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गांधी जी के तीन बंदर

अब यह कैसे पता चले कि उसके श्रीमुख से क्या-क्या गालियां गिर रही हैं। आदमी की आंखें हो या न हों उसके कान सही सलामत और हमेशा खुले होने चाहिए। आवाज चाहे वह कितनी ही बुरी हो, दृश्य को प्रामाणिक और ग्रहण योग्य बनाती है।

गांधी जी के तीन बंदर तो उनके साथ ही कभी के मर खप गए मगर जिस तरह से हम सभी अपने मां-बाप को अपने में जिंदा रखते हैं और उनके जींस को अपनी संतानों के जरिए आगे फैलाते हैं, उसी तरह इन तीनों बंदरों की संतानें भी भारतीय धरा-धाम पर फल फूल रही हैं लेकिन इनके गुण-अवगुणों में हम मनुष्यों की तरह ही भारी बदलाव आए हैं। मेरी मांग है कि नेतृत्वशास्त्री की तरह ही किसी बंदर विज्ञानी को इन बदलावों का अध्ययन करना चाहिए।

मिसाल के तौर पर जो बंदर बुरा न देखने के लिए प्रसिद्ध था और हमेशा दोनों हाथों से अपनी आंखें मीचे रहता था, आज बुरा और केवल बुरा देखने के लिए संसद से सड़क तक मचलता रहता है। उस पठ्ठे ने मुद्रा तो वही पुरानी बनाई हुई है मगर आप ध्यान से देखेंगे तो पाएंगे कि दोनों हाथों की उंगलियों के पीछे उसकी आंखें आधी खुली हुई हैं। वह दूसरे बंदर के कान में फुसफसाता है यार बुरा देखने में जो मजा है, उससे मैं बेकार में ही वंचित रहा। तू मजे में रहा कि तूने बुरा देखने का लुत्फ उठाया।

दूसरा बंदर मानो जला-भुना बैठा हो, इस पर बिफर गया। वह बोला, ‘तू साले उल्लू का पठ्ठा है। तूने कभी मूक फिल्में देखी होतीं तो तू समझता कि बिना आवाज वाले दृश्य को देखकर कितनी बोरियत होती है। खलनायक नायक को पीट रहा है और पीटते हुए मुंह भी चला रहा है। अब यह कैसे पता चले कि उसके श्रीमुख से क्या-क्या गालियां गिर रही हैं। आदमी की आंखें हो या न हों उसके कान सही सलामत और हमेशा खुले होने चाहिए। आवाज चाहे वह कितनी ही बुरी हो, दृश्य को प्रामाणिक और ग्रहण योग्य बनाती है। तू मुझसे पूछ कि कान बंद रखकर मैं किस तरह से सच्ची और खरी सच्चाइयों को जानने-समझने से वंचित रहा हूं। अब मैं खुले कानों से संसद से सड़क तक के नजारे देखता हूं, तो मेरा रोम-रोम खिला रहता है।’

इस पर तीसरे बंदर, जिसने अपने मुंह को दोनों हाथों से बंद रखने की चिर परिचित मुद्रा अपनाई हुई थी, खिसियाकर दोनों बंदरों की तरफ दौड़ा। उसके होंठ इस तरह एक झटके के साथ खुले, जैसे पैंट की खराब जिप खुलती है। उसके श्रीमुख से धारा प्रवाह गालियां फूट रहीं थीं। उसने कहा, ‘सालों तुम दोनों ने षडयंत्र करके मुझे मरवा दिया। आदमी सरेआम गंदा देखे और गंदा सुने मगर किसी से कुछ कह न सके, उसकी पीड़ा सिर्फ मैं ही समझ सकता हूं। हर दम मेरे दिमाग में मरोड़ उठते रहे। कोई कहता कि बोल कि लब आजाद हैं तेरे मगर अंदर बैठे गांधी बाबा समझाते रहे कि नहीं गंदा बात कभी जबान पर नहीं लानी है। मगर मैं समझता हूं कि जो मजा गंदा का बखान करने में है, वह संसार की किसी वस्तु में नहीं है। तुम दोनों अपने कान और आंख बंद रखते थे मगर आपस में गंदा का बखान तो कर लेते थे, पर मेरे होंठ तो भिंचे हुए थे। तुमने जो कुछ देखा या सुना, वह आधा सच ही था। मुझसे पूछो कि मैंने जितना भी गंदा था उसे देखा और सुना और मन ही मन झेला, पर किसी से कुछ कह नहीं सका। तुमसे भी वह गंदा बांट न सका जिससे मेरे अंदर गंद ही गंदा भर गया। तुम मेरे दर्द को नहीं समझ सकते। आदमी अगर अपनी भड़ास न निकाल सके तो वह जानवर हो जाता है। गंदा बोलने से कम से कम देखा और सुना गया गंदा तो बाहर निकलता रहता है। इसलिए आदमी भले ही गंदा न देखे या गंदा न सुने मगर उसके गंदा बोलने का अधिकार अक्षुण्ण रहना चाहिए।’

दोनों बंदर तीसरे बंदर की बात बहुत ध्यान से सुन रहे थे। वे परम रोमांचित हो गए। वे बोले, ‘प्रभु तुम हम तीनों में परम ज्ञानी हो। सच्चे मानो में तो तुमने हमारे आंख कान खोलने का काम किया है। जानवरों के इस नैसर्गिक लोकतंत्र में भड़ास निकालने के अधिकार की श्रेष्ठता और प्रासंगिकता स्वयंसिद्ध है। मौन रहकर आपने बोलने-कहने के अनुपम गुण की अपार महिमा को आत्मसात किया है। तुम्हारी जय हो प्रभु !’

इस पर तीसरा बंदर अपनी महिमा और ज्ञान की चादर उतारते हुए बोला, ‘सालों कमीनों मेरी लीद फुलाकर मुझे मूर्ख बनाने की कोशिश मत करो। तुम दोनों ही इन वर्षों में रोजाना मुझे गालियां देते हुए बुरा देखने और सुनने के मजे लूटते रहे हो। अब जरा मुझे गाली देकर दिखाओ हरामखोरों !’ दोनों बंदर आगे और तीसरा बंदर उनके पीछे धाराप्रवाह गालियां बकते हुए भागा चला जा रहा था।

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