराई, बल्कि लोगों ने स्वयं ही वस्तुस्थिति का ज्ञान होने पर गिरा दी। बैसे सरकार ने अभी तक यह स्पष्ट करने की ज़हमत नहीं उठाई कि यदि कोई सरकारी कर्मचारी किसी अवैध मस्जिद निर्माण में उसकी दीवार गिरा देता है तो इससे मुसलमान भला हिन्दुओं के साथ दंगा क्यों करेंगे? लेकिन पार्टी में तो यह जताने की होड़ मची हुई है कि दुर्गा शक्ति को ठिकाने किसने लगाया? पार्टी के वरिष्ठ नेता नरेन्द्र सिंह भाटी यह श्रेय ख़ुद लेते हैं उनका कहना है कि महज़ 41 मिनटों में एक आई ए एस अधिकारी को ठिकाने लगा दिया।

अभी यह सारी बखेड़ा चल ही रहा था कि इस पूरे नाटक में सोनिया गान्धी ने प्रवेश किया। वे ठहरीं बड़े रुतबे वाली। छोटे मोटे के मुँह तो लगेगीं नहीं। इसलिये उन्होंने सूबे के मुख्यमंत्री को न लिख कर प्रधानमंत्री को चिठ्ठी लिखी। देखना नागपाल के साथ अन्याय न होने पाये। शुरु में छुटभैयों ने अफ़वाह उड़ा दी, देखा यह होता है ईमानदार सरकारी अफ़सर के साथ डट कर खड़ा होना। सोनिया जी का यही गुण लाजवाब है। अन्याय होता नहीं देख पातीं। लेकिन अफ़वाह आखऱि अफ़वाह होती है। अभी उड़ी ही थी कि सत्य की खोज में निकले जत्थे ने हरियाणा के आई ए एस अधिकारी अशोक खेमका की पतंग से बीच बाज़ार में काट दी। कल की ही तो बात है। सोनिया जी की प्रिय बिटिया के पति राबर्ट बढ़ेरा ने हरियाणा में ज़मीन खऱीदी थी। हरियाणा में गान्धी परिवार के लोग खरीदने के नाम पर किस प्रकार जमीन लेते हैं , इस पर ज़्यादा पन्ने काले करने की जरुरत नहीं। संजय गान्धी के समय से ही यह ड्रामा चल रहा है। हरियाणा का दुर्भाग्य है कि वह दिल्ली के नज़दीक़ है। इसलिये गान्धी परिवार के बच्चों की दृष्टि इसकी जमीन पर लगी रहती है। अशोक खेमका ने राबर्ट बढ़ेरा के नाम का आवंटन रद्द कर दिया तो उसका ख़ामियाज़ा उसे आज तक भुगतना पड़ रहा है। लेकिन न सोनिया गान्धी को अशोक खेमका की चिन्ता है और न अखिलेश यादव को नागपाल की। अलबत्ता दोनों ने आपस में छुपन छुपाई की तरह अशोक खेमका और दुर्गा शक्ति नाम का राजनैतिक खेल खेलना शुरु कर दिया है। भद्द पिटती देख सोनिया जी फिर राजमहल में चली गईं।

इस खेल में मुलायम सिंह ने भी सख़्त रुख़ अख़्तियार कर लिया था। ख़ैर उससे तो कोई क्या डरता , क्योंकि सभी को पता था कि सी बी आई को देख कर वे ख़ुद ही ढल जायेंगे। अलबत्ता हर हालत में मज़हबी सौहार्द बनाये रखने का संकल्प लेकर उत्तर प्रदेश सरकार ने दुर्गा शक्ति को आरोप पत्र देने की तैयारी कर ली है। अब सभी की आँखें इसी आरोप पत्र पर लगी हैं। सभी को डर है कि इस सरकारी आरोप पत्र में कहीं यह आरोप न हो कि — आप पर आरोप है कि आप का नाम दुर्गा शक्ति मुसलमानों की भावनाओं को आहत करता है। इस्लाम किसी देवी देवता की शक्ति को स्वीकार नहीं करता। लेकिन आपके इस प्रकार के इस्लाम विरोधी और आपत्ति जनक नाम के कारण साम्प्रदायिक दंगे होने की संभावना बनी रहती है। और भी, आप एक सरकारी अधिकारी हैं। इसलिये मुसलमानों को भी आपका नाम पढऩा , लिखना और बोलना पड़ता है। जबकि इस्लाम के सिद्धान्तों के अनुसार किसी सच्चे मुसलमान के लिये आप के नाम का उच्चारण करना भी कुफ्ऱ है। इसलिये सैक्युलर स्टेट में एक सरकारी अधिकारी होते हुये भी हिन्दु देवी देवताओं की काल्पनिक शक्तियों का प्रचार करने के अपराध में क्यों न आप पर कार्यवाही की जाये?

दुर्गा शक्ति नागपाल की असली चिन्ता यही है कि बाक़ी सब आरोपों का उत्तर तो वह दे सकती हैं , लेकिन इस आरोप का क्या उत्तर देंगीं? और इस आरोप के चलते तो सोनिया गान्धी भी अपनी चिठ्ठी वापिस ले लेंगीं, क्योंकि भारत में दुर्गा शक्ति की चिन्ता तो उन्हें भी है। वैसे दुर्गा शक्ति नागपाल को सचमुच दुर्गा का आभार जताना चाहिये क्योंकि बिहार, उत्तर प्रदेश में माफिय़ा के रास्ते का रोड़ा बन रहे अधिकारियों को मारने की परम्परा है, निलम्बन इत्यादि तो उनके लिये राजकीय चुटकुले हैं।

डॉ. कुलदीच चंद अग्निहोत्री

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