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ईमानदारी की खोज

वे भारत के संभ्रान्तों में भी संभ्रान्त हैं। सिविल सेवाओं के शीर्ष स्तर पर मौजूद भारतीय प्रशासनिक सेवा के लगभग पांच हजार प्रतिभाशाली पुरूष और महिलाएं 125 करोड़ की जनसंख्या वाले इस राष्ट्र पर शासन करते हैं। अग्रेजों ने नौकरशाहों के शीर्ष स्तर पर आईसीएस सेवा वाले अधिकारियों को लगाया था। इसे ‘लौह फ्रेम’ कहा जाता था जिस पर अंग्रेजों ने भारतीय साम्राज्य खड़ा किया था।

भ्रष्टाचार का लालच आईएएस अकादमी के गेट से ही शुरू हो जाता है। हर साल संघ लोक सेवा आयोग की प्रशासनिक सेवाओं की परीक्षा में बैठने वाले हजारों युवक-युवतियों में से लगभग 100 मेधावी युवक-युवतियों का वहां चयन किया जाता है। नए आने वाले लोगों की सूची का इंतजार उद्योगपतियों, उच्च स्तरीय प्रशासनिक अधिकारियों और सरकार के मंत्रियों के बीच बेसब्री से किया जाता है। नौकरशाही सत्ता का प्रतीक है और ये सभी लोग सत्ता से जुडऩा चाहते हैं।

अधिसंख्य भारतीय देश की आक्टोप-शक्ति की नौकरशाही से डरते है। भौंहें चढ़ाए अपने बड़े डेस्क पर बैठे आईएएस अधिकारी से कोई मिलना चाहेगा तो डर कर मिलेगा और कभी कभी रूपयों से भरे भारी पैकेट के साथ मिलेगा।

उत्तर प्रदेश में कुछ ईमानदार आईएएस अधिकारी रिश्वत लेने वाले अपने वरिष्ठ अधिकारियों से इतने नाराज हुए कि उन्होंने दोषियों को शर्मिंदा करने के लिए राज्य में तीन सबसे भ्रष्ट और अवांछनीय अधिकारियों का चुनाव करने की कोशिश की। इसके लिए गुप्त मतदान किया गया लेकिन तीन सबसे भ्रष्ट अधिकारियों के नाम घोषित नहीं किए गए। शीर्ष स्तर पर नौकरशाही का पूरी तरह से नैतिक पतन हो चुका है। जिन अधिकारियों का काम जनता के बीच है, वे मंत्रियों और पार्टी के नेताओं के आसपास मंडराते नजर आते हैं। कुछ ईमानदार हैं जो सबसे अधिक नुकसान झेलते हैं।

एक आईएएस अधिकारी को बर्खास्त करना वास्तविक रूप से असंभव है। इसलिए आमतौर पर राजनेता उन्हें तबादले या निलम्बन का डर दिखा कर अधिकारी को झुकाने की कोशिश करते हैं। यहां तक राजनेता उन्हें अनैतिक या गैर-कानूनी आदेशों की पालना करने के लिए भी मजबूर करते हैं।

दुर्गा नागपाल का हाल का उदाहरण है। 2010 बैच की प्रशासनिक सेवा की इस ईमानदार अधिकारी ने देश के सबसे अधिक जनसंख्या और कुप्रबंधित बेलगाम खनन माफिया के खिलाफ सख्त कदम उठाया। आईएएस द्वारा ईश्वरीय स्तर की हैसियत खोने का भी यह एक अन्य उदाहरण है।

इस ईमानदार अधिकारी के खिलाफ क्षेत्र में साम्प्रादायिक तनाव भड़काने का आरोप लगा कर निलम्बित कर दिया गया है। वैसे यह समझाने की जरूरत है कि माफिया को राष्ट्र को लूटने से रोकना किस प्रकार से साम्प्रदायिक तनाव बढ़ाना हो सकता है। अपने ही चक्रव्यूह में फंसी यूपी सरकार ने इस महिला अधिकारी पर एक मस्जिद की नवनिर्मित दीवार गिराने का आरोप लगाया है। नवनिर्मित इसलिए कहा जा रहा है क्योंकि इसे कुछ दिन पहले सार्वजनिक भूमि पर खड़ा किया गया था और उसे रमजान के महीने में मुसलमानों द्वारा नमाज अता करने के लिए प्रयोग किया जाता था।

यदि इस कहानी में कुछ सच्चाई हो तब भी इस अधिकारी द्वारा उठाया गया कदम गलत नहीं था। उच्चतम न्यायालय के 2010 के आदेशों के मुताबिक चाहे कैसा भी मामला हो, सार्वजनिक भूमि पर किसी भी धर्म के किसी भी प्रकार के ढांचे के निर्माण की अनुमति नहीं है। यदि उस अधिकारी ने मस्जिद की दीवार गिराई भी तो क्या उसने केवल कानून की पालना नहीं की।

खनन माफिया कथित रूप से समाजवादी पार्टी के स्थानीय नेता नरेन्द्र भाटी द्वारा नियन्त्रित किया जाता है। नरेन्द्र भाटी समाजवादी पार्टी का 2014 के लोकसभा चुनावों के लिए इस क्षेत्र से घोषित उम्मीदवार है। उसका हाल यह है कि समाजवादी पार्टी का नेतृत्व तो नागपाल को निलम्बित करने में अपनी भूमिका के आरोप का खंडन कर रहा था और एक विडियो क्लिप में भाटी डींग हांकते हुए सुनाई दे रहा था..”दुर्गा शक्ति नागपाल को निलम्बित कराने में मुझे केवल 41 मिनट लगे हैं।”

अल्पसंख्यकों के वोटों के लिए तुष्टिकरण इतना बढ़ गया है कि जिन लोगों को हम शासन करने के लिए चुनते हैं वे इसके लिए पूरी तरह अंधे हो चुके हैं। ये मुसलमानों को मूर्ख मानते हैं और उनमें मुसलमानों का तुष्टिकरण करने की होड़ लगी है। अपना भ्रष्टाचार छिपाने के लिए वे माफियाओं को बचाने में लगे हैं। ये राजनेता अपने रास्ते की रूकावट बनने वाले ईमानदार अधिकारियों को यातनाएं देने के लिए सामान्य रूप से सांठगांठ कर लेते हैं। वे यह तो नहीं कह सकते कि उन्होंने दुर्गा को इसलिए निलम्बित किया क्योंकि वह उनकी लूट में व्यवधान बन रही थी, इसलिए सुविधाजनक साम्प्रदायिक कहानी बना दी गई और उसे फैला दिया गया।

अपने बुरे स्वार्थों की रक्षा के लिए लूट फैलाने वाले लोग उससे भी आगे जा कर साम्प्रदायिक तनाव पैदा कर देते जबकि वहां कोई साम्प्रदायिक तनाव है ही नहीं। स्थानीय मुसलमान, राज्य वक्फ बोर्ड और पुलिस व प्रशासन सभी ने दुर्गा को क्लीन चिट दे दी, लेकिन अखिलेश सरकार के लिए झुकना तो घमंड की बात है।

उत्तर प्रदेश में बेईमान आईएएस अधिकारी राजनीतिक नेताओं के गुस्से का कोप-भाजन नहीं बने। राजनेता चाहे किसी भी पार्टी के हों, उन्होंने बेईमान अधिकारियों को कभी अपना निशाना नहीं बनाया, जबकि ईमानदार अधिकारी हमेशा उन्हें कांटें की तरह चुभते रहे।

उत्तर प्रदेश की जनता को अखिलेश यादव से बहुत उम्मीदें थीं, लेकिन दुर्गा नागपाल को निलम्बित कर उन्होंने अपने करोड़ों समर्थकों और प्रशंसकों को निराश कर दिया। आओ, हम सब इस बहादुर युवा अधिकारी के साथ उनके इस संघर्ष में खड़े हों और उन्हें विश्वास दिलाएं कि इस लड़ाई में वह अकेली नहीं हैं। क्या हम ऐसा कर सकते हैं? यदि नही तो मुझे विश्वास है कि न तो दुर्गा नागपाल पहला मामला है और न ही अन्तिम मामला है। यदि उन्हें वापस एसडीएम, नोएडा के पद पर बहाल किया जाता है तो माफिया फिर अपना रंग दिखाएगा और कुख्यात गैंगस्टरों के खिलाफ कोई भी कार्यवाही करने से रोकेगा।

दीपक कुमार रथ

दीपक कुमार रथ

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