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अब क्यों नहीं बनते देश भक्ति के फिल्मी गीत

जो मुल्क अपनी आजादी की जंग और उसमें शहीद जवानों की शहादत को भूलाने लगता है, उसकी आजादी उतनी ही खतरे में पड़ती जाती है। आखिर इंटरनेट और अगली सदी की ओर तेज रफ्तार से भागती जिंदगी में आने वाली युवा पीढ़ी को देश की आजादी की खातिर हंसते-हंसते मौत को गले लगाने वाले शहीद भगत सिंह, चंद्रशेखर, राजगुरू की कुर्बानी बताने और इस युवा पीढ़ी में देशप्रेम की भावना जागृत करने के लिए क्या किया जा रहा है। अफसोस, दूरदर्शन और आकाशवाणी ने भी अपनी इस जिम्मेदारी से कन्नी काट ली है। लगभग हर रेडियो स्टेशन और दूरदर्शन पर दिन भर रोमांस और मस्ती भरे गाने खूब सुनाई देते हैं, लेकिन देश भक्ति के गीतों का कोई कार्यक्रम पेश नहीं होता। बॉलीवुड मेकर्स भी अब युवाओं को लुभाने और सौ-दो सौ करोड़ की कमाई की चाह में न तो देश भक्ति की फिल्में बनाते हैं और न ही उनकी ऐसी रोमांटिक, बोल्ड, प्रेम कहानियों पर बनी फिल्मों में देश भक्ति के गाने की गुंजाइश ही रहती है।

सिल्वर स्क्रीन से ही नहीं, बल्कि रेडियो और स्मॉल स्क्रीन से भी देशभक्ति का जज्बा जगाते फिल्म के गीत गायब हो चुके हैं। पिछले एक दशक के दौरान रिलीज हुई हिंदी फिल्मों के संगीत पर नजर डालें, तो ढूंढे भी ऐसा कोई गाना शायद ही मिले जिसे सुनकर आजादी की जंग में अपना सर्वस्व न्योछावर करने वाले उन शहीदों की शहादत को पल भर के लिए याद किया गया हो। आलम यह है कि बरसों से हर साल 15 अगस्त या फिर 26 जनवरी के दिन चुनिंदा रेडियो स्टेशनों पर अगर देश भक्ति का जज्बा जगाते चंद ऐसे गाने सुनने को मिल भी जाएं तो भी वे गाने 70-80 के दशक के दौरान रिलीज हुई फिल्मों या फिर और उससे भी ज्यादा वक्त पहले रिलीज हो चुकी फिल्मों के होते हैं। आलम यह है कि प्राइवेट रेडियो स्टेशन तो छोड़ ही दीजिए, अब तो आकाशवाणी और दूरदर्शन के किसी स्टेशन से भी 30-40 मिनट की अवधि का ऐसा कोई नियमित कार्यक्रम प्रस्तुत नहीं किया जाता, जिसमें देशभक्ति की भावना जगाते गीत सुनने को मिल जाएं।

एक ओर जहां आकाशवाणी और दूरदर्शन जैसे सरकारी माध्यम भी अब देशभक्ति गानों के कार्यक्रमों को ठंडे बस्ते में डाल चुके हैं , वहीं हमारे पड़ोसी देश पाकिस्तान में आज भी दिन की शुरूआत, सबसे पहले देशभक्ति के गानों और ऐसे कार्यक्रमों के साथ होती है, जिनमें वतन की खातिर अपनी जान तक कुर्बान करने का जज्बा पेश किया जाता है। पाकिस्तानी रेडियो से देशभक्ति के गानों के कार्यक्रम तो प्रसारित होते ही रहते हैं, बल्कि दिन में कम से कम एक ऐसा कार्यक्रम भी पेश होता है जिसमें मुल्क की हिफाजत के जज्बे को पेश किया जाता है।

हमारे यहां आलम यह है कि स्कूल, कॉलेज में पढऩे वाले ज्यादातर छात्र रोमांस और मौज-मस्ती के नए-पुराने गाने गुनगुनाते मिल जाएंगे। अगर देशभक्ति गानों की बात की जाए तो ले देकर कोई मनोज कुमार की किसी फिल्म का एकाध गाना ही सुना सके। पिछले दिनों दक्षिणी दिल्ली के एक पब्लिक स्कूल में 15 अगस्त का जश्न मनाया गया। इस कार्यक्रम में छात्रों ने जमकर फिल्मी गाने गाए। लेकिन जब उन्हें मंच पर देशभक्ति या शहीदों को समर्पित सिर्फ पांच गाने गुनगुनाने के लिए आमंत्रित किया गया तो कोई भी छात्र देशभक्ति के तीन से ज्यादा गाने नहीं बता पाया। ऐसे में कार्यक्रम को आगे चलाने के लिए देशभक्ति के गानों की ऑडियो टेप चलाई गई, जिसे सुनकर छात्रों ने उन गानों पर अपने होंठ हिलाकर ऐसा दर्शाया जैसे कि राष्ट्रभक्ति के गाने वे ही गा रहे हों।

दरअसल, आज की युवा पीढ़ी के बीच देशभक्ति के गाने लोकप्रिय न होने की बड़ी वजह है कि ऐसे गाने अब साल में सिर्फ दो दिन राष्ट्रीय पर्वों पर ही एक-दो घंटे के लिए सुनाई देते हैं। अगर आकाशवाणी या दूरदर्शन पर प्रतिदिन सुबह देशभक्ति और शहीदों को समर्पित गानों के नियमित कार्यक्रम पेश किए जाएं, तो शायद युवा पीढ़ी अपने स्कूल-कॉलेज में देशभक्ति के जज्बे को बढ़ाते और शहीदों को समर्पित गीतों को गुनगुनाती नजर आए।

लोकप्रिय फिल्म-गीतकार जावेद अख्तर कहते हैं: ”सिनेमा अब करोड़ों का खेल हो गया है… अपनी लागत की भरपाई करने के लिए फिल्म निर्माता वही फिल्में बनाएंगे, जो बॉक्स ऑफिस पर चले। उन्हें मुनाफा भी कमा कर दे। देशभक्ति की फिल्में बनाना फिल्मकारों को अब जोखिम भरा कदम लगने लगा है… न तो ऐसी फिल्में बनाने के लिए सरकार की ओर से कोई आर्थिक सहायता मिलती है… और न ही मल्टीप्लेक्स संचालक इन फिल्मों को प्रदर्शित करने के लिए राजी होते हैं। ऐसे में इन फिल्मों को बनाना घाटे का सौदा हो गया है।”

जावेद का तर्क है कि ”अगर देशभक्ति, आजादी की जंग, या शहीदों पर फिल्में नहीं बनेंगी तो गीतकार क्या करेंगे। गीतकार निर्माता के अनुरोध पर वही गाने लिखते हैं, जो कहानी का हिस्सा बन सके।”

देशभक्ति का जज्बा बढ़ाते कुछ सदाबहार गीत
1. ए मेरे वतन के लोगों, जरा आंख में भर लो पानी…
2. अब कोई गुलशन न उजड़े, अब वतन आजाद है…
3. जहां डाल-डाल पर सोने की चिडिय़ा करती हैं बसेरा…
4. मेरा रंग दे बसंती चोला, ओ मॉय रंग दे बसंती चोला…
5. ऐ वतन, ऐ वतन, हमको तेरी कसम, तेरी राह में जान…
6. है प्रीत जहां की रीत सदा, मैं गीत वहां के गाता हूं…
7. मेरे देश की धरती सोना उगले, उगले हीरे मोती…
8. उस मुल्क की सरहद को कोई छू नहीं सकता, जिस मुल्क..
9. ऐ मेरे प्यारे वतन, ऐ मेरे बिछड़े चमन, तुझ पे दिल कुर्बान…
10. सिकंदर भी आए, कलंदर भी आए, ना कोई रहा है, ना…
 चंद्र मोहन वशिष्ठ

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