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फिर आया संकल्प लेने का दिन!

देश के प्रथम राष्ट्रपति बाबू राजेन्द्र प्रसाद ने विख्यात ज्योतिषी हरदेव जी और पं. सूर्यनारायण व्यास जी से सत्ता हस्तान्तरण के लिए मुहूर्त निकालने का अनुरोध किया था। लेकिन दोनों ही विद्वानों ने बाबू राजेन्द्र प्रसाद को बताया कि 15 अगस्त का दिन सत्ता हस्तान्तरण की दृष्टि से शुभ नहीं है। अंग्रेज 15 अगस्त को ही सत्ता हस्तान्तरण करना चाहते थे और इसे किसी भी सूरत में बदलने को तैयार नहीं थे। उन्होंने समय का चयन करने के लिए भारतीय नेताओं को जरूर स्वतंत्रता दे दी।

एक बार फिर 15 अगस्त यानी आजादी का दिन आ गया। देश के लिए यह दिन बहुत ही गौरवमय उत्सव का दिन होता है। लेकिन पिछले 67 सालों में यह दिन धीरे-धीरे केवल एक औपचारिक रस्म अदायगी जैसा राष्ट्रीय उत्सव का दिन बनता चला जा रहा है। लालकिले के प्रांगण में तीनों सेनाओं की सलामी लेकर इस ऐतिहासिक किले की प्रचीर से राष्ट्र को संबोधित करते हुए देश की समस्याओं का जिक्र करना और अपनी सरकार की ओर से कुछ वादे कर प्रधानमंत्री का स्कूली बच्चों से तीन बार जयहिन्द का घोष करवाना ही कुल मिला कर 15 अगस्त का राष्ट्रीय त्यौहार है। बरसों से यही हो रहा है। लेकिन इस पूरी रस्म अदायगी में हम देशभक्ति की उस भावना को खोते जा रहे हैं जो हमें बताती थी कि किस तरह अनगिनत कुर्बानियां देकर राष्ट्र ने अंग्रेजों से 300 बरस की गुलामी से मुक्ति पाई थी। देश के सामने खड़ी अधिसंख्य समस्याएं आजादी के वक्त मौजूद रहीं कठिनाइयों से अलग नहीं हैं। इन समस्याओं को देख कर लगता ही नहीं, देश 67 साल का परिपक्व राष्ट्र हो गया है। इतने सालों में हम देश के आर्थिक हालात को नहीं संभाल पाए हैं। रूपया गर्त में जा रहा है, लेकिन हम जैसे किसी देवदूत के आने का इंतजार कर रहे हैं, जो आकर हमारे आर्थिक हालात सुधारेगा।

महंगाई से छुटकारा दिलाएगा। महीने के अधिसंख्य दिनों में भूखे पेट सड़क पर सोने वालों को भरपेट खाना खिला कर, नरम गद्दे पर सुलाएगा। बेरोजगार युवकों को रोजगार थमा कर, उनके भविष्य के सुनहरे सपनों को हकीकत में बदल देगा। सीमाओं पर पैदा होने वाले तनाव से राहत दिलाएगा। इसमें कोई शक नहीं कि इतने बड़े देश में समस्याएं होती ही हैं। इसे यदि ऐसा कहें कि समस्याओं के उपयुक्त हल से ही रास्ता विकास की ओर जाता है, तो अतिश्योक्ति नहीं होगी। लेकिन मूल समस्याओं को यदि हल नहीं किया जाता है तो समस्याओं पर समस्याएं खड़ी होकर समस्याओं के अम्बार खड़े कर देती हैं। इन समस्याओं को हल करने के लिए राजनैतिक व अन्य प्रकार से हल खोजने की देश में बराबर चर्चा चलती है। सीमा पर बढ़ते तनाव के हल के लिए कभी पड़ोसी देश की भाषा में ही जवाब देने की बात होती है, तो कभी कूटनीतिक भाषा के इस्तेमाल की चर्चा होती है। हम क्यों नहीं शत्रु को उसी की भाषा में जवाब देने के लिए एकजुट और एक स्वर हो सकते। गोली का जवाब गोली से, और कूटनीति का जवाब कूटनीति से दिया जा सकता है। दुश्मन यदि ‘गोली और वार्ता’ दोनों एक साथ चलाना चाहता है, तो यही सही। लेकिन दुश्मन को तो वोट बैंक नहीं बनाया जाना चाहिए। आर्थिक हालात ठीक करने, महंगाई पर लगाम लगाने या रूपए का सत्यानाश होने से बचाने के लिए कभी रिजर्व बैंक के हस्तपेक्ष की जरूरत महसूस की जाती है तो कभी अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री और उनके आर्थिक सलाहकारों की ओर आशाभरी निगाहों से देश देखने लगता है। लेकिन ढाक के वही तीन पात ही रहते हैं। चलिए एक

बार उधर भी निगाह डालते हैं, जिधर आमतौर पर नजर नहीं जाती। यानी एस्ट्रॉलिजीकल

दृष्टि से देखने की कोशिश करने में कोई

हर्ज दिखाई नहीं देता। वास्तव में 1947 में

जब देश आजाद हुआ तो अंग्रेजों की ओर

से 15 अगस्त का दिन देश को आजादी देने के लिए तय हुआ।

देश के प्रथम राष्ट्रपति बाबू राजेन्द्र प्रसाद ने विख्यात ज्योतिषी हरदेव जी और पं. सूर्यनारायण व्यास जी से सत्ता हस्तान्तरण के लिए मुहूर्त निकालने का अनुरोध किया। लेकिन दोनों ही विद्वानों ने बाबू राजेन्द्र प्रसाद को बताया कि 15 अगस्त का दिन हस्ता हस्तान्तरण की दृष्टि से शुभ नहीं है। अंग्रेज 15 अगस्त को ही सत्ता हस्तान्तरण करना चाहते थे और इसे किसी भी सूरत में बदलने को तैयार नहीं थे। उन्होंने समय का चयन करने के लिए भारतीय नेताओं को जरूर स्वतन्त्रता दे दी। यानी सत्ता हस्तान्तरण तो 15 अगस्त को ही होना था, लेकिन किस समय हो, इसका चयन करने की स्वतन्त्रता भारतीय नेताओं को थी। पं. हरदेव ने इसके लिए रात 12बजे का मुहूर्त निकाला। इसके लिए उन्होंने तीन कारण बताए: उस समय चन्द्रमा अतिशुभ पुष्य नक्षत्र में था। दूसरा– दोपहर में 12 से एक बजे के बीच समय में अभिजित मुहूर्त को अतिशुभ मुहूर्त माना जाता है, वैसे ही रात्रि में 12बजे के आसपास मुहूर्त अतिशुभ होता है। तीसरे– उस वक्त वृषभ लग्न का उदय होना था जो स्थिर लग्न है और स्थायी स्वाधीनता के लिए शुभ था। हालांकि इस संबंध में किसी भारतीय ज्योतिषी ने कुछ नहीं कहा है, लेकिन प्रसिद्ध ज्योतिषाचार्य के.के. जोशी की पुस्तक ”मुहूर्त’’ के प्राक्कथन में ज्योतिष के विश्वगुरू श्री के.एन. राव द्वारा दी जानकारी के अनुसार सर वुडरो व्याट ने ‘द टाइम्स, लंदन’ में मई 1988 में लिखे लेख ”कौन सितारों से विचार नहीं करता’’(हू डज नॉट कन्सल्ट द स्टार्स) में अमेरिकी राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन द्वारा ज्योतिषियों से विचार विमर्श किए जाने के कदम का बचाव करते हुए जानकारी दी कि भारतीय स्वतन्त्रता के समय का चयन ज्योतिषीय आधार पर हुआ।

इसका अर्थ यह हुआ कि सत्ता हस्तान्तरण के वक्त जो भी मुहूर्त के विकल्प भारतीय नेताओं के पास मौजूद थे, उनमें से जो उत्तम था, उसी का चयन कर लिया गया। उस मुहूर्त पर बनी आजाद भारत की जन्म कुंडली में लगन तो राहू-केतु के एक्सिस में था और नवग्रहों में से पांच ग्रह तीसरे घर में एकत्र होकर जमघट लगाए बैठे थे। पड़ोसी देशों से समस्याएं तो आनी ही थीं। अन्य कठिनाइयां और समस्याएं भी देश के सामने खड़ी होनी थीं। जो इन 67 सालों में सुरसा की तरह मुंह बाए खड़ी रहीं। इतना ही नहीं उनका रूप भी विकराल होता रहा। जबकि देश के सामने आईं परेशानियों के हल संयम और नेक नियती के साथ कर दृढ़ संकल्प से कठिनाइयों को दूर किया जाना चाहिए था। सवाल यह है कि क्या वास्तव में देश के सामने खड़ी समस्याओं के हल हमने दृढ़ संकल्प और नेक नियती के साथ खोजे? इसका जवाब केवल और केवल ‘नहीं’ के अतिरिक्त कुछ और है ही नहीं। हमने या तो उन समस्याओं को कालीन
के नीचे सरका दिया और जैसे बिल्ली को देख कबूतर आंख मीच कर मान लेता है कि बिल्ली चली गई, लेकिन बिल्ली वहीं होती है और कबूतर को दबोचने में कोई रहम नहीं दिखाती, उसी प्रकार कालीन के नीचे सरकाई गई समस्याओं की ओर से आंख भींचलीं। वे समस्याएं धीरे-धीरे विकराल रूप लेकर देश के सामने खड़ी होती रही हैं। और अगर समस्याओं को हमने कालीनके नीचे नहीं सरकाया है तो उन्हें वोट बैंक की राजनीति के हवाले कर एक वर्ग की तुष्टिकरण की नीति पर ही चलते रहे हैं। चाहे वह कश्मीर का मसला हो, सरकारी योजनाओं के केन्द्र में लक्षित वर्ग हो, महंगाई से त्रस्त आम आदमी हो, शिक्षा की नीतियां हों, यहां तक कि आरक्षण की नीति में भी हम आर्थिक स्तर को और पिछड़ेपन आधार न बना कर वर्ग विशेष को केन्द्रित करने की नीति पर चलते रहे हैं। कोशिश एक वर्ग विशेष को शोषण का शिकार बना कर, दूसरे वर्ग को खुश रख कर सत्ता पर काबिज रहना है।

समय आ गया है, जब देश के सभी वर्गों को समानरूप से गरीबी-अशिक्षा के अंधेरों से बाहर लाना होगा। देश को वर्गों में न बांटें। सबको आगे बढऩे के समान अवसर मिलें। 67 साल बाद भी वर्ग विशेष के तुष्टिकरण की नीति को तिलांजलि नहीं दी तो धर्मों और जातियों में बंटे देश को दुश्मन क्या मित्र देश भी नोंचने-खसोटने में कोई कोताही नहीं बरतेंगे। यह नहीं भूलना चाहिए कि एकजुट मजबूत देश की सीमाएं ही सुरक्षित रहती हैं और ऐसे ही कोई गीदड़ उसकी सीमाओं पर आंख उठाने की हिम्मत नहीं कर सकता।

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