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फिर रूलाया प्याज ने

वनस्पतिक नाम (अलियम सेपा एल) वाली यह जिंस आज 50 रुपए प्रति किलो की सीमा को लांघ गई है, इसकी समीक्षा करने के लिए बैठकें हो रही हैं, कार्य योजनाएं बन रही हैं, प्रेस के लिए बयान जारी किए जा रहे हैं और इस पर नजर रखने के लिए टीमें बन गई हैं। सफल, नेफेड जैसी बाजार समितियों और केंद्रीय भंडारों व नागरिक आपूर्ति विभागों से ऐसे बिक्री केंद्र खोलने के लिए कहा जा रहा है, जो सबको बिना किसी मुनाफे के और झुग्गी-बस्तियों में इमदादी दरों पर प्याज बेचें। प्याज के निर्यात पर रोक लगाए जाने और आयात किए जाने की मांगें आ रही हैं और लोग (प्याज के आंसू) रो रहे हैं। जब इलैक्ट्रोनिक मीडिया के पास कोई ब्रेकिंग न्यूज नहीं होती तो इसी को खबर बना दिया जाता है। इनके साथ प्याज बेचते ठेलीवालों और किसी तरह गुजारा करती गृहणियों के दृश्य दिखा दिए जाते हैं।

फिर भी यह स्तंभ इस विषय को गहराई से परखने की कोशिश करेगा। कुछ मौकों पर प्याज की कीमतें क्यों बढ़ जाती हैं, खास कर मानसून के दौरान और साल के अंत में? क्या वाकई यह संभव है प्याज की जमाखोरी करके देशभर में उसकी कीमतों को मनमाने ढंग से बढ़ाया जाए? क्या आजादपुर के व्यापारी कीमतों पर नियंत्रण करते हैं? क्या जब आवक ज्यादा होती हैं तब या जब कीमतें ऊंची होती हैं, तब? इस सौदे में कमाई किसकी होती है, घाटा तो निश्चित रूप से ग्राहक ही उठाता है।

आइए, पहले तो प्याज को लेकर कुछ घरेलू सच्चाइयों की बात करें। हर साल तीन फसलें होती हैं, रबी, खरीफ और खरीफ के बाद की। रबी में 60 प्रतिशत का उत्पादन होता है, बाकी खरीफ और खरीफ के बाद की फसलों में 20 प्रतिशत प्रत्येक का। इसे ले जाने में जितना समय लगता है, उसका भी प्याज की कीमत पर असर पड़ता है, क्योंकि प्याज की खपत पूरे देश में होती है। हर मौसम में और हर राज्य में इसे पहुंचाने में काफी प्रयास करना होता है। महाराष्ट्र, गुजरात और कर्नाटक की रबी की फसल मार्च से मई के बीच में तैयार होती है। देश के प्याज उत्पादन का ज्यादातर हिस्सा इन्हीं राज्यों में होता है। इस प्याज का भंडारण किया जा सकता है और यह मॉनसून के शुरू तक चलता है। पूर्व खरीफ के प्याज तमिलनाडु, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश से अगस्त में आने लगता है। इसके बाद महाराष्ट्र और गुजरात से सितंबर और अक्टूबर में आता है। देश के बाकी हिस्सों उत्तर प्रदेश, पंजाब, पश्चिम बंगाल और ओडिशा का प्याज नवंबर और दिसंबर में आता है। खरीफ के बाद की फसल महाराष्ट्र और गुजरात से जनवरी से मार्च तक आती है। देश के पहाड़ी क्षेत्रों से भी हर साल दो फसलें आती हैं – रबी की फसल जून-जुलाई में और गर्मी की फसल सितंबर में। इस तरह हम देखते हैं कि पूरे साल देश भर में कहीं न कहीं से प्याज उपलब्ध होता रहता है और जहां तक इसके ग्राहकों का सवाल है, प्याज और आलू देश भर में बिकने वाली आम जिंस है। हमारे देश में दस लाख ऐसी दूकानें हैं, जहां साल के बारहों महीने प्याज बिकता है।

अगर इसकी वैश्विक तुलना की जाय तो हम प्याज के मामले में कहां ठहरते हैं? हमारी एक साल की प्याज की पैदावार 150 से 160 लाख टन है और हम दुनिया भर का 20 प्रतिशत प्याज पैदा करके दूसरे नंबर पर हैं। पहले नंबर पर चीन आता है, जो दुनिया के कुल उत्पाद का 30 प्रतिशत प्याज पैदा करता है। इसका मतलब यह भी हुआ कि दुनिया के कुल प्याज उत्पादन का आधा इन दो देशों में पैदा होता है और खपत भी यहीं होती है। लेकिन यह कोई ऐसी बात नहीं है जिस पर गर्व किया जा सके, क्योंकि उत्पादकता के मामले में हम दुनिया के अग्रणी देशों से बहुत पीछे हैं। अमेरिका में इसकी उपज प्रति हैक्टेयर 56 मीट्रिक टन है, नीदरलैंड्स में 52 टन, जबकि भारत और चीन में यह क्रमश: 14 और 24 टन प्रति हैक्टेयर है।

इसलिए दूसरी फसलों की तरह इन फसलों और जिंसों की उत्पादकता का यह अंतर हमारे लिए बड़ी चुनौती है। हम यह कैसे सुनिश्चित करें कि सिंचाई, रोपण की सामग्री और फसलों की व्यवस्था सही हो रही है, ताकि इस क्षेत्र में भी हम कोई मुकाम हासिल कर सकें। यहां पर हमें देश भर के विभिन्न क्षेत्रों के उत्पादन और उत्पादकता के आंकड़ों से कुछ राहत मिल सकती है। महाराष्ट्र के औरंगाबाद और गुजरात के पोरबंदर जिले में उत्पादकता क्रमश: 65 और 40 मीट्रिक टन प्रति हैक्टेयर है, जो कि अच्छी खासी है। इनके बाद मध्यप्रदेश के शाजापुर का नंबर आता है, जहां यह 35 मीट्रिक टन प्रति हैक्टेयर है। लेकिन ये अपवाद इस सचाई को ही साबित करते हैं कि हमने उस व्यवस्था को अपनाने में कहीं न कहीं लापरवाही बरती है, जिससे भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद की विशेषज्ञताओं का इस्तेमाल किसान अपने खेतों में कर सकें।

कुछ सवाल पूछे जा सकते हैं? अब तक ऐसा क्यों नहीं हो पाया है? जवाब सुनकर आपकी आंखों में आंसू आ सकते हैं। क्योंकि सब्जी के मामले में वानिकी के प्रतिमान लागू नहीं किए जा रहे हैं। लेकिन अब सब्जी उत्पादन को भी वानिकी के क्षेत्र में शामिल कर लिया गया है।

(लेखक भारत सरकार के कृषि मंत्रालय में संयुक्त सचिव हैं। इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के अपने व्यक्गित विचार हैं।)

 

संजीव चोपड़ा

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