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पेंशन बिल पर मिला भाजपा का दिल कांग्रेस से

पिछले नौ साल से लंबित पेंशन बिल पर भारतीय जनता पार्टी ने कांग्रेस को संसद में समर्थन देने से यह आसार बने हैं कि इस बार मानसून सत्र में इसकी नैया पार लग जाएगी। हालांकि वाम दलों सहित तृणमूल कांग्रेस का इसको लेकर विरोध कायम है। उधर भाजपा ने साफ किया कि वह पेंशन बिल के समर्थन में है, क्योंकि उसने जो संशोधन सुझाए थे, उन्हें सरकार ने मान लिया है। प्रस्तावित बीमा बिल का मामला अभी अटका है।

पेंशन बिल पर केंद्र सरकार ने दो कदम पीछे और एक कदम आगे चलने की रणनीति अपनाते हुए भाजपा की इस मांग को मान लिया है कि पेंशन में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश यानी एफडीआई की अधिकतम सीमा 26 फीसदी रहेगी। इसके अलावा यह इंतजाम करने पर सहमति हो गई कि जो लोग अश्योर्ड रिटर्न चाहते हैं, उन्हें इसकी अनुमति होगी। भाजपा ने जिस तरह से इस बिल पर अपना समर्थन दिया है, उसमें शेष विपक्ष को दाल में कुछ काला दिख रहा है। पेंशन बिल को लेकर कांग्रेस-भाजपा में कोई डील होने की चर्चा भी संसद के गलियारों में है। ऐसी कोई डील की बात को औपचारिक तौर पर देश के वित्त मंत्री पी. चिदंबरम और भाजपा नेता यंशवत सिन्हा दोनों नकारते हैं। दोनों पार्टियों में इस बिल पर सहमति, चिदंबरम के साथ संसद में नेता सुषमा स्वराज, अरुण जेटली और यशवंत सिन्हा के साथ हुई बैठक के बाद बनी। हालांकि माक्र्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) की नेता वृंदा कारत का कहना है कि भाजपा औऱ कांग्रेस के बीच यह डील का हिस्सा है। तमाम विरोध के बीच भाजपा जनविरोधी आर्थिक नीतियों से संबंधित कानूनों को पारित कराने के लिए कांग्रेस के साथ खड़ी हो जाती है।

अगर यह बिल पारित हो जाता है तो देश का पेंशन क्षेत्र प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के लिए खुल जाएगा। इसे लेकर कई सालों से गहरी आशंकाएं जताई जा रही है। इसके साथ ही पेंशन राशि को शेयर बजार से जोडऩे पर भी तमाम अर्थशास्त्रियों, यूनियनों, संगठनों ने गहरी चिंता जताई थी। शुरू में केंद्र सरकार ने पेंशन क्षेत्र में 49 फीसदी प्रत्यक्ष विदेशी निवेश करने का प्रस्ताव किया था, जिसे ससंद की स्थायी समिति ने घटाकर 26 फीसदी करने को कहा था। इस बिल का नाम है पेंशन फंड रेगुलेरिटी एंड डेवलपमेंट अथॉरिटी बिल। इसे भारत के पेंशन क्षेत्र में एक नियामक गठित करने के लिए लाया गया था। जिस समय यह बिल बना था यानी 2005, उस समय इसमें विदेशी कंपनियों को 49 फीसदी निवेश करने की छूट देने का प्रावधान था। इस बिल के पीछे यह मकसद बताया गया था कि इससे भारत में औपचारिक पेंशन या सामाजिक सुरक्षा योजनाओं का दायरा बढ़ेगा। उस समय तर्क दिया गया कि भारत में 12 फीसदी से भी श्रमिकों कम के पास पेंशन या सामाजिक सुरक्षा योजना है। इन सब तर्कों की मदद से पेंशन के क्षेत्र में विदेशी कंपनियों के लिए दरवाजे खोलने की कवायद शुरू हुई। इसका तगड़ा विरोध हुआ और सरकार को इसे ठंडे बस्ते में डालना पड़ा। अब जब केंद्र सरकार का शासनकाल समाप्ति की ओर है तो वह तेजी से ठंडे बस्ते में पड़े तथाकथित आर्थिक सुधारों से जुड़े तमाम बिल पारित कराने की जुगत में है। इस बिल को भाजपा का समर्थन मिलना वैसे भी अस्वाभाविक नहीं है क्योंकि इसकी पूरी प्रक्रिया भाजपा के नेतृत्व वाली केंद्र की राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के समय हो चुकी थी। पेंशन फंड रेगुलेरिटी एंड डेवलपमेंट अथॉरिटी का निर्माण 2003 में हो गया था लेकिन इसे कोई शक्तियां नहीं थी। अगर यह बिल संसद के मानसून सत्र में पारित होता है तो इस प्राधिकरण को इस क्षेत्र को नियंत्रित करने की शक्तियां मिलेंगी। इसके बाद केंद्र और राज्य सरकार के कर्मचारी एक नई योजना-नई पेंशन योजना-में अपने वेतन का एक हिस्सा देना होगा और शेष हिस्सा सरकार लगाएगी। यह योजना गैर-सरकारी कर्मचारियों के लिए भी है। इस स्कीम के जरिए जमा हुई धनराशि का प्रबंधन एस्सेट मैनेजमेंट कंपनियां करेंगी, जो इसे स्टॉक और बॉन्ड में निवेश करेंगी।

इस तरह से इस बिल का घोषित लक्ष्य पेंशनयाफ्ता की बचत को बढ़ाना बताया गया। हालांकि पेंशन के क्षेत्र में सक्रिय लोगों, इनकी यूनियनों, भाजपा रहित विपक्षी दलों का कहना है कि बिल आम कर्मचारी की बचत पर कंपनियों को जुआ खेने की इजाजत देने जैसा है।

पहली बार वर्ष 2005 में संसद में जब इस बिल को पेश किया गया था तो इसका कड़ा विरोध हुआ था। वाम दल सहित बाकी विपक्षी दलों ने भी इसका विरोध किया था। समर्थन न मिलने की वजह से यह गिर गया और फिर इसे 2011 में केंद्र सरकार ने दोबारा पेश किया। इस समय भी वाम दल विरोध में हैं। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के सांसद डी. राजा का कहना है कि यह बिल बहुत खतरनाक है क्योंकि देश के श्रमिकों-कर्मचारियों के पैसे पर कंपनियों को अपनी किस्मत चमकाने की खुली छूट मिल जाएगी।

 

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