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किश्तवाड़ की हिंसा देश की संप्रभुता और अखंडता के लिए संकट पैदा कर रही हैं कुछ ताकतें: राजनाथ सिंह

”सरकार को चाहिए कि पाकिस्तान के साथ बातचीत तुरंत बंद करे। मेरा मानना है कि पाकिस्तान स्थित भारतीय राजदूत को भी वापस बुला लिया जाना चाहिए” भारतीय सीमा पर पाकिस्तानी सैनिकों द्वारा किए गए कुकृत्य पर भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने यह बात कही। उदय इंडिया के संपादक दीपक कुमार रथ से राजनाथ सिंह के बातचीत के कुछ अंश : पांच भारतीय सैनिकों की हत्या पर आपकी क्या प्रतिक्रिया है?
सीमा पर हमारे सैनिकों को बलिदान देना पड़ रहा है तो इसके लिए कोई जिम्मेदार है, तो हमारी सरकार है। पाकिस्तान अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रहा है। जो भी पिछली घटनाएं हुईं हैं, जैसे हेमंत और सुधाकर नाम के दो सैनिकों का सिर धड़ से अलग और शवों को बुरी तरह कुचलकर पाकिस्तानी सेना द्वारा वापस किया जाना, उसी समय यदि हमारी सरकार ने सीमित तरीके से कठोर प्रतिक्रिया दी होती तो मुझे लगता है, पांच जवानों को अपना बलिदान नहीं देना पड़ता। यह दुस्साहसिक कदम पाकिस्तान उठा नहीं पाता। लेकिन दुर्भाग्य यह है कि सरकार कोई भी ऐसा कदम नहीं उठा रही है। जो संंदेश दिया जाना चाहिए पाकिस्तान को, यह सरकार नहीं दे पा रही है। पिछले कई सालों में मुंबई हमले और सीरियल ब्लास्ट हुए, लेकिन सरकार सिर्फ चेतावनी देकर छोड़ दे रही है। भारत और पाकिस्तान के बीच जो कूटनीतिक रिश्तें हैं, उसे पुर्नपरिभाषित करने की जरुरत है। इस परिस्थिति में भारत को पाकिस्तान से अपना राजदूत वापस बुला लेना चाहिए। हम संदेश देने के बजाय, बातचीत करने को तैयार रहते हैं । हमारे प्रधानमंत्री को यह तुरंत घोषणा करने की जरुरत है कि जब तक हालात सामान्य नहीं होते, भारत पाकिस्तान से कोई बातचीत नहीं करेगा।

नवाज शरीफ के प्रधानमंत्री बनने के बाद आपने भी बधाई दिया था …
किसी को भी जब नई जिम्मेदारी मिलती है तो बधाई देना स्वभाविक है। लेकिन सवाल है कि पाकिस्तान आखिर किसके नियंत्रण में है- वहां की सरकार की नियंत्रण में, वहां की सेना के नियंत्रण में या आईएसआई के नियंत्रण में, इसके संबंध में कुछ नहीं कहा जा सकता। मैं इतना कह सकता हूं कि जहां सरकार का नियंत्रण होना चाहिए, वहां सेना और आईएसआई का नियंत्रण है।

क्या नवाज शरीफ असहाय हैं?
असहाय हैं नवाज शरीफ, क्योंकि चाहकर भी वे कुछ कर नहीं सकते। वे चाहकर भी कुछ कर पाएंगे, इसका विश्वास हमें नहीं है। इसमें चीन की क्या भूमिका है?
इस सच्चाई को नकारा नहीं जा सकता कि चीन और पाकिस्तान के बीच घनिष्टता है। इसे नजरअंदाज भी नहीं किया जा सकता है। जब कभी भी कोई रणनीति बनानी हो या कोई कदम उठाना हो, इस बात को ध्यान में रखते हुए ही भारत को कोई कदम उठाना चाहिए।

पाकिस्तान, चीन के साथ मिलकर भारत के खिलाफ लड़ रहा है। ऐसे में हमारी क्या रणनीति होनी चाहिए? भारत को किन देशों के साथ अपनी नजदीकियां बढ़ानी चाहिए?
वो रणनीति तो हमारे दिमाग में है, लेकिन मैं उस रणनीति का खुलासा करना नहीं चाहता हूं, क्योंकि इस तरह की रणनीति को सार्वजनिक कभी नहीं करनी चाहिए।

लेकिन आरोप यह भी है कि गुजरात में आपकी सरकार ने चीन के साथ घनिष्ट व्यवसायिक संबंध बनाए हैं?
बिजनेस तो भारत का पाकिस्तान के साथ भी चल रहा है। दुनिया के सभी देशों के साथ भारत का कुछ न कुछ बिजनेस है। लेकिन बिजनेस की बात दूसरी है। स्थिति जैसी भी बनेगी, उसे देखकर सरकार को चाहिए कि प्रमुख दलों को विश्वास में लेकर कोई भी कदम उठाए।

हाफिज सईद ने लाल किला को उड़ाने की धमकी दी है, उसके लिए किस तरह के कदम उठाने की जरुरत है?
उसके बावजूद भी हमारे प्रधानमंत्री कह रहे हैं कि पाकिस्तान के साथ हम बातचीत करेंगे। इससे उनके हौसले लगातार बुलंद होते जा रहे हैं।

प्रधानमंत्री ने भी कोई वादा नहीं किया है कि न्यूयार्क में होने वाले शिखर सम्मेलन में वे नवाज शरीफ से मिलेंगे या नहीं ….
लेकिन देश की जानकारी में तो यही बात है और हमें अब तक की जो पूरी जानकारी है, उसके अनुसार भारत सरकार बातचीत करने के लिए पूरी तैयारी कर रही है। देश की मंशा को समझते हुए प्रधानमंत्री को साफ कर देनी चाहिए कि पाकिस्तान के साथ ऐसा कुछ नहीं होगा। हम बातचीत नहीं करेंगे।

नवाज शरीफ से प्रधानमंत्री को मिलना चाहिए या नहीं?
बिल्कुल नहीं मिलना चाहिए, कोई भी बातचीत नहीं करनी चाहिए।

तो बिना बातचीत के विवाद कैसे सुलझेगा?
जब 1947 में भारत का विभाजन हुआ और 1948 में दोनों देशों के बीच पहला युद्ध हुुआ, तब से लेकर अब तक तो सिर्फ बातचीत ही हो रही है। लेकिन समस्या का समाधान कभी नहीं हुआ।

रक्षामंत्री एंटनी द्वारा संसद में दिए गए बयान से देश में क्या संदेश जाएगा?
उनका बयान दुर्भाग्यपूर्ण है। मुझे लगता है कि आधी अधूरी सूचनाओं के आधार पर ही उन्होंने बयान दिया था। दूसरा कारण यह हो सकता है कि वोट बैंक राजनीति को ध्यान में रखकर, किसी ने स्टेटमेंट तैयार कर दिया हो और एंटनी ने उसे पढ़ दिया हो।

ये भाजपा का एंटनी के ऊपर आरोप है…
हां। इस संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता।

क्या आपको लगता है कि सरकार और सेना के बीच किसी तरह की दूरी है?
नहीं, इस संबंध में मैं कुछ कहना नहीं चाहूंगा, क्योंकि आज भी सरकार रणनीति बनाती है और उसे सेना अनुशरण करती है। सेना पर संदेह नहीं किया जा सकता।

मेरा प्रश्र है कि सेना की सुझावों को सरकार नहीं मानती है, दोनों के बीच कितना सामंजस्य है?
हालांकि सेना के सुझावों की मुझे जानकारी नहीं है, इसलिए मैं इस पर कमेंट नहीं करुंगा।

जम्मू और कश्मीर में बड़े पैमाने पर हिंसा हो रही है। ऐसी क्या वजह है कि हर साल वहां ऐसी स्थिति उत्पन्न हो जाती है?
इसे अब सिर्फ सांप्रदायिक हिंसा के रुप में नहीं देखा जा सकता। मैं यह मानता हूं कि अब देश की संप्रभुत्ता का सवाल खड़ा हो गया है। किश्तवाड़ में जिन समूहों ने हमला किया है, उनके हाथ में पाकिस्तान के झंडे थे। इसलिए इसे एक सामान्य हिंसा की घटना मानकर नहीं देखा जाना चाहिए। यहां देश की संप्रभुत्ता के ऊपर एक सवालिया निशान लगाया जा रहा है। देश में संकट पैदा करने की कुुछ ताकतें कोशिश कर रही हैं। इस रुप में इसे लिया जाना चाहिए।

इसका दोषी किसे माना जाए, उमर अब्दुल्ला सरकार को या केन्द्र सरकार को?
हम इसके लिए दोनों सरकारों को दोषी मानते हैं।

जम्मू हवाई अड्डे पर विपक्ष के नेता अरुण जेटली को रोका गया, इससे क्या संदेश जाएगा?
वहां की जमीनी हकीकत को वे छिपाना चाहते थे और कुछ नहीं। क्या, प्रतिपक्ष का नेता उस स्थान पर भी नहीं जा सकता, जहां देश की संप्रभुुत्ता और अखंडता के लिए संकट खड़ा किया जा रहा हो? क्या छिपाना चाहती है सरकार?

किश्तवाड़ की घटना का असर जम्मू के अन्य हिस्सों में भी फैलता जा रहा है …
बिल्कुल, यह बहुत बड़ा संकट है और सरकार को इसे गंभीरता से लेनी चाहिए।

सरकार को किस तरह का कदम उठाना चाहिए?
कठोर से कठोर कदम उठाना चाहिए।

अभी अमरनाथ यात्रा का समय है। क्या उसे बंद कराने का षडयंत्र तो नहीं है हाल की घटना?
हो सकता है। इस संभावना को भी नकारा नहीं जा सकता। संसद में आने वाले किस बिल का भाजपा समर्थन करेगी और किसका विरोध?
खाद्य सुरक्षा बिल का कुछ संशोधनों के साथ हम समर्थन करेंगे। उसके बाद भूमि अधिग्रहण बिल में हम कुछ संशोधन रखकर उसका समर्थन करेंगे।

आरोप है कि खाद्य सुरक्षा बिल को लेकर भाजपा और कांग्रेस के बीच तल्खी है?
नहीं, ऐसी कोई बात नहीं है। देखा जाए तो अटल बिहारी वाजपेयी के शासन में ही 2 रूपये किलो गेहूं और 3 रूपये किलो चावल वाली अंत्योदय योजना की शुरूआत की गई थी। यह भी उसी प्रकार की योजना है। लेकिन यह योजना, उतनी अच्छी योजना नहीं है। फिर भी, गरीबों के लिए जो भी कदम उठाया जाएगा, चाहे उसका पूरा लाभ उन्हें नहीं मिलता हो, फिर भी उसका समर्थन भारतीय जनता पार्टी करेगी ही।

खाद्य सुरक्षा बिल को भाजपा किस रुप में देखती है?
मैं मानता हूं कि कांग्रेस लंबे समय तक इस देश में हुकुमत की है। 50-55 साल शासन करने के बाद भी कांग्रेस ने देश की ऐसी हालत बनाकर रखी है कि 67 प्रतिशत लोगों को भोजन देने के लिए खाद्य सुरक्षा बिल लाने की जरुरत पड़ रही है। यह एक विडंबना है। लेकिन जो भूखे हैं, जो आज अन्न के लिए तरस रहे हैं, उन्हें इस लाभ से अछूता नहीं रख सकते।

क्या भाजपा चुनाव से पहले प्रधानमंत्री के पद के लिए नरेन्द्र मोदी के नाम की घोषणा करेगी?
संसदीय बोर्ड की बैठक के बाद, इस पर फैसला लिया जाएगा और उचित समय पर ही यह फैसला लिया जाएगा।

मोदी के नाम पर संघ की क्या राय है?
इन सब मामलों पर संघ हस्तक्षेप नहीं करता। संघ क्या चाहता है और क्या नहीं चाहता, इसकी मुझे जानकारी नहीं है।

विकास के मुद्दे पर जितना मोदी लोकप्रिय हैं, उतना ही शिवराज सिंह चौहान भी। फिर मोदी ही क्यों?
जो रिपोर्ट आ रही हैं, उससे जाहिर है। सारे मुख्यमंत्रियों में मोदी वरिष्ठ भी हैं।

सिर्फ वरिष्ठ हैं या फिर विकास में भी आगे हैं?
हर राज्य का अपना एक आर्थिक और सामाजिक ढ़ांचा होता है। उस आधार पर विकास होता है। लेकिन इसमें कौन आगे है और कौन पीछे, यह नहीं कहा जा सकता।

एक तरफ मोदी ने टोपी पहनने से मना कर दिया तो दूसरी तरफ शिवराज सिंह ने उसे पहन लिया। पार्टी का एक नेता टोपी पहनता है और दूसरा मना करता है। इस पर पार्टी का क्या रवैया है?
यह सब ऐसे मुद्दे हैं, जिन पर कोई बहस नहीं होनी चाहिए।

एनडीए में किसी नए दल के शामिल होने की कोई उम्मीद है?
हां, पूरी संभावना है। यह गठबंधन चुनाव से पहले या चुनाव के बाद भी हो सकता है।

चुनाव के बाद कौन भाजपा से गठबंधन कर सकता है?
इन सब बातें का खुलासा अभी नहीं किया जा सकता।

पार्टी में सुब्रह्मण्यम स्वामी के कई विरोधी होने के बावजूद, उन्हें पार्टी में शामिल करने की क्या वजह है?
स्वामी अपने विचारधारा के हैं। जनसंघ में भी रहे हैं। एनडीए में भी सहयोगी रहे हैं। इसलिए उनकी पार्टी के प्रस्ताव को हमलोगों ने स्वीकार किया है और उनकी पार्टी का भाजपा में विलय कर दिया गया।

भाजपा में उनकी क्या भूमिका होगी?
जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे हैं, इसलिए उनकी भूमिका तो रहेगी ही। चुनावों से लेकर हर जगह उनकी भूमिका रहेगी।

क्या आप उन्हें अपनी टीम में शामिल करेंगे?
स्वभाविक है, वो वरिष्ठ नेता हैं, राष्ट्रीय कार्यसमिति में तो रहेंगे ही। महामंत्री या …नहीं… नहीं… इतना वरिष्ठ आदमी महामंत्री बनेगा?

देश के मुसलमानों, दलितों और ओबीसी का बड़ा तबका भाजपा के साथ नहीं है। ऐसे में 2014 का चुनाव भाजपा कैसी जीतेगी?
कौन कहता है कि दलित और पिछड़ा वर्ग भाजपा के साथ नहीं है। ओबीसी पहले भी हमारे मुख्यमंत्री रहे हैं और ओबीसी अभी भी हमारे मुख्यमंत्री हैं। हमारे नरेन्द्र मोदी भी तो ओबीसी हैं। हमारे दो-दो मुख्यमंत्री ओबीसी हैं। हमें सबका समर्थन मिलता है। अगर समर्थन नहीं मिलता तो भाजपा इतनी बड़ी पार्टी नहीं बनती।

नवीन पटनायक को साथ लाने का कोई विचार है?
इस सवाल का जवाब तो वही दे सकते हैं, मैं नहीं दे सकता।

नीतीश कुमार को वापस लाने के लिए भाजपा की तरफ से किसी तरह की पेशकश …
नहीं… किसी से कोई बातचीत नहीं हुई।

अमित शाह ने अयोध्या में फिर से राम मंदिर की बात की। क्या भाजपा फिर से अपने मूल मुद्दे पर वापसी करेगी?
उन्होंने वहां प्रार्थना की। कोई भी हिंदू होगा तो चाहेगा कि वह जहां पूजा करता है वहां मंदिर बन जाए, मुसलमान चाहेगा कि सजदा करने वाले स्थान पर मस्जिद बन जाए, ईसाई चाहेंगा कि चर्च बन जाए। उन्होंने अपनी इच्छा रामलला के सामने रखी थी।

मोदी के आने के बाद, माना जाता है कि भाजपा राम मंदिर जैसे अपने मूल मुद्दे को उठाएगी?
जिन मूल मुद्दों की बात की जाती है, हम अपनी विचारधारा के अनुसार उस पर आज भी कायम हैं। कोर इश्यू को लेकर चलने का यह मतलब नहीं होता कि हम इंसान और इंसान में भेद कर रहे हैं।

2014 के चुनाव में भाजपा का एजेंडा क्या होगा?
एजेंडा हमारा तय हो रहा है। इलेक्शन मैनिफेस्टो कमिटी बना दी गई है।

‘नई सोच और नई उम्मीद’ के पोस्टर पर जो विवाद हो रहा है, उसके बारे में आप क्या कहेंगे?
पार्टी की तरफ से अभी कोई पोस्टर नहीं लगवाया गया है।

भाजपा ऑफिस से लेकर हैदराबाद की सभा तक में यही पोस्टर लगा है…
ठीक है, लगा होगा। लोगों ने लगवाया होगा। लोगों का प्यार है। उस में हम क्या कर सकते हैं। हमारा एजेंडा बनेगा और पोस्टर भी देश भर में लगेंगे।

दिल्ली में विजय गोयल को लेकर विवाद सामने आ रहे हैं…
नहीं… नहीं… ऐसी कोई बात नहीं है। कहीं कोई समस्या होगी भी तो नितिन गडकरी इस समय दिल्ली के प्रभारी हैं, जो जानकारी देंगे, उसके आधार पर निर्णय लिया जाएगा।

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