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अमेरिकी नीति: बचे रहेंगे दाऊद और सईद

दाऊद और सईद पाकिस्तान के रणनीतिक संपत्ति हैं। उन्हें पाकिस्तान में इसलिए वरदहस्त प्राप्त है, क्योंकि उन्होंने पाकिस्तान में अमेरिकी या वैश्विक हितों पर सीधा हमला अभी तक नहीं किया है। यह दोनों अमेरिका के नाक के नीचे रहेंगे और सुरक्षित रहेंगे। अमेरिका ने दाऊद और सईद के खिलाफ उस तरह का रवैया नहीं अपनाया, जिस तरह उसने ओसामा-बिन-लादेन, अयमान अल जवाहिरी और मुल्ला उमर के खिलाफ अपनाया।

दाऊद इब्राहिम और हाफिज सईद पर पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के विशेष दूत शहरयार खान के बयान की दो तरह से व्याख्या की जा सकती है।

पहला, खान का बयान कुछ नहीं है, सिवाय इसके कि नवाज शरीफ की असैन्य सरकार, भारत से तनाव कम करने का दिखावा कर रही है, जो कि फायदे से ज्यादा उसे नुकसान ही पहुंचाएगा। 6 अगस्त को भारतीय सीमा में घुसकर 5 सैनिकों की हत्या जैसे पाकिस्तानी कुकृत्य के खिलाफ भारत में फैले घृणा के कारण, खान के मीठी बातों के पीछे गुप्त एजेंडा (जिसका खुलासा आम भारतीय के लिए नया नहीं है) का विस्तार है। खान मीठी बातों से भारत को मनाने की कोशिश कर रहे हैं,

ताकि अगले महीने न्यूयार्क में होने वाली शिखर सम्मेलन में नवाज शरीफ

और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की वार्ता में कोई रूकावट न हो।

दूसरा, अचानक दिल परिवर्तित करते हुए पाकिस्तान सरकार ने भारत के साथ द्विपक्षीय रिश्तों में नयी गर्माहट भरने का प्रयास किया है। शहरयार खान जैसे वार्ताकार से दाऊद और हाफिज सईद के बारे में बयान दिलवाकर, यह जताने की कोशिश की है कि पाकिस्तान भारत की चिंताओं से पूरी तरह इत्तेफाक रखता है।

इस लेखक को कोई शंका नहीं है कि पहली व्याख्या जमीनी हकीकत के ज्यादा करीब है और दूसरे को जल्दी और बेहतर तरीके से रद्द किए जाने की जरुरत है। शहरयार खान के इस बयान के पीछे जरुर नवाज शरीफ का समर्थन होगा। लेकिन शहरयार खान के इस बयान से पाकिस्तानी सेना पूरी तरह संतुष्ट होगी, यह असंभव है।

इसके विपरीत, अगर रावलपिंडी (पाकिस्तानी सेना का मुख्यालय) ने इस्लामाबाद से इसका स्पष्टीकरण मांग लिया होगा, तो आश्चर्य की बात नहीं। आने वाले कुछ दिनों में शहरयार खान अपने पद पर

बने रहते या नहीं, यह देखने की बात होगी। खान के कथन को तभी दृढ़ माना जा सकता है, जब पाकिस्तानी सेना शहरयार खान के बयान से इत्तेफाक रखे। लेकिन निश्चित तौर पर ऐसा नहीं होगा।

दिलचस्पी का दूसरा बिंदू यह है कि एक सप्ताह में ही रावलपिंडी और इस्लामाबाद के बीच रिश्तों में इतनी गर्माहट कैसे आ गयी। नवाज शरीफ पाकिस्तान के पधानमंत्री के रुप में अपने तीसरे कार्यकाल के कुछ महीनों बाद ही अपने प्रभावशाली निर्णय के चरम पर हैं। जनरल अशफाक परवेज कयानी का कार्यकाल नवंबर में खत्म होने के बाद, पाकिस्तान को नए सेना प्रमुख की जरुरत होगी। 28 नवंबर 2010 को जनरल कयानी को तीन साल का सेवा विस्तार दिया गया था।

तीसरे कार्यकाल के शुरूआत में ही नवाज शरीफ के लिए यह सबसे चुनौतीपूर्ण कार्य है। कहा जाता है कि अतीत भविष्य को बताती है। इतिहास बताता है कि सेना प्रमुख के साथ संबंधों के लेकर नवाज शरीफ को हमेशा चुनौतियों का सामना करना पड़ा है। शरीफ के दोनों पूर्ववर्ती कार्यकाल पाकिस्तानी सेना द्वारा खत्म किए गए। दोनों कार्यकालों के दौरान उन्हें तीन सैन्य प्रमुखों से विवाद रहा। शरीफ के अहम का सबसे ज्यादा टकराव परवेज मुशर्रफ के हुआ, जिन्हें खुद शरीफ ने सैन्य प्रमुख बनाया था। मुशर्रफ ने 12 अक्टूबर 1999 को एक अहिंसक तख्ता पलट में नवाज शरीफ को पद से हटा दिया था।

यह देखा जाना चाहिए कि दाऊद और सईद पर शहरयार खान का बयान, पाकिस्तान की पृष्ठभूमि के खिलाफ है। जनरल कयानी के रहते यदि शहरयार खान प्रधानमंत्री के विशेष दूत रहते हैं, तो यह माना जा सकता है कि शरीफ को कयानी का विश्वास हासिल है, जिसकी संभावना कम है। तब पाकिस्तानी नीतियां, खासकर रक्षा एवं विदेश नीति पर रावलपिंडी की मुहर लग चुकी होगी। इसमें शरीफ के व्यक्तित्व की मजबूती वाली कोई बात नहीं होगी।

शहरयार खान के बयान को समझने के लिए भारत को दो ‘अ’ पर ध्यान देने की जरुरत है – आर्मी और अमेरिका। इसमें सेना की बात हो चुकी है। शहरयार खान द्वारा भारत से संबंधित दिए गए बयान में सबसे महत्वपूर्ण कारक अमेरिका है।

इसके पीछे भारत के दो कुख्यात आतंकी दाऊद और सईद हैं। यह दोनों आतंकवादी संयुक्त राष्ट्र के नोटिस के बावजूद पाकिस्तान में इसलिए फल-फूल रहे हैं, क्योंकि अमेरिका ने इनसे संबंधित कभी सवाल नहीं पूछे। दाऊद के मसले पर अमेरिका द्वारा कार्रवाई की मांग लगभग दशक भर पुरानी है। 1993 में मुंबई सीरियल ब्लास्ट में संलिप्तता के कारण, 17 अक्टूबर 2003 में दाऊद को ‘वैश्विक आतंकवादी’ घोषित कर, अमेरिका में उसकी संपत्तियों को जब्त कर लिया गया था। लेकिन दाऊद पाकिस्तानी सैनिकों की सुरक्षा में कराची के पॉश क्लिफ्टन एरिया में आराम की जिंदगी गुजार रहा है। फिर भी पाकिस्तानी सरकार, पाकिस्तान में उसकी उपस्थिति से हमेशा इंकार करती रही है।

2008 में मुंबई हमले का मास्टरमाइंड होने के कारण 2 अप्रैल 2012 को अमेरिका ने लश्कर-ए-तैयबा के संस्थापक हाफिज सईद के ऊपर 10 मिलियन अमेरिकी डॉलर का ईनाम घोषित किया था। तब से सईद अमेरिका को गिरफ्तार करने की चुनौती देता रहा है। इस संबंध में 9 अगस्त 2013 को शहरयार खान के बयान पर ध्यान देने की जरुरत है। शहरयार खान ने कहा – ”मैं नहीं जानता कि अब दाऊद कहां है। वह पहले पाकिस्तान में था। मुझे विश्वास है कि वह पाकिस्तान छोड़ चुका है। मुझे अहसास होता है कि वह संयुक्त अरब अमीरात में है। उसे ढूंढ़ा जाना चाहिए। हम उसके जैसे गैंगेस्टर को पाकिस्तान को लक्ष्य बनाने और दूसरे देशों के खिलाफ काम करने की अनुमति नहीं दे सकते। नवाज शरीफ पाकिस्तान में रह रहे अपराधियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई करने के पक्षधर हैं।”

हाफिज सईद पर बोलते हुए शहरयार खान ने कहा – ”पाकिस्तान को 26/11 के मास्टरमाइंड हाफिज सईद को पकडऩे की जरुरत है और हम उसे लाहौर की सड़कों पर खुलेआम घुमने की इजाजत कभी नहीं दे सकते। हमें ऐसे लोगों को नियंत्रण में लाने की जरुरत है। नवाज शरीफ को यह अनुभूति है कि सईद के खिलाफ कुछ किए जाने की जरुरत है। भारत के विरुद्ध भड़काऊ बयानों के आधार पर हमें उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई करनी है।”

दाऊद और सईद पाकिस्तान के रणनीतिक संपत्ति हैं। ऐसे में उनके खिलाफ पाकिस्तान द्वारा किसी भी तरह की कार्रवाई किए जाने की उम्मीद नहीं की जानी चाहिए। उन्हें पाकिस्तान में इसलिए वरदहस्त प्राप्त है, क्योंकि उन्होंने पाकिस्तान में अमेरिकी या वैश्विक हितों पर सीधा हमला अभी तक नहीं किया है। यह दोनों अमेरिका के नाक के नीचे रहेंगे और सुरक्षित रहेंगे। यह माना तथ्य है कि अमेरिका ने दाऊद और सईद के खिलाफ उस तरह का रवैया नहीं अपनाया, जिस तरह उसने ओसामा-बिन-लादेन, अयमान अल जवाहिरी और मुल्ला उमर के खिलाफ अपनाया। वे लोग तब तक पाकिस्तानी रणनीति का हिस्सा रहेंगे, तब की अमेरिकी हितों के खिलाफ नहीं जाते। अमेरिका की अपनी वैश्विक रणनीति है, उसमें दाऊद और सईद का कहीं कोई स्थान नहीं है।

 

राजीव शर्मा

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