ब्रेकिंग न्यूज़ 

दांव पर पद्मश्री

गिरिराज किशोर कहते हैं कि कांग्रेस के लोग सन्ï 1947 से पहले तक गांधी के अनुगामी बने रहे, लेकिन आजादी की घोषणा होते ही उन्होंने रंग बदलना शुरू कर दिया। गांधी की बुनियादी तालीम, भाषा-नीति, हिंद स्वराज की दृष्टि से ग्रामोत्थान का कार्यक्रम, विकेंद्रीकरण, पंचायती राज, खादी और कांग्रेस का समापन आदि सबका विरोध कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व ने किया।

लोग कहते हैं कि कथाकार गिरिराज किशोर बैठे-बिठाए अपनी जान को कोई न कोई रोग लगा लेते हैं। कानपुर की आईआईटी में लगाया तो वहां पांच साल लड़ते हुए गुजारे। फिर साहित्य अकादमी में लगाया, और फिर ज्ञानपीठ से किताबें वापस ले लीं। और अब पद्मश्री की रार जान को लगा ली है। सो, लोग गिरिराज किशोर के लिए चिंतित हैं। ऐसा नहीं है कि वे कोई झगड़ालू व्यक्ति हैं। दरअसल वे अहिंसक प्रतिरोध में विश्वास रखते हैं। कई बार बर्दाश्त नहीं होता तो अपने आपको समझाते हैं, लेकिन जब तर्क और भावना संतुलन में आ जाते हैं तो उनके लिए अपने को धोखा देना कठिन हो जाता है। ‘गांधी की नीलामी से मुक्ति’ के जरिये गिरिराज किशोर की यही छवि पाठकों के सामने पहुंचती है। महात्मा गांधी से संबंधित सामग्री पिछले डेढ़ दशक में कई बार या तो चोरी या फिर नीलाम हुई है। सन् 1995 में ‘पहला गिरमिटिया’ के लिए सामग्री जुटाने के लिए वे कई बार विदेश यात्राओं पर गए तो लंदन में उच्चायुक्त डॉ. लक्ष्मीमल सिंघवी मिले थे। उन दिनों गांधी के बहुमूल्य पत्र नीलाम होने जा रहे थे। सिंघवी से गिरिराज किशोर की बात हुई तो इसे लेकर वे चिंतित होकर सक्रिय हुए और उस नीलामी को रुकवा दिया।
गिरिराज किशोर बताते हैं कि सन् 2009 में जब गांधी जी के पत्र और टीपू सुल्तान की तलवार नीलाम हो रहे थे तो विजय माल्या ने उन्हें खरीदा था। उस समय चर्चा गरम थी कि विजय माल्या शराब बनाकर बेचते हंै। उन्होंने पत्र खरीदकर गांधी के मदिरा उन्मूलन के सिद्धांत को लांछित किया है, लेकिन कितनी विरोधाभासी बात है कि जब गांधी जी के खून की बूंदें मिट्टी और घास पर गिरीं तो एक आर्मी अफसर ने उस घास को निकालकर अपने पास रख लिया था। इस बार वह घास और मिट्टी भी नीलामी में शामिल थी। वह सामग्री दक्षिण के किसी अध्यापक के पास थी। उसके माध्यम से नीलामी के लिए भेजी गई। उस फौजी के परिजनों और विजय माल्या में भेद करना पड़े तो आप किसे क्या कहेंगे?

गांधी से जुड़े स्मृति चिह्न, पत्र, सामान और पांडुलिपियों को नीलामी से बचाने में असफल रहने के बाद थक-हार कर गिरिराज किशोर ने अंतत: भारत सरकार से मिली पद्मश्री को दांव पर लगा दिया, लेकिन कोई लेखक या संगठन इस मामले में उनके साथ नहीं आया। इस पर वे कहते हैं कि साहित्य जगत कई धड़ों में बंटा हुआ है। सबसे बड़ा धड़ा वामपंथियों का है। गांधी की सार्वभौम स्वीकृति ने दक्षिणपंथी और वामपंथी, दोनों तरह के लोगों को उनके विरुद्ध कर दिया है, लेकिन गांधी हंसकर हमेशा कहते रहे कि मैं माक्र्सवादियों से बेहतर माक्र्सवादी हूं। आज गांधी को दोनों पक्ष नजरअंदाज करते हैं। बंटे होने के बावजूद एक बड़ा वर्ग है, जो माक्र्सवाद का विभाजित अनुकरण करता है, जिसकी वजह से भारत में सबसे अधिक नुकसान मजदूरों का ही हुआ। माक्र्सवाद एक दूसरी तरह का प्रगतिशील अधिनायकत्व है। सीमित स्तर पर श्रम के मूल्य की बात करके उत्पादन के प्रश्र को पीछे कर दिया गया, जिसका नतीजा यह हुआ कि एक के बाद एक भारत भर में टेक्सटाइल मिल्स की खास तौर से और दूसरी मिलों की कब्रगाहें बनती चली गईं। जमीन से न जुड़कर पूरा वामपंथ मशीनों से जुड़ता रहा। माक्र्सवाद एक बौद्धिक आंदोलन है, जिसका जन्म पुस्तकालय में हुआ था। उसके नेताओं का भी सामान्य जन से अनौपचारिक रिश्ता नहीं बन पाया। जहां बना भी, वहां कालांतर में टूट गया। वे उसको यहां की धरती में रोप नहीं सके। यह धरती माक्र्सवाद के लिए उपजाऊ थी, पर मार्क्सवादी नेताओं के लिए उपजाऊ साबित न हो सकी।

गिरिराज किशोर कहते हैं कि संस्कृति और इतिहास को बेचना अपनी परंपरा और प्रेरणा-स्रोतों को बेचना है। तख्त-ए-ताउस और कोहिनूर से लेकर अनेक ऐतिहासिक लैंडमार्क आज बाहर हैं। कुछ लोगों का मानना है कि इससे क्या होता है? देश का प्रचार ही तो होता है। व्यक्ति के रूप में हम अपने घर की परंपरागत अंगूठी भी बाहर नहीं जाने देते। दक्षिण अफ्रीका में गिरिराज किशोर ने देखा था कि भारतीय मूल का लगभग हर परिवार अपने बुजुर्गों का वह बक्सा, जो वे साथ लेकर भारत से दक्षिण अफ्रीका आए थे, उसके साथ उनकी सब चीजें संभालकर रखता है और बाहर से आने वालों को वे लोग दिखाते हैं कि भारत से आते समय हमारे दादा-परदादा इसी बक्से में रामायण का गुटका, माला और कुछ कपड़े लेकर आए थे। जो कागज मिलते थे, सब इसी बक्से में डाल देते थे। उनका पहला गिरमिट भी उसी में रखा है। उसे वे न किसी को देते और न ही बेचते हैं। यह परिवारों की बात है। देश भी एक वृहद् परिवार है। क्या इस वृहद् और महान परिवार की जिम्मेदारी नहीं कि अपनी इस असुरक्षित होती संपदा को बचाकर रखे! कोई और करे न करे, गिरिराज किशोर अकेले ही गांधी के लिए लड़ रहे हैं, जिसके लिए उनके विवेक और साहस को नमन।

गिरिराज किशोर कहते हैं कि कांग्रेस के लोग सन् 1947 से पहले तक गांधी के अनुगामी बने रहे, लेकिन आजादी की घोषणा होते ही उन्होंने रंग बदलना शुरू कर दिया। गांधी की बुनियादी तालीम, भाषा-नीति, हिंद स्वराज की दृष्टि से ग्रामोत्थान का कार्यक्रम, विकेंद्रीकरण, पंचायतीराज, खादी और कांग्रेस का समापन आदि सबका विरोध कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व ने किया। गांधी जिस खतरे को देख रहे थे, आज वे सब बातें दानवाकार रूप में देश के सामने हैं। ऐसे में गांधी से जुड़ी चिट्ठियों और सामान की बिक्री एक सोची-समझी सामूहिक साजिश-सी लगती है, जिसका आगाज बहुत पहले हो चुका था। अब उसकी जड़ें बहुत गहरे तक जम चुकी हैं। उसी का नतीजा है कि गांधी और उनके समकालीनों को पाठ्यक्रम तक से हटाया जा रहा है, जिससे उनके सिद्धांतों का लोगों के जीवन में पुनर्प्रवेश ही न होने पाए। अगर स्मृति को विस्मृत करना हो तो बच्चों के पाठ्यक्रम से ऐसे पाठ निकाल दो, जो त्याग, बलिदान और सेवा जैसे मूल्यों को पुख्ता करते हों।

हर पत्र का उत्तर देने की गांधी की प्रतिबद्धता और इस तरह सामान्य जन के सम्मान की परंपरा का निर्वहन, इतने बड़े अमले के बावजूद, सत्ताधारियों, राजनीतिज्ञों और नौकरशाहों से संभव नहीं हुआ। जनता के पत्रों से उनकी रद्दी की टोकरियां भरती गईं। कांग्रेसी सत्ताधारियों द्वारा जनसंपर्क की समाप्ति का यहीं से उद्घोष हो गया। सत्ताधारी वर्ग अलग हो गया और सामान्य जन संवादहीनता के अंधेरे में हाथ-पैर मारने के लिए बाध्य कर दिया गया। गांधी से जुड़ी चीजों की नीलामी के विरुद्ध गिरिराज किशोर की आवाज तूती की आवाज बनकर रह गयी, तभी उन्होंने पद्ïमश्री लौटाने जैसा कठोर कदम उठाया। जब गिरिराज किशोर जैसे लोगों की यह स्थिति है, जिन्हें राष्ट्रपति से सम्मानित होने का गौरव प्राप्त है तो सामान्य आदमी के बारे में तो कहना ही क्या!

गिरिराज किशोर बताते हैं कि सीपीएम सांसद ज्योतिर्मय बसु का सामान्य आदमी से पत्र-संवाद सतत चलता था। पत्र आया है तो जवाब जाएगा। पी.सी. जोशी के साथ भी यही था। वे इस बात के लिए सरकार को आगाह कर रहे हैं कि यह संवादहीनता ही जन असंतोष का कारण बन जाती है। कहा जाता है कि होस्ïनी मुबारक की जन साधारण के साथ संवादहीनता ही मिस्र में जन-असंतोष का कारण बनी। यह संवेदनहीनता हमारे जनतंत्र में भी लगातार बढ़ रही है। 12 जून, 2012 के ‘जनसंदेश टाइम्स’ में प्रणब मुखर्जी ने कहा था कि उन्होंने राष्ट्रपति भवन के दरवाजे आम लोगों के लिए खोल दिए हैं। गिरिराज किशोर भी एक लेखक और आम आदमी ही हैं। उन्होंने सन्ï 2007 में मिली पद्मश्री को गांधी जी के स्मृति चिह्नों की लंदन में हुई नीलामी के विरोध में वापस करने के लिए राष्ट्रपति से समय मांगने के लिए कई चिट्ठियां लिखीं, पर उन पत्रों की पावती तक नहीं मिली। ऐसे में राष्ट्रपति भवन के आम आदमी के लिए खुले उन द्वारों में प्रवेश करने की अनुमति का तो सवाल ही नहीं उठता। गिरिराज किशोर राष्ट्रीय महत्व के एक मुद्दे पर राष्ट्रपति से संवाद ही तो चाहते थे। चाहते थे कि राष्ट्रपति द्वारा मिला सम्मान उन्हीं को वापस किया जाए, क्योंकि वह सम्मान कोई दूसरा नहीं ले सकता! सबसे बड़ा आश्चर्य तो गिरिराज किशोर को यह लगता है कि गांधी से संबंधित रचनात्मक कार्यों में लगी संस्थाओं ने भी नीलामी के सवाल पर कोई आवाज नहीं उठाई। संस्थाएं शायद समझती हैं कि यह उनका काम नहीं या फिर वे सरकार की नाराजगी से डरती हैं, जबकि भय को गांधी सबसे बड़ा शत्रु समझते थे।

इस पूरे प्रकरण में गिरिराज किशोर के अनेक मित्रों ने सहयोग किया। सबसे बड़ा सहयोग तो कमल मोरारका ने दिया। उस निराशा के क्षण में उन्होंने गांधी से जुड़ी सामग्री लंदन में 17 अप्रैल, 2012 की नीलामी में खरीदी और देश का सम्मान बचाया। वरिष्ठ पत्रकार संतोष भारतीय के माध्यम से गिरिराज किशोर को उनसे बात करने का अवसर भी मिला। गिरिराज किशोर के लिए यह एक बड़ी घटना थी कि जिस बात के खिलाफ उन्होंने आवाज उठाई, उसकी पूर्ण आहुति कमल मोरारका ने दी।

गिरिराज किशोर को डरबन (दक्षिण अफ्रीका) में गांधी जी के नाम से संग्रहालय देखकर खुशी हुई थी। वहां निरंतर शोध की प्रक्रिया चलती रहती है। उस संग्रहालय ने गांधी और कैलनबैक के पत्र सन् 1995 के आस-पास खरीदकर उनका प्रकाशन किया था। अपने भारत में जो गांधी संस्थाएं हैं, उनके पास भी समुचित संग्रहालय नहीं हैं। गांधी स्मारक निधि में हैं, पर वहां शोध के लिए बजट ही नहीं है। सरकार ने भी कोई गांधी संग्रहालय नहीं बनाया, जिसमें उनसे संबंधित सारी सामग्री संजोकर रख सके ताकि देश-विदेश के शोधार्थी वहां आकर काम कर सकें। जो सामग्री या स्मृति विदेश से लाते हैं, उन्हें आर्काइव में दाखिल दफ्तर कर दिया जाता है। वहां जाकर उसे पुन: प्राप्त करना आसान नहीं। यह देखकर गांधी पर काम करने वाले लेखक की हैसियत से गिरिराज किशोर को बहुत दुख होता है। वे कस्तूरबा गांधी पर काम करते हुए वांछित सामग्री के लिए दर-दर भटक रहे हैं। और सामग्री है कि कभी यहां और कभी वहां लगातार नीलाम होकर बिक रही है। ऐसे में गिरिराज किशोर जैसा लेखक अगर गुस्से में पद्मश्री लौटाने की बात कह बैठे तो राष्ट्रपति और भारत सरकार को उनका दर्द समझना चाहिए, न कि इस तरह उनके इस कदम को भी उपेक्षा की मार से बेअसर कर दें!

बलराम

консульство австрии в харьковекомпьютеры lenovo купить

Leave a Reply

Your email address will not be published.