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नेताजी को उचित सम्मान मिले

नेताजी को उचित सम्मान मिले

By दीपक कुमार रथ

हाल में अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष ने भविष्यवाणी की कि 2016 में भारत वृद्धि दर और रोजगार उत्पादन में चीन को पीछे छोड़ देगा। बेशक, इस खुशखबरी से देश में महत्वाकांक्षाएं और उफान लेंगी और सुधारों में तेजी आएगी। यह भविष्यवाणी देश के आर्थिक माहौल में नए नेतृत्व द्वारा लाए बदलाव की भी गवाह है। फिर, हमारे गणतंत्र दिवस पर ओबामा की मौजूदगी भी बेहद महत्वपूर्ण है, जिससे दुनिया के दो बड़े लोकतंत्रों के बीच स्वाभाविक लाभकारी रिश्तों का आगाज होगा। लेकिन, इन सुखद खबरों के बीच मैं नेताजी सुभाषचंद्र बोस और आजाद हिंद फौज की ओर ध्यान खींचना चाहूंगा। यह मुद्दा आजादी के वक्त से देश को झकझोरता रहा है।

आजाद हिंद फौज के जांबाज देशभक्तों के प्रति कांग्रेस नेतृत्व के नजरिए की एक झलक ‘सत्ता हस्तांतरण के दस्तावेज (1942-47), खंड-7, 1976’ में मिलती है। मामला आजाद हिंद फौज के जवानों को सेना में दोबारा बहाली का था। उस वक्त 9 जनवरी 1946 को जवाहरलाल नेहरू ने एक भाषण में कहा कि आजाद हिंद फौज के सिपाही औद्योगिक सहकारिता संस्थाओं और गांवों के पुनर्निर्माण जैसे सार्वजनिक कार्य के ही काबिल हैं। लेकिन, इससे भी झटका देने वाला रवैया उन्हें सेना से निकालने की अपमानजनक शर्तें थीं। मार्च 1948 में केंद्रीय विधानसभा में नेहरू ने अपने भाषण में आजाद हिंद फौज के सिपाहियों को सेना में वापस लेने की मांग खारिज कर दी और दलील दी, ”वे लड़ाई से लंबे समय से अलग हैं।’’ इसका एक अर्थ यह भी था कि देश के लिए अपनी जान की बाजी लगा देने वाले इन बहादुरों की सेवा की आजाद भारत में कोई जरूरत नहीं है।

सेना के तब के मुख्य कमांडर औचिनलेक और अंतरिम सरकार के रक्षा मंत्री सरदार बलदेव सिंह के सामने तीन सवाल थे। एक, आजाद हिंद फौज के सभी सिपाहियों को जेल से रिहा किया जाए। दूसरे, उनके बकाया वेतन-भत्तों का भुगतान और तीसरे, नवगठित भारतीय सेना में उनकी बहाली। आखिरी सवाल को कांग्रेस ने छूटते ही खारिज कर दिया था। बाकी दो सवालों पर बलदेव सिंह ने जवाहरलाल नेहरू की अगुआई वाली अंतरिम कैबिनेट से आग्रह किया कि औचिनलेक को सिफारिश भेजी जाए, क्योंकि उन्हें केद्रीय विधानसभा में इन सवालों का सामना करना होगा।

औचिनलेक ने इन मांगों को फौरन खारिज कर दिया। इन मुद्दों पर बात आगे बढ़ाने पर वायसराय वॉवेल ने वीटो लगाने की धमकी दी। लंदन में ब्रिटिश सरकार ने वॉवेल के रुख का समर्थन किया। औचिनलेक ने भी इस्तीफे की धमकी दी। अंग्रेज  आश्वस्त थे कि इन मुद्दों पर एक भी कांग्रेसी मंत्री इस्तीफा नहीं देगा।

कांग्रेस के नेता आजाद हिंद फौज की राजनैतिक ताकत कम करने की कोशिश में चुपचाप लगे थे। 9 जनवरी 1946 को अपने भाषण में नेहरू ने यह भी कहा कि आजाद हिंद फौज के सिपाहियों को राजनीति से दूर रखा जाएगा। यहां तक कि 1950 में सरदार पटेल ने भी कहा था कि सुभाषचंद्र बोस की आजाद हिंद फौज में गए अधिकारियों और सिपाहियों की सेना में बहाली के मसले पर अंतरिम सरकार को बेहद सतर्क रवैया अपनाना चाहिए।

आजाद हिंद फौज के सिपाहियों और अधिकारियों की विभिन्न जेलों से रिहाई के बाद फौरन उन्हें उनके गांव रवाना कर दिया गया। वे हारी हुई सेना के सिपाही थे और ज्यादातर को यह अफसोस था कि नेताजी को किया वादा पूरा नहीं हो सका। उन्हें उसी देश में अपमान और गुमनामी की जिंदगी जीनी पड़ी, जिसके लिए उन्होंने खून बहाया था। हैरान कर देने वाला सवाल यह भी है कि उन्हें 1974 तक स्वतंत्रता सेनानी भी नहीं माना गया। आजादी के सत्ताइश साल बाद सरकार ने उन्हें 150 रु. महीने की मामूली पेंशन देने के योग्य माना।

विडंबना देखिए कि आजाद हिंद फौज की शानदार विरासत को धूमिल करने में कांग्रेस नेताओं ने विदेशी आक्रांताओं का साथ दिया। नेताजी ने बहुत सोच-समझकर अंडमान और निकोबार द्वीप समूह को स्वराज और शहीद द्वीप नाम दिया था, लेकिन आजाद भारत सरकार ने पहला कदम ही यही उठाया कि उनके पुराने अंग्रेजों के दिए नाम बहाल कर दिए जाएं।

आजाद हिंद फौज के खिलाफ कार्रवाई की दूसरी मिसालें भी हैं। सबसे शर्मनाक तो सिंगापुर में शहीद स्मारक को तोडऩा था। उसे 6 सितंबर 1945 की दोपहर माउंटबेटन के आदेश से ब्रिटिश सैनिकों ने उड़ा दिया था। इससे देश भर में हुई प्रतिक्रिया के बाद नेहरू मार्च 1946 में सिंगापुर गए, ताकि  ‘आजाद हिंद फौज को मदद करने वाले भारतीयों की जानकारी जुटाई जाए’ और आजाद हिंद फौज के स्मारक को तोडऩे की अंग्रेजों की कार्रवाई का जायजा लिया जाए।

विडंबना देखिए कि वे माउंटबेटन के मेहमान थे और वे उन्हें ढ़हाए गए स्मारक को गर्व से दिखाने ले गए। मारी सीटोन ने अपनी किताब ‘पंडित जी: जवाहरलाल नेहरू की शख्सियत’ में याद करती हैं कि सिंगापुर में माउंटबेटन ने नेहरू पर कोई पाबंदी नहीं लगाई थी, लेकिन एक रियायत की मांग की थी कि वे स्मारक पर फूल न चढ़ाएं। नेहरू राजी हो गए लेकिन बाद में चुपके से स्मारक पर गुलाब का गुलदस्ता चढ़ा आए।

नेताजी और आजाद हिंद फौज की गरिमा घटाने में सिर्फ अंग्रेज ही आगे नहीं थे। 11 फरवरी 1949 को एक गोपनीय मेमो में सरकार ने ‘सिफारिश की कि यूनिट लाइंस, कंटीन, रिक्रिएशन रूम के क्वार्टर गार्ड्स जैसे प्रमुख जगहों पर नेताजी की तस्वीरें न लगाई जाएं’। नेहरू ने नेताजी की मृत्यु के बारे में सच्चाई उजागर करने में खास दिलचस्पी नहीं दिखाई।

आजादी के बाद कांग्रेस या किसी भी पार्टी के नेता को आधुनिक भारत के निर्माण में नेताजी की अहम भूमिका की खास याद नहीं आई। अब क्या नई राष्ट्रवादी मोदी सरकार उन्हें उचित सम्मान देने का कर्तव्य निभाएगी?

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